Muhammad Ali Jinnah Death Anniversary: जिन्ना का नाम आते ही विभाजन का जिन्न सामने आ जाता है. पाकिस्तान के वजूद में आने के सिर्फ़ तेरह महीने बाद 11 सितंबर 1948 को जिन्ना की मौत ने इस बहस को जिंदा रखा कि क्या कांग्रेस के नेताओं को जिन्ना की लाइलाज बीमारी की जानकारी थी? माना जाता है कि ऐसा अगर होता तो कांग्रेस आजादी के लिए कुछ और दिन इंतजार करती. पर माउंटबेटन इतनी जल्दी में क्यों थे?

ब्रिटिश कैबिनेट ने सत्ता हस्तांतरण के लिए 30 जून 1948 की समय सीमा तय की थी. लेकिन माउंटबेटन ने अफरातफरी में उससे दस महीने पहले 15 अगस्त 1947 की तारीख तय कर व्यापक नरसंहार, विस्थापन और अन्य परेशानियों को न्योता दिया. क्या इस जल्दबाजी के पीछे जिन्ना की बीमारी और उनकी जिंदगी के चंद महीने ही बचे रहने की वजह हो सकती है ? जिन्ना के निधन की तारीख के मौके पर उस दौर के घटनाक्रम पर एक नज़र.
एक्सरे जिसने दिलाया पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
यह एक खास मरीज का एक्सरे था. डॉक्टर उस मरीज का दोस्त था. पेशागत नैतिकता के साथ ही मरीज से दोस्ती के कारण भी डॉक्टर ने हर हाल में बीमारी की गोपनीयता को बनाए रखने का भरोसा दिया था. मरीज मोहम्मद अली जिन्ना और डॉक्टर जल आर. पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉ. जल धायबू थे. 1946 के हंगामाखेज दौर में जून महीने में हुए इस एक्सरे का बहुचर्चित किताब Freedom at Midnight में लेखक कॉलिन्स और लापिएर ने जो ब्यौरा दिया उसके मुताबिक एक्सरे की फ़िल्म के बीच दो काले गोल धब्बे थे.
मोहम्मद अली जिन्ना.
लगभग टी टी की गेंद के बराबर. दोनो धब्बों के चारों ओर एक कटीफ़टी मोटी सी गोट लगी हुई थी. इन दो धब्बों के ऊपर बहुत से छोटेछोटे सफेद धब्बे पसलियों के ऊपरी सिरे तक चले गए थे. ये काले गोल धब्बे इस बात के सूचक थे कि उतनी जगह के फेफड़े खोखले हो चुके हैं. सफेद धब्बों की गोट उन क्षेत्रों की सूचक थी, जहां फेफड़े खराब होना शुरु हो गए हैं. क्षय इतना व्यापक था कि जिस आदमी का एक्सरे था, उसकी ज्यादा महीनों की जिंदगी बाकी नही थी. उन दिनों टीबी जानलेवा बीमारी हुआ करती थी. लिफाफे में रखी यह फ़िल्म जिन्ना के भरोसेमंद दोस्त डॉक्टर पटेल के पास बेहद गोपनीय तरीके से सुरक्षित रही.
डॉ. जल आर. पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉ. जल धायबू ने जिन्ना की बीमारी को छिपाकर पाकिस्तान के लिए कितना बड़ा काम किया, इसका पता दोनों डॉक्टरों को मरणोपरांत पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत किए जाने से चलता है.
जिन्ना ने डॉक्टरी सलाह क्यों की दरकिनार?
जिन्ना की बीमारी जिस स्टेज पर थी, उसमें मरीज के लिए डॉक्टर की सलाह किसी टीबी सेनिटोरियम में भर्ती होने की ही हो सकती थी. लेकिन इस मरीज की निगाह उस मंजिल पर थी, जो उसकी अगुवाई और मौजूदगी में ही हासिल होना मुमकिन थी. डॉक्टर पटेल ने जिन्ना को काम, सिगरेट, शराब छोड़ने और आराम की सलाह दी.
जिन्ना सुनने को तैयार नहीं थे. उनका कहना था कि इस नाजुक घड़ी में हिंदुस्तान के मुसलमानों को उनकी जरूरत है. सिर्फ उनकी मौत ही उन्हें यह जिम्मेदारी पूरा करने से रोक सकती है. बहुत गोपनीय तरीके से जिन्ना दवायें लेते रहे. आराम की सलाह को दरकिनार कर सार्वजनिक जीवन से भी दूर नहीं हुए. उन्हें पता था के कि अगर कांग्रेस के नेताओं को उनकी लाइलाज बीमारी और थोड़े अर्से की जिंदगी का पता चल गया तो आजादी के लिए वे अभी और इंतजार करेंगे. संघर्ष जारी रखेंगे और उनके मरने के बाद मुस्लिम लीग के नरमपंथी धड़े से समझौता करके पाकिस्तान के उनके सपने की धज्जी उड़ा देंगे.
