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घटती आबादी, बढ़ता संकट! भारत के सामने खड़ा हुआ ‘ओल्ड बिफोर रिच’ का ये कैसा खतरा?

क्या भारत की जनसंख्या अब घटना शुरू हो गई है? और क्या ये अच्छी ख़बर है? भारत की जनसंख्या से जुड़ी जो सबसे चौंकाने वाली ख़बर आई उसपर ध्यान गया आपका? पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है तो ध्यान तो आपका भी शायद गया होगा. और अब तो एलॉन मस्क ने भी अपने एक्स अकाउंट पर ज़िक्र कर दिया भारत की जन्म दर का. एलॉन मस्क दुनिया के सबसे अमीर और मशहूर उद्योगपति हैं, टेस्ला के मालिक हैं, स्पेसएक्स के मालिक हैं और एक्स के भी मालिक हैं. एक्स जो पहले ट्विटर कहलाता था, अब वो मस्क का ही है. उन्होंने एक्स पर लिखा कि भारत की कुल प्रजनन दर, टोटल फ़र्टिलिटी रेट या TFR, पहली बार देश के इतिहास में रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर गई है. रिप्लेसमेंट लेवल मतलब 2.1 बच्चे प्रति महिला. इतने बच्चे होने पर आबादी ख़ुद को ख़ुद रिप्लेस कर सकती है, मतलब न बढ़ती है न घटती है. तो पहले तो ये ख़बर समझने की ज़रूरत है और उससे भी ज़्यादा ये समझने की ज़रूरत है कि ये अच्छी ख़बर है या नहीं है.

घटती आबादी, बढ़ता संकट! भारत के सामने खड़ा हुआ ‘ओल्ड बिफोर रिच’ का ये कैसा खतरा?
घटती आबादी, बढ़ता संकट! भारत के सामने खड़ा हुआ ‘ओल्ड बिफोर रिच’ का ये कैसा खतरा?

तो ख़बर ये है कि SRS के सरकारी आंकड़े आए हैं, SRS मतलब सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम. इसमें सब दर्ज होता है कितने बच्चे पैदा हो रहे हैं, कितनी मृत्यु हो रही हैं वगैरह. जो भी रेजस्ट्रेशन होती है वो दर्ज हो जाती है. तो 2024 की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम रिपोर्ट के मुताबिक भारत की TFR अब 1.9 हो गई है. यानी अब औसतन हर महिला को 1.9 बच्चे हो रहे हैं देश में. ये TFR जब 2.1 होती है तो मतलब जनसंख्या जितनी होती है उतनी बनी रहती है. इसको कहते हैं रिप्लेसमेंट लेवल.

2.1 टीएफआर का मतलब क्या?
मोटे तौर पर आप ये समझ लीजिए कि पति पत्नी के अगर दो बच्चे होंगे तो मांबाप की मृत्यु के बाद वही दो जनसंख्या में उनकी जगह ले लेंगे. इसलिए जनसंख्या उतनी ही बनी रहेगी. 2.1 इसलिए मानते हैं क्योंकि कई शिशु जन्म के बाद कई कारणों से बच नहीं पाते. और इसके अलावा जो बच्चे पैदा होते हैं उनमें आज भी लड़कों और लड़कियों की संख्या एकदम बराबर नहीं होती. लड़कों की संख्या थोड़ी ज़्यादा ही होती है. इसलिए अगर देश में हर महिला के ऐवरेज 2.1 बच्चे पैदा हों तो जनसंख्या सेम बनी रहती है. इसलिए इसको कहते हैं रिप्लेसमेंट लेवल. मतलब अगर 2.1 से ज़्यादा है ये औसत तो जनसंख्या बढ़ती रहेगी. और अगर कम है तो जनसंख्या घटनी शुरू हो जाएगी.

1970 के देशक में तो हमारी TFR 5 से भी ज़्यादा थी. मतलब हर महिला के 5 से ज़्यादा बच्चे हो रहे थे औसत. तो जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही थी. दस साल पहले भी ये दर हमारे देश में 2.3 थी. और अब आंकड़ा आया है 1.9, मतलब सिर्फ दस साल में इतनी तेज़ गिरावट हो गई है. दिल्ली जैसे शहर में तो ये और भी कम, सिर्फ 1.2 है, जो फिनलैंड जैसे विकसित देश से भी कम है. तो एलन मस्क ने लिखा कि भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर गई है.

