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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, लाश न मिलने पर भी बच नहीं पाएंगे आरोपी; हत्या के मामलों में सजा का रास्ता साफ

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, लाश न मिलने पर भी बच नहीं पाएंगे आरोपी; हत्या के मामलों में सजा का रास्ता साफ

Supreme Court News: हत्या के मामलों में अक्सर आरोपी यह दलील देते हैं कि जब तक शव नहीं मिला, तब तक हत्या कैसे साबित होगी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सोच पर बड़ा प्रहार किया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर ठोस सबूत यह साबित करते हैं कि किसी व्यक्ति की हत्या हुई है, तो केवल शव न मिलने की वजह से आरोपी बच नहीं सकता. कोर्ट ने कहा कि कानून को अपराध साबित करने के लिए लाश नहीं, बल्कि विश्वसनीय साक्ष्य चाहिए.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामलों में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि डेड बॉडी का बरामद होना हत्या साबित करने की अनिवार्य शर्त नहीं है. अगर अभियोजन पक्ष यह साबित कर देता है कि मौत हुई और वह किसी आपराधिक कृत्य का नतीजा थी, तो आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने यह फैसला असम में हत्या के एक मामले में सुनाया. अदालत ने निचली अदालत और गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला साल 2015 का है. असम के रहने वाले देबोजीत पंकिका पर 10 साल की एक बच्ची की हत्या का आरोप था. बच्ची को उसकी मौसी ने गोद लिया था और वह आरोपी तथा उसकी मां के साथ रह रही थी. अभियोजन के मुताबिक एक दिन आरोपी की मां इलाज के लिए घर से बाहर गई थीं. उस दौरान बच्ची आरोपी की देखरेख में थी. इसी दौरान बच्ची अचानक गायब हो गई. जांच के दौरान सामने आया कि बच्ची की हत्या कर उसका शव बोरे में भरकर नदी में फेंक दिया गया. पुलिस ने नदी में काफी तलाशी की लेकिन शव कभी बरामद नहीं हो सका.

गवाह ने खोला था पूरा राज

मामले में सबसे अहम सबूत एक गवाह की गवाही बनी. गवाह ने अदालत को बताया कि आरोपी ने उससे खुद कबूल किया था कि बच्ची पर 40 रुपये चोरी करने का आरोप लगाया गया था. इसके बाद उसके शरीर में आग लग गई और उसकी मौत हो गई. गवाह के मुताबिक आरोपी ने चाकू दिखाकर उसे धमकाया और शव को बोरे में भरकर साइकिल से नदी तक ले जाने के लिए मजबूर किया. वहां शव नदी में फेंक दिया गया.

हालांकि, इस गवाह ने यह दावा नहीं किया कि उसने हत्या होते हुए देखी थी. उसने सिर्फ वही बताया जो उसने खुद देखा और अनुभव किया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यही बात उसकी गवाही को और विश्वसनीय बनाती है. उसने झूठ बोलकर खुद को प्रत्यक्षदर्शी साबित करने की कोशिश नहीं की.

22 दिन तक नहीं दिया कोई जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने एक और तथ्य को बेहद महत्वपूर्ण माना. बच्ची के गायब होने के बाद आरोपी 22 दिनों तक उसकी गुमशुदगी को लेकर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. अदालत ने कहा कि बच्ची उसकी देखरेख में थी. ऐसे में उसके अचानक गायब होने की जिम्मेदारी से आरोपी बच नहीं सकता. अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि किसी व्यक्ति को हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही मृतक का शव कभी बरामद न हुआ हो.

‘कॉर्पस डेलिक्टी’ सिद्धांत का जिक्र

अदालत ने कहा कि कॉर्पस डेलिक्टी (Corpus Delicti) सिद्धांत का मतलब शव की बरामदगी नहीं, बल्कि यह साबित होना है कि अपराध हुआ है. हत्या के मामले में दो बातें साबित होना जरूरी हैं. पहला, संबंधित व्यक्ति की मौत हुई है. उसकी मौत किसी दूसरे व्यक्ति के आपराधिक कृत्य का परिणाम है. इन दोनों तथ्यों को प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के जरिए साबित किया जा सकता है.

क्यों अहम है यह फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हर हत्या के मामले में शव मिलना अनिवार्य शर्त बना दी जाए, तो ऐसे अपराधी आसानी से बच निकलेंगे जो हत्या के बाद शव को पूरी तरह गायब करने में सफल हो जाते हैं. आज के समय में कई मामलों में आरोपी शव को जला देते हैं, नदी में बहा देते हैं या ऐसी जगह छिपा देते हैं, जहां उसे बरामद करना संभव नहीं होता. अगर केवल इसी आधार पर मुकदमा कमजोर मान लिया जाए तो न्याय व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा. इसी वजह से अदालत ने दोहराया कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में सबसे महत्वपूर्ण चीज विश्वसनीय साक्ष्य हैं, न कि केवल शव की बरामदगी.

मिसाल बना फैसला

कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां आरोपी शव गायब कर जांच को भटकाने की कोशिश करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून केवल लाश नहीं देखता, बल्कि सबूतों की पूरी श्रृंखला को परखता है. यदि परिस्थितिजन्य और प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलकर हत्या साबित करते हैं, तो शव न मिलने के बावजूद आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है. यानी अब सिर्फ लाश नहीं मिली, इसलिए हत्या साबित नहीं हुई जैसी दलील हर मामले में अपराधियों की ढाल नहीं बन सकेगी.

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