लॉर्ड माउंटबेटन.
वेवल को पता था कि जिन्ना बीमार
जिन्ना कांग्रेस के नेताओं से तो अपनी बीमारी छिपाने में कामयाब रहे लेकिन क्या अंग्रेजों को इसकी जानकारी थी? ब्यौरे बताते हैं कि अंग्रेज़ इससे अनजान नहीं थे. हालांकि, माउन्टबेटन ने जिन्ना की मौत के पच्चीस साल बाद कहा था,” मुझे यह बात उस समय पता चल जाती, तो मैं भारत में दूसरे ही ढंग से काम करता.” विभाजन में माउन्टबेटन की भूमिका तमाम सवालोंआरोपों के घेरे में रही है. उसी तरह जिन्ना की बीमारी से उनकी अनभिज्ञता की सफाई भी लोगों के गले नही उतरी. खासतौर से इसलिए, क्योंकि ठीक उनके पूर्व के वायसराय लार्ड वेवल ने लिखा पढ़ी में इसे दर्ज किया.
अपनी डायरी में वेवल ने 10 जनवरी और 28 फरवरी 1947 की तारीखों में जिन्ना को “बीमार आदमी” लिखा था. वेवल इतनी महत्वपूर्ण जानकारी अपने उत्तराधिकारी से क्यों छिपाना चाहते? यह मान भी लिया जाए कि जिन्ना की बीमारी की जानकारी होने पर भी वेवल को उसकी गंभीरता की पूरी जानकारी न रही हो लेकिन ऐसे अवसर पर जबकि भारत के एक रहने या फिर बंटवारे जैसा अहम सवाल रहा हो तो क्या शासन का खुफिया तंत्र हाथ पर हाथ धरे बैठा था और जिस वायसराय को अंतिम फैसला लेना था, उसे इस सबसे क्यों गाफिल रखा गया?
क्या माउंटबेटन थे अनजान?
माउंटबेटन 22 मार्च 1947 को भारत पहुंचे. उनके पास सत्ता हस्तांतरण के लिए पंद्रह महीने का समय था. 5 अप्रैल 1947 को जिन्ना से उनकी पहली मुलाकात हुई. तब तक जिन्ना पाकिस्तान की मांग पर अड़ चुके थे. 5 से 10 अप्रैल के बीच हुई मुलाकातों में जिन्ना ने किसी समझौते की संभावना को लगभग खारिज करते हुए पाकिस्तान के लिए शीघ्र Surgical Operation की मांग रखी. जिन्ना अकारण जल्दी में नहीं थे. अपनी बीमारी और जिंदगी की मियाद को लेकर डॉक्टर के संकेत वे बख़ूबी समझ चुके थे. क्या सच में माउंटबेटन को नहीं पता था कि जिन्ना की जिंदगी बहुत दिन की नहीं बची है? जिन्ना की मौत के लगभग तीन दशक बाद Freedom At Midnight के लेखक कॉलिन्स और लापिएर के सवाल के जवाब में माउंटबेटन ने कहा था, “उन्हें ही नहीं, किसी को नहीं पता था. कहीं से इसका कोई संकेत नहीं था.”
माउंटबेटन सवालों के घेरे में
हालांकि जिन्ना की बीमारी से अनजान बनने का माउंटबेटन का कथन खुद उनकी पंडित नेहरू से हुई एक बातचीत गलत साबित कर देती है. उन्हें जिन्ना की बीमारी ही नहीं बल्कि यह भी पता था कि डॉक्टरों ने उनकी अधिकतम छह महीने की जिंदगी बताई थी. नेहरू अभिलेखागार में सुरक्षित 21 दिसंबर 1947 की उस बातचीत में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि माउंटबेटन ने नेहरू से कहा कि जिन्ना को डॉक्टरों ने अधिकतम छह महीने का समय दिया था और वे बहुत बीमार थे.
माउंटबेटन की यह स्वीकारोक्ति सवाल खड़े करती है कि क्या दिसंबर 1947 के पहले अर्थात 5 अप्रैल 1947 जब उनकी जिन्ना से पहली मुलाकात हुई या फिर 3 जून 1947 को पार्टिशन प्लान के मंजूरी देने के बीच उन्हें जिन्ना की बीमारी की जानकारी नहीं थी? बंटवारे की असली जिद जिन्ना की थी और यह बंटवारा सिर्फ जिन्ना के न रहने पर ही टल सकता था. अपरोक्ष रूप से माउंटबेटन ने भी इसे यह कहते हुए स्वीकार किया, “अगर मुझे जिन्ना की वास्तविक स्थिति मालूम होती तो मैं अलग ढंग से काम करता.” जाहिर तौर पर वे इशारा कर रहे थे कि तब वे स्वतंत्रता को कुछ समय टाल सकते थे और मुमकिन है कि तब तस्वीर कुछ दूसरी होती.
जिन्ना को माउंटबेटन की मदद !