आखिर जन्म दर इतनी तेजी से क्यों घटी?

सबसे ज्यादा पढ़ेलिखे लोगों में तो ये कई साल पहले ही नीचे गिर चुकी थी. और मस्क अक्सर दुनिया भर में कम होती जन्म दर की चिंता जताते रहते हैं. उनका मानना है कि ये मानव सभ्यता के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है, ग्लोबल वार्मिंग से भी ज्यादा. उन्होंने चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोप और अमेरिका जैसी जगहों पर भी यही चेतावनी दी है. यानी कम जन्म दर सिर्फ भारत की नहीं, पूरी दुनिया की कहानी बनती जा रही है.

लेकिन ये हमारे लिए अच्छी ख़बर है या नहीं ये समझने के लिए ये देख़ना होगा कि बाक़ी देशों में जनसंख्या क्यों घटनी शुरु हुई थी और हमारे देश में भी क्या वही हो रहा है? अब तक की थ्योरी ये है कि जब कोई देश अमीर होना शुरू होता है, तो जन्म दर अपने आप गिरने लगती है. क्योंकि ग़रीबी में बच्चे परिवार की मदद करते थे, खेती में काम के लिए, बुढ़ापे में सहारा बनने के लिए, तो ग़रीबी में सोच ये होती है कि जितने हों उतने अच्छे. लेकिन जब थोड़ा पैसा आ जाता है परिवार में तो स्कूल, अच्छी पढ़ाई, ख़ेलकूद, स्वास्थ्य, घर, ये सब चाहिए होता है बच्चों के लिए, तो सोच ये हो जाती है कि कम होंगे तो उनकी परविरश बेहतर कर पाएंगे.

और जैसेजैसे समाज में समृद्धि आती है तो लड़कियां ज्यादा पढ़ती हैं, कॉलेज जाती हैं, नौकरी करती हैं. करियर बनाना चाहती हैं. बच्चे इसलिए भी कम होने लगते हैं. विकास के साथ शहर ज़्यादा होने लगते हैं, लोग शहरों में ज़्यादा रहने लगते हैं. शहरों में जगह कम होती, मकान महंगे होते हैं, दोनों मातापिता काम करते हैं. बच्चे पालना उतना आसान नहीं होता जितना गांवों में. देश विकास करता है तो स्वास्थ्य सविधाएं बेहतर होती हैं. पहले बच्चे कई पैदा होते थे लेकिन सब बच नहीं पाते थे. विकास होने के साथ बच्चे कम मरते हैं, इसलिए ज्यादा बच्चे पैदा करने की जरूरत नहीं पड़ती.

ओल्ड बिफोर रिच का कैसा खतरा?
इसके अलावा नई सोच आ जाती है. लोगों के शौक बढ़ जाते हैं पैसा आने पर, अपनी ख़ुशी पर ज़्यादा ख़र्च करते हैं, घूमतेफिरते हैं, आपने आराम को महत्व देने लगते हैं. ये सब हुआ यूरोप में, जापान में, दक्षिण कोरिया में. ये देश जैसेजैसे अमीर बनते गए, जन्म दर गिरती गई. कुल GDP नहीं, प्रति व्यक्ति GDP जब बढ़ती है तो जनसंख्या घटने लगती है.

अब सवाल ये कि भारत अभी अमीर तो हुआ नहीं, तो फिर हमारे यहां ये कैसे हो गया? क्योंकि भले ही पूरे देश की औसत आमदनी या प्रति व्यक्ति आय या प्रति व्यक्ति GDP भी आप ले लोग, तो वो तो अब भी कम है. लेकिन हमारे यहां क्या हुआ कि एक तो लड़कियों की शिक्षा में तेज़ उछाल आया. 1990 के बाद से स्कूलों में लड़कियों की संख्या बहुत बढ़ी. NFHS का डेटा कहता है कि पढ़ीलिख़ी महिलाएं औसतन 1.61.8 बच्चे पैदा करती हैं, जबकि अनपढ़ महिलाएं 3+ बच्चे पैदा करती हैं. शिक्षा ने सोच बदली, शादी देरी से हुई, और महिलाओं ने करियर के बारे में ज़्यादा सोचा.

