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​संतान की दीर्घायु और सुख के लिए Santan Saptami Vrat आज रखा जा रहा है, दोपहर 12:57 तक विशेष मुहूर्त, जानें पूजा-विधि

हिंदू धर्म में संतान सप्तमी का व्रत बेहद ही खास माना जाता है। इस व्रत के रखने से संतान की अच्छी सेहत होती है और यह व्रत माता और पिता दोनों रखते हैं। अगर आप चाहे तो सिर्फ माताएं इस व्रत का पालन करती है। हर साल यह पर्व भादो महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है।

​संतान की दीर्घायु और सुख के लिए Santan Saptami Vrat आज रखा जा रहा है, दोपहर 12:57 तक विशेष मुहूर्त, जानें पूजा-विधि

आज यानी 18 सितंबर 2026, शुक्रवार को संतान सप्तमी का व्रत रखा जा रहा है। इस व्रत में मुख्य रुप से माता पार्वती की पूजा भगवान के साथ की जाती है। वहीं, इस दिन एक धागे के सात गांठें बांधकर हाथ में पहना जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, दीर्घायु की कामना के लिए बहुत शुभ माना जाता है। वैसे यह व्रत उन माताओं के लिए शुभ माना जाता है, जो संतान की प्राप्ति की इच्छा रखती हैं वे भी इस व्रत को रख सकती हैं। आइए आपको आज का शुभ मुहूर्त, पूजन विधि, कथा का पाठ और आरती के बारे में बताते हैं।

संतान सप्तमी 2026 पूजा शुभ मुहूर्त

संतान सप्तमी सुबह 10 बजकर 48 मिनट से शुरु होकर आरंभ हो रहा है और इसका समापन 18 सितंबर दोपहर 1.01 बजे होगा।

उदया तिथि के अनुसार, इस व्रत को आज ही रखा जाएगा।

पूजा का शुभ मुहूर्क दोपहर 12:08 बजे से 12:57 बजे तक रहने वाला है।

संतान सप्तमी पूजा सामग्री

देखें पूरी पूजा सामग्री लिस्ट

मौली या कलावा
हल्दी की गांठ
रोली या कुमकुम
शुद्ध देसी घी
पंचमेवा
आरती की थाली
फूल
फल या मिठाइयां
अक्षत
गंगाजल

संतान सप्तमी 2026 पूजा विधि

इस दिन महिलाएं जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र को पहनें।

अपनी सभी संतानों चाहे वो लड़का हो या लड़की, उनका नाम लेते हुए इस व्रत का संकल्प लें। इसके बाद अपनी मनोकामना को मन में दोहराएं और व्रत का संकल्प लें।

वैसे इस व्रत को आप दो तरीके से कर सकते हैं पहला दोपहर की पूजा तक व्रत का पालन करते हुए अन्न जल न ग्रहण करना और पूजा के बाद भोजन कर लेना। दूसरा पूरे दिन व्रत का पालन करें और अगले दिन व्रत का पारण करें।

अब पूजा के स्थान पर चौकी रखें और इस पर लाल कपड़ा बिछाएं।

उस चौकी में शिव परिवार की प्रतिमा स्थापित करें और चौकी के आसपास गंगाजल छिड़कें।

इसके बाद मौली से एक ऐसा धागा तैयार करें जिसमें सात गांठे लगी हों। इस धागे को हल्दी से रंग लें। इसे शिव परिवार के सामने रख दें।

अब भगवान शिव को चंदन और माता पार्वती को सिंदूर लगाएं।

इसके बाद उन्हें फूल चढ़ाएं और उनके सामने घी का दीपक जलाएं।

अब आप शिव जी को 7 मीठे पुए भी चढ़ाएं। आप फल भी 7 संख्या में ही अर्पित करें।

फिर व्रत कथा का पाठ करें। बिना व्रत कथा पढ़ें पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है।

