गलवान घाटी के खूनी संघर्ष और कोरोना महामारी के कारण पिछले 6 सालों से पूरी तरह ठप पड़ा नाथू ला दर्रे का सीमा व्यापार आज से एक बार फिर शुरू होने जा रहा है. समुद्री मार्गों से होने वाले अरबों डॉलर के कारोबार के मुकाबले नाथू ला का व्यापार भले ही छोटा लगे, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर इसका रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा है. आइए जानते हैं कि यह दर्रा दोनों देशों के रिश्तों का ‘थर्मामीटर’ क्यों माना जाता है.

जब डाक के थैलों से बची रही रिश्तों की सांस
ऐतिहासिक सिल्क रूट का हिस्सा रहा नाथू ला प्राचीन काल से ही तिब्बत की चुम्बी घाटी को सिक्किम और कोलकाता के बंदरगाहों से जोड़ता आया है. 20वीं सदी की शुरुआत में भारतचीन का 80 फीसदी जमीनी व्यापार इसी रास्ते से होता था.
- 1962 का युद्ध: इस ऐतिहासिक युद्ध ने व्यापारिक रिश्तों को एक झटके में तोड़ दिया और नाथू ला अगले 44 सालों के लिए पूरी तरह सील हो गया.
- मूक रस्म: इस दौरान भी 14,000 फीट की ऊंचाई पर कटीले तारों के पास एक भारतीय और चीनी डाकिया आपस में डाक का थैला बदलते थे. यह मूक रस्म दशकों तक दोनों देशों के बीच संपर्क का एकमात्र जीवित जरिया रही.
2006 में हुई थी दोबारा शुरुआत
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की बीजिंग यात्रा के बाद बनी सहमति के आधार पर 6 जुलाई 2006 को नाथू ला को व्यापार के लिए फिर से खोला गया. हालांकि, उस समय भी व्यापार के लिए तय की गई उत्पादों की सूची काफी पुरानी थी, जिस वजह से यह कभी कोई बड़ा आर्थिक कॉरिडोर नहीं बन सका.
आंकड़ों में कैसा रहा है व्यापार?
यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो नाथू ला का व्यापार दोनों देशों की कुल अर्थव्यवस्था के मुकाबले बहुत छोटा है:
- 2016 : कुल व्यापार रिकॉर्ड ₹82.68 करोड़ तक पहुंचा था.
- 2017 : सीमा पर तनाव का असर दिखा और व्यापार सिमटकर मात्र ₹8.86 करोड़ रह गया.
- 2019 : महामारी से पहले यहां ₹43.51 करोड़ का कारोबार दर्ज हुआ था.
वर्तमान में सिक्किम के करीब 600 स्थानीय व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों के लिए यह उनकी रोजीरोटी का मुख्य साधन है, जिनका सामान 2020 में सीमा बंद होने के बाद से फंसा हुआ था.
बॉर्डर ट्रेड से परे क्यों है यह ‘डिप्लोमैटिक इंडिकेटर’?
- नाथू ला में होने वाला सामान अहम नहीं है, बल्कि इस गेट का खुलना और बंद होना दोनों देशों के रिश्तों की सेहत बताता है.
- जब भी दिल्ली और बीजिंग के रिश्ते सुधरे, यह गेट खुला और जब सरहद पर तनाव बढ़ा, ताला सबसे पहले इसी दर्रे पर लगा.
- अगस्त 2025 में सिक्किम के नाथू ला, हिमाचल के शिपकी ला और उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से व्यापार बहाल करने पर सहमति बनी थी.
- 2020 के गलवान विवाद के बाद से दोनों देशों के रिश्ते गहरे अविश्वास के दौर में थे. अब सीधी उड़ानों, वीजा, मानसरोवर यात्रा और नाथू ला व्यापार की बहाली यह इशारा करती है कि दोनों पड़ोसी देश तनाव को कम कर ‘न्यू नॉर्मल’ की तरफ बढ़ना चाहते हैं.
नाथू ला दर्रे को फिर से खोलने का फैसला
आज से नाथू ला का खुलना रातोंरात सीमा विवाद नहीं सुलझाएगा, लेकिन वैश्विक राजनीति के इस दौर में यह इस बात का संकेत जरूर है कि दोनों परमाणु संपन्न देश संवाद और सहअस्तित्व बनाए रखने के इच्छुक हैं. हालांकि एक तरफ जहां गलवान संघर्ष के बाद बंद पड़े नाथू ला दर्रे को आज से फिर से खोलने का फैसला किया गया है, वहीं दूसरी तरफ चीन के उन भ्रामक दावों पर भी कड़ा जवाब दिया जाता रहा है, जिसमें वह अरुणाचल प्रदेश को ‘साउथ तिब्बत’ बताता है.
अरुणाचल प्रदेश आजादी और लोकतंत्र की धरती
एक तरफ जहां सीमा पर व्यापार बहाल हो रहा है, वहीं चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश को ‘साउथ तिब्बत’ बताने का झूठा दावा करता रहा है. लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट है.
- अपनी पहचान पर गर्व: अरुणाचल प्रदेश की पहचान किसी बाहरी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध जनजातीय संस्कृति से है. मोनपा, न्यीशी, आदी, आपातानी, गालो, मिश्मी, नोक्टे, वांचो और तांगसा जैसी जनजातियां यहां गरिमा और आपसी भाईचारे के साथ रहती हैं.
- भारत में विविधता का सम्मान: भारत का संविधान हर समुदाय को अपनी भाषा, धर्म और संस्कृति को सुरक्षित रखने की पूरी आजादी देता है. इसके विपरीत, तिब्बत और शिनजियांग जैसे क्षेत्रों में सांस्कृतिक पहचान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चिंताएं जताई जाती रही हैं.
- लोकतांत्रिक अधिकार: अरुणाचल प्रदेश के लोगों ने अपना लोकतांत्रिक भविष्य खुद चुना है. यहां के नागरिक स्वतंत्र रूप से अपने प्रतिनिधि चुनते हैं, देश भर में शिक्षा और रोजगार के अवसर पाते हैं और पूरी आज़ादी के साथ जीवन जीते हैं.



