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महाराष्ट्र के नए कानून से टाटा ट्रस्ट में हलचल! अब कोई नहीं रहेगा ‘आजीवन’ ट्रस्टी?

Satya Report: हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने पब्लिक ट्रस्ट कानून में बदलाव करके देश के सबसे पुराने ओद्याोगिक घराने टाटा में हलचल बढ़ा दी है. मामले से परिचित लोगों ने बताया कि टाटा ट्रस्ट्स अब महाराष्ट्र के पब्लिक ट्रस्ट कानून में हुए बदलाव के दो प्रमुख ट्रस्टों में ‘स्थायी ट्रस्टियों’ की स्थिति का मूल्यांकन कर रहा है.

महाराष्ट्र के नए कानून से टाटा ट्रस्ट में हलचल! अब कोई नहीं रहेगा ‘आजीवन’ ट्रस्टी?
महाराष्ट्र के नए कानून से टाटा ट्रस्ट में हलचल! अब कोई नहीं रहेगा ‘आजीवन’ ट्रस्टी?

इस बदलाव ने ऐसी नियुक्तियों की संख्या सीमित कर दी है, जिससे उनके बोर्ड के फैसलों को कानूनी चुनौती मिलने की संभावना बढ़ गई है. महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स (संशोधन) अध्यादेश, 2025 में एक नई धारा 30A(2) जोड़ी गई है. इसके तहत, जहां ट्रस्ट के दस्तावेज में स्थायी ट्रस्टी की नियुक्ति के बारे में कोई जिक्र नहीं है या कोई विशेष प्रावधान नहीं है, वहां परमानेंट ट्रस्टियों की संख्या ट्रस्ट की कुल संख्या के एक-चौथाई तक सीमित कर दी गई है.

इसका सीधा असर सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) और टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (TEDT) पर पड़ेगा, जहां कम से कम आधे ट्रस्टियों के पास स्थाई दर्जा है. यह नया नियम पिछले साल 1 सितंबर से लागू हुआ है, और इसके तहत सभी मौजूदा ट्रस्टों को हर समय इस सीमा का पालन करना अनिवार्य है.

क्या कहता है महाराष्ट्र सरकार का नया नियम

अधिकारियों ने बताया कि SRTT और TEDT के बोर्ड द्वारा लिए गए फैसलों की वैधता पर कानूनी परिणाम हो सकते हैं. SRTT में अभी पांच ट्रस्टी हैं, जिनमें से तीन के पास स्थायी दर्जा है – जिमी टाटा, नोएल टाटा और जहांगीर. जिमी 1989 से सेवा दे रहे हैं, जबकि नोएल और जहांगीर 2019 में शामिल हुए थे. इसी तरह, TEDT में तीन आजीवन ट्रस्टी हैं – जहांगीर मिस्त्री, मेहली मिस्त्री और नोएल टाटा. वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह का कार्यकाल जून में रिन्युएबल के लिए आएगा.

TEDT की टाटा संस में कोई हिस्सेदारी नहीं है, लेकिन यह एक बड़ी पूंजी का प्रबंधन करता है. SRTT की टाटा संस में लगभग 23.56 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) की 27.98 फीसदी हिस्सेदारी है. वैसे टाटा ट्रस्ट्स का इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.

याचिकाकर्ता ने लिखा लेटर

इस बीच, जनहित याचिकाकर्ता वकील कात्यायनी अग्रवाल ने SRTT को पत्र लिखकर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई करने का आग्रह किया है. अपने पत्र में, अग्रवाल ने कहा कि उन्होंने शनिवार को महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर को एक विस्तृत अभ्यावेदन सौंपा, जिसमें महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स अधिनियम, 1950 की धारा 30A(2) के कथित उल्लंघन की ओर ध्यान दिलाया गया है.

उन्होंने कहा कि ट्रस्ट में अभी छह ट्रस्टी हैं, जिनमें से तीन “स्थायी/आजीवन ट्रस्टी” हैं, जो बोर्ड की कुल संख्या का 50 फीसदी है. उनके अनुसार, यह उस कानूनी प्रावधान का “सीधा उल्लंघन” है जिसके तहत स्थाई ट्रस्टियों की संख्या “कुल ट्रस्टियों की संख्या के एक-चौथाई से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि मौजूदा बोर्ड की बनावट का जारी रहना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि यह आजीवन ट्रस्टियों के एक छोटे ग्रुप के जम जाने को रोकने और सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्टों के प्रबंधन में ज्यादा जवाबदेही सुनिश्चित करने के विधायी उद्देश्य को भी विफल करता है.

