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Europe Heatwave: गर्मी का रिकॉर्ड, 1300 मौतें… यूरोप की भीषण हीटवेव का भारत पर क्या असर होगा?

अलनीनो की चेतावनी पहले से है. उसे दुनिया रोक भी नहीं सकती. अब पूरा का पूरा यूरोप हीटवेव से बेहाल है. यह साधारण घटना नहीं है. इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ना तय है. पर्यटन, कृषि, सप्लाईचेन तक प्रभावित हो सकती है. दुनिया भर की सभी एजेंसियों ने कहीं अतिशय बारिश तो कहीं सूखे की चेतावनी पहले से दे रखी है. आइए, समझते हैं कि यूरोप की हीटवेव का कैसे और कितना असर भारत और दुनिया के अन्य देशों पर पड़ सकता है?

Europe Heatwave: गर्मी का रिकॉर्ड, 1300 मौतें… यूरोप की भीषण हीटवेव का भारत पर क्या असर होगा?

यूरोप जिस हीटवेव को महसूस कर रहा है, उसके लिए वह पहले से तैयार नहीं था. लोगों को भी इस स्तर की परेशानी की दूरदूर तक कोई आशंका नहीं थी. प्रकृति से जुड़ी आपदाओं को तो हम रोक नहीं सकते लेकिन जरूरी सावधानियां, अलर्ट सिस्टम के जरिए जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकते हैं. भारत एक बहुत बड़ी आबादी वाला देश है, यहां छोटी प्राकृतिक आपदा बड़ा प्रभाव छोड़ सकती है. यूरोप में मई जून 2026 की हीटवेव असाधारण रही. पश्चिमी यूरोप में मई के अंत में औसत तापमान कई स्थानों पर सामान्य से लगभग 10 डिग्री ऊपर तक गया. सैटेलाइट पर कुछ जगहों की सतह तापमान 50 डिग्री से ऊपर दिखाई दिया. विश्व मौसम संगठन ने 21 जून के बाद हीट से जुड़ी अतिरिक्त मौतों की संख्या 13 सौ से अधिक बताया है.

अनियमित मानसून से कहीं सूखा तो कहीं अतिशय बारिश

हीटवेव ने जेट स्ट्रीम और उच्च दबाव के ब्लॉक्स पर असर डाला. ऐसे ब्लॉक्स मानसून की गति और मार्ग दोनों को बदल सकते हैं. परिणामस्वरूप मानसून कभी कभी देरी करेगा और बारिश का वितरण असमान होगा. इस असंतुलन से कुछ हिस्सों में अधिक वर्षा और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है. वहीं, कुछ अन्य हिस्सों में सूखा गहरा सकता है. कई अलगअलग रिपोर्ट्स में इन बदलावों की चेतावनी दी गई है. इंका असर भी पूरी दुनिया पर पड़ने की आशंका है. भारत भी इससे अछूता नहीं रहने वाला. इसके विपरीत परिणाम कई क्षेत्रों पर पड़ने वाले हैं.

पूरा यूरोप हीटवेव से बेहाल है. फाेटो: Getty Images

ऊर्जा, बाजार और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर प्रभाव तय

हीटवेव ने यूरोप में ऊर्जा मांग और कीमतों को प्रभावित किया. यूरोपीय गैस की कीमतें जून के अंत में लगभग 42.9 यूरो प्रति मेगावाट रहीं. यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का संकेत है. ऊर्जाकीमतों में उतार चढ़ाव से भारत जैसे आयातक देशों को महंगाई और आपूर्ति लागत का सामना करना पड़ सकता है.

इसके अलावा यूरोप में उत्पादन धीमा पड़ा तो सप्लाई चेन भी प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. निर्माण और निर्यात पर देरी से कच्चे माल और तैयार माल की कीमतें बढ़ सकती हैं. मौजूदा हालात स्मार्ट स्टॉक प्रबंधन और वैकल्पिक स्रोत खोजने की जरुरत की ओर इंगित करता है.

हीटवेव के कारण यूरोप में हज़ारों उड़ानें बाधित हुई हैं. फोटो: Pexels

पर्यटन, यात्रा और हवाई संपर्क भी अछूते नहीं रहेंगे

हीटवेव के कारण यूरोप में हज़ारों उड़ानें बाधित हुई हैं. पूरे यूरोप को मिलाकर देखें तो एक दिन में तीन हजार से ज्यादा उड़ानें या तो देर से उड़ीं या फिर रद्द हुईं. लंदन के बड़े हवाई अड्डों पर लगभग 900 उड़ानें प्रभावित रहीं. यह भारत के लिए चेतावनी है. अगर यह सब नहीं सुधरा, मौसम ने साथ नहीं दिया तो भारतीय यात्रियों के कनेक्टिविटी पर असर पड़ेगा. टिकट की कीमतें बढ़ सकती हैं. पर्यटन क्षेत्र की राजस्व धार कमजोर हो सकती है. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रा नीति में लचीलापन और वैकल्पिक रूटिंग की योजना आवश्यक है.

