
महात्मा गांधी सितंबर 1932 में जब आमरण अनशन शुरू करने की तैयारी कर रहे थे, तब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि गांधी उन्हें ‘अपने जीवन और मेरे लोगों के अधिकारों में से किसी एक को चुनने की मजबूरी में नहीं डालेंगे। क्योंकि, मैं अपने लोगों की आने वाली पीढ़ियों को हाथ-पैर बांधकर उच्च जातियों के हवाले करने के लिए कभी सहमत नहीं हो सकता।”
गांधी जी का यह अनशन ‘कम्यूनल अवॉर्ड’ (सांप्रदायिक पंचाट) के खिलाफ था, जिसकी घोषणा एक महीने पहले की गई थी। इसके तहत भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों और वंचित/दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल का प्रावधान किया गया था।
गांधी जी आखिर इसके खिलाफ क्यों थे और यह उनके एवं अंबेडकर के बीच एक बहुत बड़े विवाद का कारण क्यों बना?
वंचित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल
गांधी जी ने 11 मार्च को समाचार पत्रों में पढ़ा कि ब्रिटिश सरकार वंचित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रस्ताव घोषित करने की तैयारी कर रही है। उन्होंने तुरंत भारत के राज्य सचिव सैम्युअल होरे को पत्र लिखा और याद दिलाया कि उन्होंने गोलमेज सम्मेलन के दौरान क्या कहा था—कि वे (गांधी) ऐसे किसी भी कदम का ‘अपने जीवन की बाजी लगाकर’ विरोध करेंगे। गांधी जी ने अब इस बात पर जोर दिया कि वे शब्द ‘न तो किसी आवेश में कहे गए थे और न ही केवल भाषणबाज़ी के लिए थे।’
गांधी जी का तर्क था कि पृथक निर्वाचन मंडल समाज को छिन्न-भिन्न कर देगी और उसमें बिखराव पैदा कर देगा। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘गांधी 1914-1948: द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड’ (2018) के अनुसार, उन्होंने यह भी माना कि यह न तो कोई प्रायश्चित था और न ही वंचित वर्गों के सामने आ रही समस्याओं का कोई समाधान।
इसके बाद उन्होंने होरे को चेतावनी दी कि यदि सरकार इस प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ी, तो वह आमरण अनशन करेंगे। गांधी जी ने इसे ‘आत्मा की आवाज’ कहा। होरे ने जवाब दिया कि इस मामले पर कम से कम कई हफ्तों तक कोई फैसला नहीं लिया जाएगा।
कम्यूनल अवॉर्ड क्या था
ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त को औपचारिक रूप से कम्यूनल अवॉर्ड की घोषणा की। इसने वंचित वर्गों को अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता दी ‘और’ उन्हें 20 वर्षों के लिए पृथक निर्वाचनमंडल प्रदान किया। इस व्यवस्था ने उन्हें प्रांतीय विधानमंडलों में 71 विशेष सीटें दीं। इस अवॉर्ड ने मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों और यूरोपीय लोगों के लिए भी पृथक निर्वाचन मंडल का प्रावधान किया।
गांधी जी ने तुरंत मैकडोनाल्ड को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने होरे को लिखे अपने मार्च के पत्र की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि अब जब निर्णय ले लिया गया है, तो वह केवल पानी पीकर ‘मृत्यु तक अनवरत उपवास’ करेंगे। वह 20 सितंबर से अपना अनशन शुरू करेंगे, लेकिन यदि ब्रिटिश सरकार अपना फैसला वापस ले लेती है, तो वह इसे समाप्त कर देंगे।
मैकडोनाल्ड ने गांधी जी के अनशन पर आश्चर्य और खेद व्यक्त किया। उनका तर्क था कि पृथक निर्वाचन मंडल से वंचित वर्गों को अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने और अपनी समस्याओं को स्वतंत्र रूप से सामने रखने का अवसर मिलेगा। इसके विपरीत, संयुक्त निर्वाचन में उनके प्रतिनिधियों के चुने जाने पर उच्च जाति के हिंदू मतदाताओं का प्रभाव अधिक होगा। इसके साथ ही, क्योंकि वंचित वर्गों के सदस्यों के पास सामान्य हिंदू निर्वाचन क्षेत्रों में भी वोट देने का अधिकार रहेगा, इसलिए यह व्यवस्था उन्हें अन्य हिंदुओं से अलग करने के बजाय एकजुट करेगी। उन्होंने कहा कि वह अनशन करने के गांधी जी के फैसले को समझने में असमर्थ हैं।