अग्रवाल ने ट्रस्ट से आग्रह किया कि वह अगले सात दिनों के भीतर बोर्ड की एक आपात बैठक बुलाए और बोर्ड के सामने यह प्रस्ताव रखे कि कानून के अनुसार, आजीवन ट्रस्टियों की संख्या घटाकर एक से ज्यादा न रखी जाए. .

​ट्रस्टियों का टेन्योर

महाराष्ट्र के सार्वजनिक ट्रस्ट कानून में किए गए संशोधन के तहत, कार्यकाल-आधारित ट्रस्टियों के लिए भी नए नियम लागू किए गए हैं. इनमें पाँच साल की कार्यकाल सीमा भी शामिल है, जो उन मामलों में लागू होगी जहां ट्रस्ट डीड (दस्तावेज) में कार्यकाल की अवधि या पुनर्नियुक्ति के बारे में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है. कुछ लोगों का मानना ​​है कि ये बदलाव धर्मार्थ संस्थानों में गवर्नेंस-एडमिनिस्ट्रेशन को मजबूत करने के व्यापक प्रयासों का ही एक हिस्सा हैं. इस स्थिति से परिचित लोगों ने बताया कि अक्टूबर में SRTT में आजीवन ट्रस्टी के तौर पर वेणु श्रीनिवासन की पुनर्नियुक्ति पर, संशोधित कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए, फिर से विचार किया गया था.

क्या बढ़ाई जा सकती है ट्रस्टियों की संख्या

KNAV की ग्लोबल टैक्स और सलाहकार फर्म के पार्टनर उदय वेद ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि यदि ट्रस्टियों के पास ट्रस्ट डीड में संशोधन करने का अधिकार है, तो इस बात की पड़ताल की जा सकती है कि क्या डीड में संशोधन करके किसी ट्रस्टी को ‘स्थायी ट्रस्टी’ के रूप में नामित किया जा सकता है. इसके बाद, संशोधित डीड को चैरिटी कमिश्नर के पास जमा कराना होगा. दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि यदि संभव हो, तो ‘एक-चौथाई’ की सीमा को पूरा करने के लिए ट्रस्टियों की कुल संख्या बढ़ा दी जाए.

वेद ने कहा कि अध्यादेश के साथ जारी बयान में यह उल्लेख किया गया है कि चैरिटी कमिश्नर और अदालतों के सामने, स्थायी/आजीवन ट्रस्टियों बनाम कार्यकाल-आधारित ट्रस्टियों से जुड़े कई मुकदमे पेंडिंग हैं. उन्होंने आगे कहा कि इसका असर ट्रस्टों के कामकाज, लाभार्थियों के कल्याण और आम जनता पर पड़ता है. इस बदलाव से इन मुद्दों को सुलझाने और सार्वजनिक ट्रस्टों के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.

क्या है नए कानून का उद्देश्य

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस संशोधन का उद्देश्य कंट्रोल के सेंट्रलाइजेशन को कम करना, बोर्ड में समय-समय पर नए सदस्यों को शामिल करने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना, तथा जवाबदेही और उत्तराधिकार-योजना को मजबूत बनाना है. टाटा ट्रस्ट्स के लिए—जिनके पास सामूहिक रूप से टाटा संस में 66 फीसदी हिस्सेदारी है—यह घटनाक्रम ट्रस्टियों की नियुक्तियों और शासन-प्रशासन की संरचनाओं की व्यापक समीक्षा का आधार बन सकता है.

कानूनी फर्म ‘पायनियर लीगल’ के पार्टनर सोहिल शाह ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि महाराष्ट्र सरकार का उद्देश्य उन लगातार चलने वाले मुकदमों को कम करना है, जिन्होंने टाटा ट्रस्ट्स जैसे महत्वपूर्ण पब्लिक ट्रस्टों के कामकाज में बाधाएं उत्पन्न की हैं. उन्होंने कहा कि इस स्ट्रक्चरल बदलाव का मकसद ज्यादा आंतरिक जवाबदेही को बढ़ावा देना और चैरिटी कमिश्नर पर से प्रशासनिक बोझ कम करना है. कमिश्नर ऐतिहासिक रूप से सालों से चले आ रहे जटिल और व्याख्या से जुड़े विवादों में उलझे रहे हैं.

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