
नई दिल्ली: मोबाइल फोन और टैबलेट पर लगातार वीडियो देखने की आदत छोटे बच्चों के विकास को प्रभावित कर सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि खासकर 2 से 5 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए दिन में एक घंटे से अधिक मनोरंजन आधारित स्क्रीन टाइम उनके भाषा विकास और एकाग्रता पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। हाल के वर्षों में ऐसे बच्चों के मामले बढ़े हैं, जिन्हें बोलने में देरी की शिकायत के साथ अस्पताल लाया जा रहा है। कई मामलों में अत्यधिक स्क्रीन देखने और मातापिता के साथ सीमित संवाद जैसी स्थितियां सामने आई हैं।
तेजी से बदलने वाले वीडियो से बढ़ रही चिंता
रोहिणी स्थित डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर अस्पताल के वरिष्ठ रेजिडेंट बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल दराल के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम, खासकर ‘रील्स’ और ‘शॉर्ट्स’ जैसे तेजी से बदलने वाले वीडियो, छोटे बच्चों में बोलने की क्षमता के विकास और एकाग्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
डॉ. दराल ने बताया कि ऐसे वीडियो में हर कुछ सेकेंड में नया कंटेंट सामने आता है। इससे बच्चे का मस्तिष्क लगातार उत्तेजक संकेतों का सामना करता है। नतीजतन किताब पढ़ने, पढ़ाई या ऐसी गतिविधियों में उनकी रुचि कम हो सकती है, जिनमें परिणाम धीरेधीरे मिलता है।
हालांकि, विशेषज्ञ ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की कमी के लिए केवल रील्स या शॉर्ट्स को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि, पालनपोषण का तरीका और घर का माहौल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ढाई साल का बच्चा रोज देखता था 67 घंटे मोबाइल
राष्ट्रीय राजधानी के एक सरकारी अस्पताल में ढाई वर्ष के एक बच्चे को बोलने में देरी की शिकायत के साथ लाया गया। बच्चा केवल “मम्मा”, “पापा” और कुछ गिनेचुने शब्द ही बोल पाता था, जबकि उसकी उम्र के कई बच्चे छोटेछोटे वाक्य बोलने लगे थे।
डॉक्टरों की जांच में बच्चे की सुनने की क्षमता, दृष्टि, तंत्रिका तंत्र और विकास से जुड़े अन्य पहलू सामान्य पाए गए। विस्तृत जानकारी लेने पर पता चला कि बच्चा रोजाना करीब छह से सात घंटे मोबाइल फोन पर कार्टून और छोटे वीडियो देखता था।
यहां तक कि वह खाना भी मोबाइल देखते हुए खाता था। फोन हटाने पर वह चिड़चिड़ा हो जाता था। डॉक्टरों ने पाया कि उसके विकास में मुख्य रूप से बोलने की क्षमता अपेक्षाकृत धीमी थी।
मातापिता ने बताया कि दोनों के कामकाजी होने के कारण बच्चे के साथ बातचीत और इंटरैक्टिव खेल का समय काफी सीमित हो गया था।
मोबाइल कम किया, बातचीत और खेल बढ़ाया तो हुआ सुधार
विशेषज्ञों ने बच्चे के मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने और भोजन के दौरान किसी भी तरह की स्क्रीन से दूरी बनाने की सलाह दी। इसके साथ मातापिता को रोजाना कम से कम एक घंटे बच्चे के साथ इंटरैक्टिव खेल खेलने, चित्रों वाली किताबें पढ़कर सुनाने और रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान लगातार बातचीत करने के लिए कहा गया।
बच्चे के लिए स्पीच एवं लैंग्वेज थेरेपी भी शुरू की गई। इन उपायों के बाद उसके विकास में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला।
‘स्क्रीन छीनना’ ही समाधान नहीं
डॉ. राहुल दराल के मुताबिक अत्यधिक स्क्रीन टाइम की वजह से आमनेसामने बातचीत, कहानी सुनाने, किताबें पढ़ने और खेलने जैसी गतिविधियों का समय कम हो जाता है। शुरुआती वर्षों में भाषा सीखने के लिए यही गतिविधियां बेहद महत्वपूर्ण होती हैं।
उन्होंने कहा कि लगातार स्क्रीन स्क्रॉल करने से मस्तिष्क का ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ बारबार सक्रिय होता है। इससे बच्चे तुरंत मिलने वाले रिवॉर्ड के अभ्यस्त हो सकते हैं और गृहकार्य, पढ़ाई, किताबें पढ़ने या संगीत का अभ्यास जैसी गतिविधियां उन्हें कम आकर्षक लग सकती हैं।
इसलिए समस्या का समाधान सिर्फ बच्चे से मोबाइल छीन लेना नहीं है, बल्कि घर में स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित करना जरूरी है।
छोटे बच्चों के लिए कितनी स्क्रीन?
विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार:
- 2 वर्ष से कम उम्र: मनोरंजन के लिए स्क्रीन से दूर रखना बेहतर है।
- 2 से 5 वर्ष: मनोरंजन के लिए स्क्रीन टाइम आदर्श रूप से रोजाना एक घंटे से कम रखा जाए।
- बड़े बच्चे: यह सुनिश्चित किया जाए कि स्क्रीन टाइम से उनकी नींद, पढ़ाई, शारीरिक गतिविधि और परिवार के साथ बिताया जाने वाला समय प्रभावित न हो।
मातापिता अपनाएं ये डिजिटल नियम
विशेषज्ञों ने बच्चों के लिए कुछ आसान आदतें अपनाने की सलाह दी है। भोजन के समय और शयनकक्ष को स्क्रीनमुक्त रखा जाए। सोने से कम से कम एक घंटे पहले स्क्रीन बंद कर दी जाए। बच्चों को रोजाना कम से कम एक घंटे बाहर खेलने या किसी शारीरिक गतिविधि के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
इसके अलावा, मातापिता रोजाना बच्चे को कहानी सुनाने, किताब पढ़ने और उसके साथ बातचीत करने के लिए समय निकालें। सबसे अहम बात यह है कि मातापिता खुद भी संतुलित स्क्रीन उपयोग का उदाहरण पेश करें, क्योंकि बच्चे अपने आसपास के लोगों को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं।