पूजा को समाप्त करने से पहले संतान सप्तमी की पूजा की आरती करें।

अब कलावा अपने हाथ में बांधना चाहिए, जिसमें सात गांठें लगी हो।

इस व्रत का पालन पूरे दिन करें और अगले दिन इस व्रत को शिव और माता पार्वती की पूजा के बाद व्रत का पारण करें।

संतान सप्तमी व्रत कथा

एक बार राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से एक ऐसे व्रत के बारे में पूछा, जिससे मनुष्य के सांसारिक कष्ट दूर हों और उसे संतान सुख की प्राप्ति भी हो।

उस समय कृष्ण जी ने संतान सप्तमी की कथा सुनाई वो इस प्रकार है

एक समय अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चन्द्रमुखी और एक ब्राह्मणी भद्रमुखी सरयू नदी में स्नान करने गईं। वहां उन्होंने महिलाओं को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हुए देखा। महिलाओं ने बताया कि वे संतान सप्तमी का व्रत कर रही हैं। उसी समय संतान की इच्छा में दोनों ने भी व्रत करने का संकल्प लिया। भद्रमुखी ने पूरी श्रद्धा और नियम से व्रत किया, लेकिन चन्द्रमुखी ने लापरवाही की और कभी व्रत किया तो कभी छोड़ दिया।

अगले जन्म में दोनों को पशु योनि मिली। बाद में मनुष्य जन्म में भद्रमुखी ने भूषण देवी के रूप में जन्म लिया और उसके आठ पुत्र हुए, जबकि चन्द्रमुखी को संतान सुख नहीं मिला। ईर्ष्या में उसने भूषण देवी के पुत्रों को विष मिलाकर लड्डू खिला दिया, लेकिन भगवान शिव की कृपा से उसके सभी बच्चे सुरक्षित रहे।

तब चन्द्रमुखी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने भी विधिविधान से संतान सप्तमी व्रत किया और उसे संतान सुख की प्राप्ति हुई। उसी समय से मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक यह व्रत करने से संतान सुख, सौभाग्य और सुखसमृद्धि प्राप्त होती है।

संतान सप्तमी की आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

जय गणेश, जय गणेश,जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एकदन्त दयावन्त,चार भुजाधारी।

माथे पर तिलक सोहे,मूसे की सवारी॥

पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।

हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।

लड्डुअन का भोग लगे,सन्त करें सेवा॥

जय गणेश, जय गणेश,जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती,पिता महादेवा॥

अंधे को आंख देत, कोढ़िन को काया।

बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी।

कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥

जय गणेश, जय गणेश,जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

॥ श्री पार्वती माता की आरती ॥

जय पार्वती माता, जय पार्वती माता।

ब्रह्म सनातन देवी शुभ फल की दाता॥

जय पार्वती माता

अरिकुल पद्म विनाशिनि जय सेवक त्राता।

जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥

जय पार्वती माता

सिंह को वाहन साजे, कुण्डल हैं साथा।

देव वधू जस गावत, नृत्य करत ताथा॥

जय पार्वती माता

सतयुग रूपशील अतिसुन्दर, नाम सती कहलाता।

हेमांचल घर जन्मी, सखियन संग राता॥

जय पार्वती माता

शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्थाता।

सहस्र भुजा तनु धरि के, चक्र लियो हाथा॥

जय पार्वती माता

सृष्टि रूप तुही है जननी शिवसंग रंगराता।

नन्दी भृंगी बीन लही सारा जग मदमाता॥

जय पार्वती माता

देवन अरज करत हम चित को लाता।

गावत दे दे ताली, मन में रंगराता॥

जय पार्वती माता

श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता।

सदासुखी नित रहता सुख सम्पत्ति पाता॥

जय पार्वती माता

॥ शिवजी की आरती ॥

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।

हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।

पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।

भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंगा बहत है, गल मुण्डन माला।

शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥
 

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