दूसरा ये हुआ कि गांवों में भी टीवी, मोबाइल, फिल्में, इंटरनेट हमारे देश में बहुत ज़्यादा पहुंच गया. छोटे परिवार का मॉडल तेज़ी से फैला. और सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम तो चले ही. दक्षिण भारत में ये बहुत ही सफल भी रहे. बच्चों की मौत के आंकड़े कम हुए. टीके आ गए, दवाइयां आ गईं, स्वास्थ्य कार्यक्रम चले सरकार के. तो अब 2 बच्चे ही काफी लगते हैं लोगों को. और फिर भले देश औसतन गरीब है, लेकिन मध्यम वर्ग भी बढ़ा और उसकी आकांक्षाएँ भी बहुत बढ़ गईं, अच्छा स्कूल, कोचिंग, घर, गाड़ी, तो लोग बच्चे कम करने लगे.

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
तो UN रिपोर्ट भी कहती है कि भारत, मेक्सिको, और नाइजीरिया जैसे देशों में जन्म दर आर्थिक विकास होने से पहले गिर गई है. शिक्षा और परिवार नियोजन की वजह से. नतीजा क्या हुआ है? नतीजा ये हुआ है कि दूसरे देश पहले अमीर बने फिर बूढ़े हुए. भारत के सामने ख़तरा ये है कि अगर बहुत तेज़ी से अब विकास नहीं हुआ तो अमीर बनने से पहले भारत बूढ़ा हो सकता है.

जी, बच्चे कम हो रहे हैं तो आगे चलकर जवानों की संख्या कम होगी ना. और बुज़ुर्गों की संख्या ज़्यादा होगी. दक्षिण के राज्य केरल और तमिलनाडु वगैरह तो पहले ही यूरोप जैसी कम जन्म दर पर पहुंच गए हैं, लेकिन यूरोप जैसा पैसा थोड़े ही हुआ है अभी. पूरे भारत में काम करने वाली उम्र के लोगों का अनुपात इस वक़्त चरम पर है, लेकिन जल्दी बुजुर्ग बढ़ेंगे. मतलब अमीर होने पर जन्म दर गिरना तो स्वाभाविक है, लेकिन भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया और सरकारी प्रयासों ने इसे पहले ही कर दिया. लेकिन इससे विकसित होने से पहले ही देश के बूढ़े होने का ख़तरा ख़ड़ा हो गया है. ये विकास के लिए एक तरह से तो अच्छी ख़बर है कि कम लोगों के लिए बहतर सुविधाएं दे पाएंगे, लेकिन चुनौती ये है कि हमें अब तेजी से अमीर बनना होगा ताकि बुजुर्गों की देख़भाल कर सकें.

समस्या ये है कि भारत की बूढ़ा होने की रफ्तार तेज होने वाली है, लेकिन अमीर होने की रफ्तार अभी धीमी है. आज भारत की आधी आबादी 30 से कम उम्र की है. लेकिन अगले 2030 साल में ये औसत उम्र तेजी से बढ़ेगी. 2050 तक भारत की 65+ उम्र की आबादी 20% तक पहुंच सकती है. और अभी भारत की प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है. यानी जब बुजुर्ग ज्यादा होंगे, तब भी देश उतना अमीर नहीं होगा जितना जापान या जर्मनी था जब उनकी आबादी बूढ़ी हुई. स्कूलों में बच्चे कम होंगे, काम करने वाले लोगों की संख्या चरम पर पहुंचकर घटने लगेगी, लेकिन बुजुर्गों की देखभाल, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं, इनके लिए पैसे चाहिए होंगे. तो बाक़ी देश पहले अमीर बने फिर बूढ़े हुए क्योंकि उनकी तरक्की धीरेधीरे हुई. भारत में स्वास्थ्य और शिक्षा की सफलता आबादी को कम तो कर देगी, लेकिन आर्थिक तरक्की अभी पूरी नहीं हुई. इसलिए अब तेज़ी से विकसित होने की चुनौती ख़ड़ी हो गई है और हमारे पास टाइम बहुत कम है. सौ बात की एक बात… ओल्ड बिफ़ोर रिच, ये नहीं होने देना है हमें.

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