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लोकसभा में सांसदों को कैसे मिलता है बोलने का वक्त, क्या होता है अलॉटमेंट प्रोसेस?

संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण जैसे बड़े विधेयकों पर लंबी बहस जारी है. सदन में हर सांसद अपनी बात रखना चाहता है, लेकिन वहां बोलने का समय मनमर्जी से नहीं मिलता. आइए जानें कि यह समय कैस मिलता है.

Satya Report:  संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर छिड़ी जोरदार बहस के बीच सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच शब्दों के बाण चल रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी जैसे दिग्गज नेताओं ने अपनी बात रखी है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब सदन में सैंकड़ों सांसद मौजूद हों, तो यह कैसे तय होता है कि किसे कितनी देर बोलना है? लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर में अपनी बात रखने का समय अलॉट करने के पीछे एक जटिल प्रक्रिया और सख्त नियम काम करते हैं. चलिए जानें.

कौन तय करता है लोकसभा में बोलने का समय? .

लोकसभा में बोलने का समय निर्धारित करने की जिम्मेदारी ‘बिजनेस एडवाइजरी कमेटी’ (BAC) की होती है. यह एक शक्तिशाली समिति है जिसमें कुल 26 सांसद शामिल होते हैं. इनमें 15 सदस्य लोकसभा से और 11 सदस्य राज्यसभा से लिए जाते हैं. लोकसभा में इस कमेटी के मुखिया खुद स्पीकर होते हैं, जबकि राज्यसभा में सभापति इसकी अध्यक्षता करते हैं. इस कमेटी की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई भी मंत्री सदस्य नहीं बन सकता है. यह कमेटी ही तय करती है कि किस बिल पर कितनी देर चर्चा होगी और सरकार को कौन सा मुद्दा कब सदन में लाना चाहिए.

सांसदों की संख्या से तय होता है बोलने का वक्त

सदन की कार्यवाही में किस पार्टी का कितना दबदबा होगा, यह गणित सांसदों की संख्या पर टिका होता है. नियम बहुत सीधा है- जिस पार्टी के पास जितने अधिक सांसद होंगे, उसे बहस के दौरान उतना ही ज्यादा समय दिया जाएगा. बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की सलाह पर लोकसभा स्पीकर सभी पार्टियों की सदस्य संख्या के अनुपात में समय का बंटवारा कर देते हैं. यही वजह है कि बड़ी पार्टियों के नेता घंटों तक भाषण देते हैं, जबकि छोटे दलों के सांसदों को अपनी बात रखने के लिए महज कुछ मिनट ही मिलते हैं.

पार्टियों का चार समूहों में विभाजन

सुविधा के लिए सदन में पार्टियों को चार अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है.

पहले आते हैं ‘बड़े दल’, जिनमें कम से कम 15 सांसद होने अनिवार्य हैं.

दूसरा ग्रुप ‘मझले दलों’ का है, जिनकी संख्या 5 से 14 के बीच होती है.

तीसरा समूह ‘छोटे दलों’ का है, जहां सांसदों की संख्या 2 से 4 होती है.

आखिरी समूह ‘निर्दलीय और मनोनीत सदस्यों’ का होता है. इन चारों श्रेणियों के लिए समय की अलग-अलग सीमाएं तय होती हैं, जिससे सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके और किसी भी ग्रुप के साथ नाइंसाफी न हो.

कैसे तय होते हैं वक्ताओं के नाम?

जब किसी बिल पर चर्चा शुरू होनी होती है, तो हर पार्टी अपने संभावित वक्ताओं की एक सूची तैयार करती है. यह लिस्ट लोकसभा स्पीकर के पास भेजी जाती है. पार्टी नेतृत्व ही तय करता है कि उसकी तरफ से कौन पहले बोलेगा और कौन बाद में. स्पीकर उसी क्रम में सांसदों को पुकारते हैं. हालांकि, पार्टियों के पास यह अधिकार होता है कि वे ऐन वक्त पर अपने वक्ताओं का क्रम बदल सकें. इस प्रक्रिया से सदन में अनुशासन बना रहता है और पार्टी अपनी रणनीति के अनुसार अपने सबसे मुखर नेताओं को मैदान में उतार पाती है.

बिन बुलाए संसद में बोलने का क्या है रास्ता?

अगर किसी सांसद का नाम उसकी पार्टी की ओर से दी गई लिस्ट में नहीं है, लेकिन वह फिर भी बोलना चाहता है, तो उसके लिए भी नियम हैं. ऐसे सदस्य को व्यक्तिगत रूप से स्पीकर को नोटिस देना पड़ता है. यहां स्पीकर के पास विवेकाधीन शक्ति होती है. यदि उन्हें लगता है कि सांसद का मुद्दा जरूरी है, तो वे अपने अधिकार का उपयोग कर उसे समय दे सकते हैं. इसी तरह, निर्दलीय सांसदों को भी बोलने के लिए स्पीकर को पहले से सूचित करना होता है और उनके समूह के लिए आरक्षित समय में से ही उन्हें बोलने का मौका दिया जाता है.

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