
लाहौर, दिसंबर 1928: अंग्रेज पुलिस भगत सिंह और उनके साथियों की तलाश में जुटी थी। पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या के बाद पूरे इलाके में निगरानी बढ़ा दी गई थी। ऐसे समय में भगत सिंह को लाहौर से सुरक्षित बाहर निकालना बेहद जोखिम भरा काम था। तभी क्रांतिकारी दुर्गावती देवी, जिन्हें देश दुर्गा भाभी के नाम से जानता है, ने एक साहसी जिम्मेदारी उठाई। वह भगत सिंह की पत्नी बनकर उनके साथ निकलीं। गोद में अपना छोटा बेटा था और साथ में राजगुरु भी थे, जो नौकर के भेष में सफर कर रहे थे।
यह सिर्फ भेष बदलने की कहानी नहीं थी, बल्कि आजादी की लड़ाई में एक महिला के साहस, सूझबूझ और जोखिम उठाने की क्षमता का ऐसा उदाहरण था, जिसे आज भी याद किया जाता है।
सॉन्डर्स हत्याकांड के बाद लाहौर से निकलना था जरूरी
17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारी संगठन के सामने अपने साथियों को पुलिस की गिरफ्त से बचाने की चुनौती थी। भगत सिंह और उनके सहयोगियों को आशंका थी कि पुलिस उनकी तलाश में बड़े पैमाने पर कार्रवाई करेगी।
चंद्रशेखर आजाद और दूसरे क्रांतिकारी भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकालने की योजना बना रहे थे। इसी दौरान दुर्गा भाभी को इस अभियान में शामिल किया गया। उनके पति भगवती चरण बोहरा उस समय लाहौर में मौजूद नहीं थे, लेकिन दुर्गा भाभी ने परिस्थितियों को समझते हुए इस जोखिम भरे काम के लिए हामी भर दी।
अगली सुबह भगत सिंह ने अपना रूप बदल लिया। उन्होंने हैट पहनी और दाढ़ी-मूंछ हटाकर एक आम यात्री जैसा रूप बनाया। दुर्गा भाभी उनके साथ पत्नी के रूप में थीं और उनका छोटा बेटा शचींद्र भी उनके साथ था। राजगुरु ने नौकर का भेष धारण किया।
इस योजना का मकसद था कि पुलिस को शक न हो और भगत सिंह सामान्य परिवार के सदस्य की तरह स्टेशन से निकल सकें।
पुलिस की निगरानी के बीच ट्रेन में सवार हुए क्रांतिकारी
लाहौर रेलवे स्टेशन पर पुलिस की नजरें संदिग्ध लोगों को तलाश रही थीं। सॉन्डर्स की हत्या के बाद भगत सिंह की पहचान छिपाना बेहद जरूरी था। लेकिन बदले हुए हुलिए और परिवार के रूप में सफर करने की योजना ने उन्हें एक सामान्य यात्री की तरह पेश आने में मदद की।
भगत सिंह और दुर्गा भाभी प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सवार हुए, जबकि राजगुरु अलग डिब्बे में चले गए। चंद्रशेखर आजाद ने भी अपनी पहचान छिपाने के लिए अलग तरीका अपनाया और साधुओं के समूह के साथ यात्रा की।
बताया जाता है कि दुर्गा भाभी की सूझबूझ से यात्रा की योजना में बदलाव किया गया और वे कानपुर में उतरे। वहां से आगे का सफर करते हुए वे कलकत्ता पहुंचे। इस तरह भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकालने की योजना सफल रही।
इस घटना में दुर्गा भाभी की भूमिका खास थी। पुलिस से बचने के लिए तैयार की गई योजना में उन्हें न केवल अपनी सुरक्षा, बल्कि अपने छोटे बच्चे की जिम्मेदारी भी संभालनी थी।
कौन थीं दुर्गा भाभी?