समुद्र और मछलीपालन अर्थव्यवस्था वाले देश भी संकट में

कॉपरनिकस क्लाइमेट बुलेटिन में समुद्री तापमान और सूखे की अनियमितता दर्ज है. समुद्री उष्णता वृद्धि से तटीय पारिस्थितिकी और मछलीपालन पर दबाव आ सकता है. यूरोप के तटीय क्षेत्रों में समुद्री जीवन प्रभावित हुआ तो वैश्विक मछली आपूर्ति पर भी नकारात्मक असर पड़ना तय है. इससे उन देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी जो मछली और समुद्री उत्पाद आयातनिर्यात करते हैं. भारत के लिए भी ये तथ्य महत्वपूर्ण हैं. समुद्री तापमान की निगरानी और मत्स्यनीति पर नजर रखना जरूरी हो चला है.

हीटवेव का असर दुनियाभर में मछलियों की सप्लाई पर पड़ सकता है. फोटो: Pexels

अभी टला नहीं है जनस्वास्थ्य पर खतरा

हीटवेव का सीधा असर जन स्वास्थ्य पर देखा जा रहा है. यूरोप में दर्ज मौतें स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव के गहरे संकेत देते हैं. गर्मी से अस्पतालों में भर्ती और मेडिकल खर्च बढ़ते हैं. कामकाजी श्रमिकों की उत्पादकता घटती है. बीमा और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय पर बोझ बढ़ता है. विश्व मौसम संगठन के मुताबिक भारत में भी अगर गर्मी बढ़ती है या मानसून असंतुलित होता है, तो समान दबाव दिख सकता है. इसलिए हीट हेल्थ अलर्ट और वर्कर प्रोटेक्शन नीतियां जरूरी हैं.

कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण जीवन पर भी होगा असर

मानसून कमजोर या अनियमित रहा तो फसलों पर इसका नकारात्मक असर होना तय है. धान, मक्का और दलहन जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है. सिंचाई की मांग बढ़ेगी और जल संसाधनों और स्रोतों पर दबाव आएगा. अगर यूरोप में सूखा लंबा चला तो वैश्विक कृषि बाजार में आपूर्ति संकट और कीमतें बढ़ेंगी. इससे भारत में खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ सकता है. इसलिए जल संरक्षण, तात्कालिक बीज और बीमा तंत्र शीघ्र लागू करना जरूरी है. सरकारी तंत्र को सावधान रहना होगा क्योंकि अलनीनो की चेतावनी भी है.

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कुछ जरूरी एहतियाती कदम से जोखिम हो सकता है कम

इस सूरत में भारत समेत दुनिया के अन्य देशों को कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे. सभी संगठन इस पर जोर दे रहे हैं.

  • एक: मौसम निगरानी और डेटा पर नजर रखना होगा. कॉपरनिकस और विश्व मौसम संगठन के आंकड़ों का उपयोग स्थानीय मौसम के हिसाब से करने की जरूरत है.
  • दो: ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों पर नजर रखने के साथ ही ऊर्जा भंडारण भी बढ़ाना होगा. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी भी संकेत दे रही है कि ऊर्जा बाजार अस्थिर हो चला है.
  • तीन: कृषि क्षेत्र में जल प्रबंधन पर ध्यान देना होगा.
  • चार: पर्यटन और हवाई कंपनियों के लिए फ्लेक्सिबिलिटी नीति बनाना जरूरी है.
  • पांच: स्वास्थ्य चेतावनी और आपात प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है.

इस तरह के कुछ छोटेछोटे उपाय से जोखिम कुछ हद तक कम किए जा सकते हैं. सरल शब्दों में कहें तो यूरोप की हीटवेव सीधे सीधे भारत में गर्मी नहीं लाएगी. अलनीनो की चेतावनी के बीच जेट स्ट्रीम, समुद्री ताप, ऊर्जा बाजार और सप्लाई चेन के माध्यम से प्रभाव दूर तक पहुंच सकता है. भारत पर भी इसका असर होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. रिकॉर्ड तापमान, सतही उष्णता, हज़ारों उड़ानों की बाधा और गैस कीमतों की अनिश्चितता दिखाती हैं कि प्रभाव बहु आयामी हैं.

भारत को अब मौसम सतर्क नीतियाँ, ऊर्जा सुरक्षा, कृषि समर्थन और स्वास्थ्य तैयारी तेज करनी चाहिए. समय पर निगरानी और सामंजस्यपूर्ण नीतियां ही जोखिम घटा सकती हैं और प्रभावों को नियंत्रित कर सकती हैं.

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