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विभाजन के दर्द से भारतीय राजनीति के शिखर तक, लालकृष्ण आडवाणी की जिंदगी के ये अहम पड़ाव शायद ही जानते होंगे आप

विभाजन के दर्द से भारतीय राजनीति के शिखर तक, लालकृष्ण आडवाणी की जिंदगी के ये अहम पड़ाव शायद ही जानते होंगे आप

भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी 8 नवंबर को अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर केवल सत्ता और चुनावों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें देश के विभाजन की पीड़ा, संगठन निर्माण, लोकतंत्र के लिए संघर्ष और भारतीय राजनीति में आए बड़े बदलावों की कहानी भी शामिल है।

8 नवंबर 1927 को कराची में जन्मे आडवाणी ने अपने जीवन में कई ऐतिहासिक घटनाओं को करीब से देखा। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के दौरान उन्हें अपना घर और परिचित परिवेश छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने भारत में नई शुरुआत की और धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख चेहरों में अपनी जगह बनाई।

विभाजन के बाद नए सिरे से शुरू किया जीवन

लालकृष्ण आडवाणी का जन्म अविभाजित भारत के कराची में हुआ था। विभाजन के समय उन्हें अपना घर, परिवार का पुराना परिवेश और परिचित दुनिया छोड़कर भारत आना पड़ा। यह उनके जीवन का बेहद कठिन दौर था।

हालांकि, उन्होंने विपरीत परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। नए देश में नए सिरे से जीवन शुरू किया और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो गए। आगे चलकर यही संघर्ष और संगठन बनाने की क्षमता उनके राजनीतिक सफर की बड़ी पहचान बनी।

जनसंघ से भाजपा तक संगठन को मजबूत बनाने में निभाई भूमिका

आडवाणी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। राजस्थान में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाने के बाद वे दिल्ली पहुंचे। यहां उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काम करने का अवसर मिला।

भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के विस्तार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं की नई पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया।

1980 में भाजपा की स्थापना के बाद पार्टी ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत की। 1990 के दशक में भारतीय राजनीति में भाजपा का प्रभाव तेजी से बढ़ा और 1996 में पार्टी लोकसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।

आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की लड़ाई में रहे सक्रिय

आडवाणी के राजनीतिक जीवन में आपातकाल का दौर भी महत्वपूर्ण रहा। जून 1975 में देश में आपातकाल लागू होने के बाद विपक्षी नेताओं और लोकतंत्र समर्थकों ने इसका विरोध किया। आडवाणी भी इस संघर्ष का हिस्सा बने और उन्हें जेल जाना पड़ा।

इस दौर के अनुभवों का उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ए प्रिजनर्स स्क्रैपबुक’ में किया है। उनकी पुस्तक ‘माई कंट्री, माई लाइफ’ में भी उनके राजनीतिक जीवन और देश की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े कई अनुभव दर्ज हैं।

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। बाद के वर्षों में उन्होंने गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी काम किया।

गांधीनगर से जुड़ा रहा खास रिश्ता

आडवाणी का गुजरात से पुराना संबंध रहा है। विभाजन के बाद उनके पिता कच्छ में आकर बस गए थे। वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान वे गुजरात से राज्यसभा के सदस्य बने।

1991 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गांधीनगर सीट से चुनाव लड़ा। यह उनके लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पड़ाव था। इसके बाद गांधीनगर लंबे समय तक उनके संसदीय राजनीतिक सफर से जुड़ा रहा।

सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा ने बदली राजनीतिक चर्चा

लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन में वर्ष 1990 की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा को एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान निकाली गई इस यात्रा ने देश की राजनीति में व्यापक चर्चा पैदा की और भाजपा के जनाधार के विस्तार में भी भूमिका निभाई।

यात्रा के दौरान बिहार में आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया था। इस घटना के बाद राम मंदिर आंदोलन और अधिक राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया। उस समय भाजपा ने राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर अपना समर्थन और संकल्प दोहराया था।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विषय इसके बाद कई दशकों तक भारतीय राजनीति और सार्वजनिक बहस का अहम हिस्सा बना रहा। जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई।

गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारी

आडवाणी ने केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। गृह मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल देश की आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद से निपटने की नीतियों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा।

उनके राजनीतिक जीवन में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने का मुद्दा प्रमुख रहा। वे लंबे समय तक भारतीय राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में शामिल रहे।

राजनीति के अलावा किताबों और सिनेमा में भी थी दिलचस्पी

आडवाणी का व्यक्तित्व केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्हें किताबें पढ़ने और इतिहास में गहरी रुचि रही है। वे समाचार पत्रों को ध्यान से पढ़ने के लिए भी जाने जाते रहे हैं।

सिनेमा और रंगमंच में भी उनकी दिलचस्पी रही। बताया जाता है कि वे फिल्मों और नाटकों को लेकर अपनी राय व्यक्त करते थे। उनकी आत्मकथा ‘माई कंट्री, माई लाइफ’ उनके राजनीतिक अनुभवों और जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाती है।

उनके लंबे सार्वजनिक जीवन में उनकी पत्नी कमला आडवाणी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने कठिन और व्यस्त राजनीतिक दौर में उनका साथ दिया।

2024 में मिला भारत रत्न

देश के सार्वजनिक जीवन और राजनीति में लंबे योगदान के लिए लालकृष्ण आडवाणी को वर्ष 2024 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

उनकी राजनीतिक यात्रा में कई ऐसे पड़ाव रहे, जिन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा और बहसों को प्रभावित किया। विभाजन के समय विस्थापन से लेकर राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष पदों तक पहुंचने का उनका सफर आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।

डिस्क्लेमर: यह लेख लालकृष्ण आडवाणी के सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक यात्रा से जुड़ी उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारियों पर आधारित है। विभिन्न राजनीतिक घटनाओं और उनके प्रभावों को लेकर अलग-अलग विचार और दृष्टिकोण हो सकते हैं।

— Satya Report

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