भारत की अगली बड़ी निर्यात सफलता किसी महानगर के बड़े औद्योगिक क्षेत्र से नहीं, बल्कि भदोही के कालीन उद्योग, मुरादाबाद के पीतल कारोबार, कन्नौज के इत्र निर्माताओं, तिरुपुर के कपड़ा उद्योग या किसी छोटे जिले के फर्नीचर निर्माता से भी आ सकती है. केंद्र सरकार लगातार ऐसी नीतियां लागू कर रही है, जिनका मकसद छोटे और मझोले कारोबारियों को सीधे वैश्विक बाजार से जोड़ना है. इसी दिशा में सरकार ने हाल ही में विदेशी निवेश वाली ईकॉमर्स कंपनियों को भारत में बने उत्पादों के लिए इन्वेंट्री आधारित एक्सपोर्ट ऑपरेशन चलाने की अनुमति दी है. माना जा रहा है कि यह फैसला देश के हजारों छोटे कारोबारियों के लिए निर्यात के नए अवसर पैदा करेगा.

छोटे कारोबारियों के लिए आसान होगा विदेश में सामान बेचना
अब तक विदेशी निवेश वाली ईकॉमर्स कंपनियां भारत में इन्वेंट्री आधारित ईकॉमर्स मॉडल पर काम नहीं कर सकती थीं. नए नियम के तहत वे केवल भारत में बने उत्पादों के निर्यात के लिए ऐसा कर सकेंगी. इसका सीधा फायदा यह होगा कि Amazon और Flipkart जैसे बड़े प्लेटफॉर्म भारतीय निर्माताओं से सामान खरीदकर अपने वेयरहाउस में रख सकेंगे और दुनिया के अलगअलग देशों के ग्राहकों तक पहुंचा सकेंगे.
छोटे शहरों के अधिकांश कारोबारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विदेशी खरीदार ढूंढना, अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स संभालना और विदेशों में अपना नेटवर्क बनाना होती है. ईकॉमर्स कंपनियों के जरिए यह प्रक्रिया काफी आसान हो सकती है. इससे छोटे उद्यमियों को वैश्विक बाजार तक पहुंचने के लिए अलग से बड़ा निवेश नहीं करना पड़ेगा.
सरकार की बड़ी रणनीति का हिस्सा है यह फैसला
ईकॉमर्स एक्सपोर्ट से जुड़ा यह बदलाव किसी एक फैसले तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में सरकार लगातार निर्यात बढ़ाने के लिए कई सुधार कर चुकी है. विदेश व्यापार नीति में ईकॉमर्स एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए बदलाव किए गए हैं. इसके अलावा कूरियर के जरिए होने वाले निर्यात पर 10 लाख रुपये की सीमा हटाई गई है. विदेश से लौटने वाले सामान के लिए नई व्यवस्था और ‘रिटर्न टू ओरिजिन’ जैसी सुविधाएं भी शुरू की गई हैं. इन कदमों का उद्देश्य छोटे निर्यातकों की व्यावहारिक परेशानियों को कम करना है.
भारत कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते कर चुका है और कई नए समझौतों पर बातचीत जारी है. ऐसे में सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा भारतीय कंपनियां इन अवसरों का लाभ उठाएं और देश के निर्यात आधार का विस्तार हो.
हर जिले को बनाया जा रहा है एक्सपोर्ट हब
केंद्र सरकार लंबे समय से ‘Districts as Export Hubs’ कार्यक्रम पर काम कर रही है. इस योजना का उद्देश्य हर जिले के ऐसे उत्पादों की पहचान करना है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग हो सकती है. इनमें हस्तशिल्प, कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण, इंजीनियरिंग उत्पाद और पारंपरिक उद्योग शामिल हैं.
सरकार जिला स्तर पर टेस्टिंग लैब, गुणवत्ता प्रमाणन, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और एक्सपोर्ट प्रमोशन जैसी सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में भी काम कर रही है. इससे छोटे उद्योगों के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करना आसान होगा और वे वैश्विक बाजार में बेहतर प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे.
यूपी का ODOP मॉडल बना मिसाल
उत्तर प्रदेश की ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ योजना इस रणनीति का सबसे सफल उदाहरण मानी जाती है. इस योजना के तहत मुरादाबाद के पीतल उत्पाद, कन्नौज का इत्र, वाराणसी की साड़ियां, सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी और अलीगढ़ के ताले जैसे पारंपरिक उत्पादों को नई पहचान मिली.
सरकार ने इन उत्पादों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग, डिजाइन, डिजिटल मार्केटिंग और ट्रेड फेयर में भागीदारी के लिए मदद उपलब्ध कराई. इसका नतीजा यह हुआ कि कई स्थानीय उत्पादों की विदेशों में मांग बढ़ी और छोटे कारोबारियों को नए बाजार मिले. इस मॉडल की सफलता के बाद सरकार देश के अन्य राज्यों में भी इसी तरह की रणनीति को बढ़ावा देना चाहती है.
भारतीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बड़ा फायदा
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे शहरों से निर्यात बढ़ने का असर सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती मिलेगी और उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार आएगा. वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए उद्योग नई तकनीक अपनाएंगे और आधुनिक उत्पादन प्रक्रियाओं पर ध्यान देंगे.
इसके अलावा निर्यात कुछ बड़े शहरों तक सीमित रहने के बजाय देश के अलगअलग जिलों तक फैलेगा, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी. यदि सरकार की यह रणनीति सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत के कई बड़े ग्लोबल ब्रांड छोटे शहरों और पारंपरिक उद्योगों से निकलते दिखाई दे सकते हैं. इससे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ का लक्ष्य भी मजबूत होगा.