दुर्गा भाभी का वास्तविक नाम दुर्गावती देवी था। उनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के शाहजादपुर में हुआ था। कम उम्र में उनका विवाह क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा से हुआ। उनके पति हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े थे और भगत सिंह, सुखदेव तथा चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों के सहयोगी थे।
दुर्गावती देवी को साथियों के बीच सम्मानपूर्वक ‘दुर्गा भाभी’ कहा जाता था। उन्होंने केवल एक क्रांतिकारी की पत्नी होने तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि आंदोलन से जुड़े कई जोखिम भरे कामों में सक्रिय योगदान दिया।
क्रांतिकारियों के लिए ठिकानों की व्यवस्था करना, संदेश पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर साथियों की मदद करना उनके कामों का हिस्सा था। उस दौर में महिलाओं का इस तरह भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।
भगवती चरण बोहरा भी थे आंदोलन के अहम सदस्य
भगवती चरण बोहरा क्रांतिकारी संगठन के विचारक, लेखक और रणनीतिकार के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने संगठन की विचारधारा और प्रचार सामग्री तैयार करने में योगदान दिया। उनका संपर्क भगत सिंह और दूसरे क्रांतिकारियों से लाहौर में हुआ था।
वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय युवाओं के बीच संगठन निर्माण और क्रांतिकारी विचारों के प्रसार के लिए काम करते थे। दुर्गा भाभी भी इसी वातावरण में आंदोलन से जुड़ीं और धीरे-धीरे साथियों के बीच एक भरोसेमंद सहयोगी बन गईं।
भगवती चरण बोहरा ने क्रांतिकारी आंदोलन के पक्ष में ‘बम का दर्शन’ नाम से एक लेख लिखा था। यह महात्मा गांधी के ‘बम का पंथ’ लेख के जवाब में सामने आया था। दोनों लेख उस दौर में स्वतंत्रता प्राप्त करने के तरीकों को लेकर क्रांतिकारियों और अहिंसावादी धारा के बीच मौजूद वैचारिक मतभेदों को दर्शाते हैं।
पति की मौत के बाद भी नहीं टूटा दुर्गा भाभी का हौसला
28 मई 1930 को रावी नदी के किनारे बम के परीक्षण के दौरान भगवती चरण बोहरा की मृत्यु हो गई। यह दुर्गा भाभी के लिए निजी जीवन का बेहद कठिन समय था। उनका छोटा बेटा भी था, लेकिन पति को खोने के बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से अपना संबंध समाप्त नहीं किया।
क्रांतिकारी साथियों के संस्मरणों में इस घटना के बाद दुर्गा भाभी के साहस और धैर्य का उल्लेख मिलता है। पति की मृत्यु के बावजूद उन्होंने साथियों का मनोबल बनाए रखने और आंदोलन से जुड़ी जिम्मेदारियों को निभाने का प्रयास किया।
उनकी भूमिका केवल संदेश पहुंचाने या ठिकाने उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कुछ कार्रवाइयों में भी भाग लिया और भगत सिंह सहित दूसरे क्रांतिकारियों के समर्थन में सक्रिय रहीं।
दुर्गा भाभी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सीधे कार्रवाई भी की
8 अक्टूबर 1930 को बंबई में पुलिसकर्मी टेलर और उनकी पत्नी पर हुई गोलीबारी की घटना में दुर्गा भाभी का नाम सामने आया था। इस कार्रवाई को भगत सिंह और उनके साथियों को दी गई सजा के विरोध से जोड़कर देखा जाता है। इस घटना में दंपत्ति घायल हुए थे।
दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण गिरफ्तारी और सरकारी कार्रवाई का सामना भी किया। बाद के वर्षों में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काम किया और बच्चों की पढ़ाई के लिए प्रयास किए।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका केवल सभाओं या प्रदर्शनों तक सीमित नहीं थी। कई महिलाओं ने गुप्त अभियानों, संगठनात्मक काम और प्रत्यक्ष विरोध में भी भाग लिया।
इतिहास में क्यों याद की जाती हैं दुर्गा भाभी?
दुर्गा भाभी का नाम भगत सिंह को लाहौर से सुरक्षित बाहर निकालने की घटना के कारण विशेष रूप से याद किया जाता है। उस समय पुलिस की निगरानी के बीच अपने छोटे बेटे के साथ इस तरह की यात्रा करना बड़ा जोखिम था। इसके बावजूद उन्होंने जिम्मेदारी स्वीकार की और क्रांतिकारी साथियों की मदद की।
उनकी कहानी स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के योगदान की याद दिलाती है। वे एक पत्नी और मां होने के साथ-साथ अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने वाली सक्रिय क्रांतिकारी भी थीं।
भगत सिंह को सुरक्षित निकालने की यह घटना उनके साहस और सूझबूझ की मिसाल मानी जाती है। दुर्गा भाभी का योगदान बताता है कि आजादी की लड़ाई में कई ऐसे लोगों ने अहम भूमिका निभाई, जिनका नाम लोकप्रिय इतिहास में अपेक्षाकृत कम लिया जाता है।
डिस्क्लेमर: लेख ऐतिहासिक विवरणों और उपलब्ध संस्मरणों पर आधारित है। कुछ घटनाओं के सूक्ष्म विवरण अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में भिन्न हो सकते हैं।