जब गांधी जी, होरे और मैकडोनाल्ड के बीच हुए पत्राचार की बात सार्वजनिक हुई, तो प्रेस में टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। दक्षिण भारत के एक प्रमुख नेता एम.सी. राजा ने पृथक निर्वाचन मंडल को ‘खतरनाक और आत्मघाती’ बताया और तर्क दिया कि यह निचले समाज के हिंदुओं को उनके ही साथी हिंदुओं के खिलाफ खड़ा कर देगा। ब्रिटेन के पत्रकार बी.जी. हॉर्निमैन ने भी इसी तरह कम्यूनल अवॉर्ड पर वंचित वर्गों और अन्य हिंदुओं के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और इस विभाजन को भारत की राजनीतिक व्यवस्था का एक स्थायी हिस्सा बनाने का आरोप लगाया।
अंबेडकर और पृथक निर्वाचन मंडल
पृथक निर्वाचक मंडल के सबसे प्रमुख समर्थक डॉ. बी.आर. अंबेडकर थे। उन्होंने दोनों गोलमेज सम्मेलनों में इसके पक्ष में तर्क दिया था। गुहा अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि उनके तर्कों ने अंग्रेजों को पृथक निर्वाचन मंडल देने के लिए मनाने में मदद की थी।
अंबेडकर का मानना था कि गांधी जी जैसे उच्च जाति के सुधारक वंचित वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। उन्हें विधानमंडलों में अपने स्वयं के नेताओं और प्रतिनिधियों की आवश्यकता थी।
जैसे-जैसे गांधी जी के अनशन की तारीख करीब आई, मदन मोहन मालवीय ने दिल्ली में हिंदू और वंचित वर्गों के नेताओं की एक बैठक बुलाई, ताकि किसी ऐसे समझौते पर पहुँचा जा सके जिससे गांधी जी अपना अनशन वापस ले लें। अंबेडकर ने शुरुआत में इसमें शामिल होने से इनकार करते हुए कहा कि वह गांधी जी के किसी ठोस प्रस्ताव का इंतजार करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी प्राथमिकता गांधी जी के अनशन के व्यक्तिगत फैसले के बजाय वंचित वर्गों के हित हैं।
हालाँकि, 16 सितंबर को गांधी जी ने अपने अनशन का उद्देश्य बताते हुए एक बयान तैयार किया और अपने कई करीबी सहयोगियों को पत्र लिखकर इसे अपने जीवन का ‘अत्यंत महत्वपूर्ण कदम’ बताया। 20 सितंबर को दोपहर 12 बजे, गांधी जी ने पूना (पुणे) में अपना आमरण अनशन शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि वह छुआछूत के उन्मूलन के लिए जीने और मरने को तैयार हैं और उन्होंने सवर्ण हिंदुओं तथा वंचित वर्गों के बीच एक सच्चे सामाजिक मेल-मिलाप का आह्वान किया।
पूना पैक्ट और उसका परिणाम
जब पूना में गांधी जी अनशन पर थे, तब इस गतिरोध को तोड़ने का रास्ता निकालने के लिए कई नेता बॉम्बे (मुंबई) में मिले। इस सम्मेलन में मालवीय, तेज बहादुर सप्रू, एम.आर. जयकर, सी. राजगोपालाचारी और राजेंद्र प्रसाद शामिल थे। आखिरकार अंबेडकर को भी इसमें शामिल होने के लिए मना लिया गया। इसके बाद संयुक्त निर्वाचन मंडल का एक प्रस्ताव पूना में गांधी जी के पास ले जाया गया।
इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए, जिस पर अंबेडकर और अन्य नेताओं ने दस्तखत किए। इसने वंचित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल को समाप्त कर दिया, लेकिन उनकी आरक्षित सीटों की संख्या में भारी बढ़ोतरी कर दी। प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 148 सीटें और केंद्रीय विधानमंडल में कुल सीटों का 18 प्रतिशत कर दिया गया।
ब्रिटिश सरकार ने कम्यूनल अवॉर्ड में संशोधन के रूप में इस समझौते को स्वीकार कर लिया।
आजादी के बाद भी भारत ने आरक्षित सीटों की इस व्यवस्था को बनाए रखा। वर्तमान 543 सदस्यीय लोकसभा में 84 सीटें अनुसूचित जातियों और 47 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।
सहानुभूति रखना और राजनीतिक स्टैंड रखना, दोनों में बहुत अंतर है। गांधी और अंबेडकर दोनों को देश से प्यार था, लेकिन राजनीतिक स्टैंड बहुत साफ था। जंतर-मंतर पर पुलिसिया लाठीचार्ज के दृश्य देखकर मुझे दुख हुआ, लेकिन मेरी राजनीतिक समझ कहती है कि इस बार जल्दबाजी में कोई गलत फैसला न कर लिया जाए। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।