इतिहास में रुचि रखने वाले माउंटबेटन की भूमिका पर सवाल करते हैं. 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की थी कि ब्रिटिश सरकार भारत में सत्ता का हस्तांतरण जून 1948 तक कर देगी. लेकिन माउंटबेटन ने भारत पहुंचने के ढाई महीने से कम वक्त में भारत को दो हिस्सों में बांटने का इंतजाम कर दिया. वे इतनी जल्दी में क्यों थे? क्या इस जल्दबाजी का संबंध मुहम्मद अली जिन्ना की उस बीमारी से था, जिसकी गंभीरता से ब्रिटिश प्रशासन वाक़िफ था.
इस सवाल का प्रमाणिक उत्तर आज भी नहीं है. लेकिन उपलब्ध दस्तावेज इसे खारिज करने की अनुमति भी नहीं देते. जिन्ना सिर्फ नेता नहीं बल्कि मुस्लिम लीग के पर्याय थे. पाकिस्तान की मांग को उनसे अलग करके देखना लगभग असंभव था. यहीं जिन्ना की लाइलाज बीमारी इतिहास में प्रवेश करती है. वे जानते थे कि उनके पास कम समय है. और वे वह यह भी जानते थे कि उनके राजनीतिक जीवन का लक्ष्य पाकिस्तान अभी पूरा नहीं हुआ था. इसलिए बीमारी को गोपनीय रखना उनके लिए केवल निजी मामला नहीं, राजनीतिक रणनीति भी थी.
सिर्फ अंग्रेज थे जिन्हें इसकी जानकारी थी. लॉर्ड वेवल की डायरी से लेकर माउंटबेटन की 21 दिसंबर 1947 की बातचीत इस थ्योरी को मजबूती देती है. तो क्या सत्ता हस्तांतरण की माउंटबेटन की जल्दबाजी की वजह जिन्ना की जिद पूरा करना था?
अंग्रेजों ने जिन्ना के साथ मिलकर विभाजन की पूरी पटकथा लिखी. फोटो: AI PIC
अंग्रेजों ने लीग के साथ लिखी विभाजन की पटकथा
अंग्रेजों ने जिन्ना के साथ मिलकर विभाजन की पूरी पटकथा लिखी इसका सीधा प्रमाण देना मुश्किल हो सकता है. लेकिन माउंटबेटन की भूमिका इसका संकेत देती है. ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण की 30 जून 1948 की सीमा तय की थी. माउंटबेटन ने इसे ढाई महीने में समेटा.
कांग्रेस और मुस्लिम लीग से बातचीत की. अप्रैल में वैकल्पिक योजनाओं पर विचार किया. मई में विभाजन की दिशा तेजी से मजबूत हुई. 3 जून को योजना सार्वजनिक हुई. अगस्त में सत्ता हस्तांतरित हो गई अर्थात विभाजन की अंतिम गति केवल परिस्थितियों ने नहीं तय की. माउंटबेटन के निर्णयों ने भी उसे आकार दिया. माउंटबेटन जिन्ना की बीमारी और उनकी कम बची जिंदगी की बात पंडित नेहरू से दिसंबर 1947 में ही बता चुके थे, इसलिए इस बात पर भरोसा करने की पर्याप्त वजहें हैं कि पार्टिशन प्लान को मंजूरी देते समय भी वे इससे अनजान नहीं थे.
एक्सरे के पीछे छिपा इतिहास
इतिहास कभीकभी बीमारी से भी बनता है. विभाजन की वजहों की पड़ताल प्रायः उस दौर के भाषणों, प्रस्तावों, दंगे, चुनाव, कैबिनेट मिशन जैसे घटनाक्रम के बीच होती है लेकिन लेकिन कभीकभी इतिहास के पीछे एक एक्सरे भी छिपा होता है. एक एक्सरे जिसे दो डॉक्टरों ने गोपनीय रखा. एक वायसराय की डायरी जिसमें जिन्ना को बीमार आदमी कहा गया. अगला वायसराय जो मार्च 1947 में भारत आता है. अप्रैल में जिन्ना से मिलता है और उसके सामने पाकिस्तान की मांग को एक Surgical Operation की तरह प्रस्तुत करने वाला नेता बैठा है. वो वायसराय जिसके पास 30 जून 1948 तक का वक्त था, खूब तेजी दिखाता है और 3 जून 1947 को विभाजन और पाकिस्तान की मंजूरी दे देता है और मंजिल हासिल कर चुके जिन्ना 11 सितंबर 1948 को दुनिया से रुख़सत हो जाते हैं.
फिर वही वायसराय कहता है कि उसे जिन्ना की बीमारी का पता होता तो अलग ढंग से काम करता. इतिहास का फैसला नहीं बदला जा सकता. लेकिन इतिहास सवाल उठाने से नहीं रोकता. सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी में इस गोपनीय एक्सरे फिल्म और माउंटबेटन की भूमिका पर सवाल उठते रहेंगे.



