पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत की चर्चा है. पश्चिम बंगाल एक बार फिर से सत्ता में नए नायकों को देखेगा. यह वही बंगाल है जहां से अंग्रेजों ने शुरूआत की थी. मुगलों के बाद अंग्रेजों ने कोलकाता को अपनी राजधानी के रूप स्थापित किया. यहीं से वे दिल्ली की ओर कूच कर गए फिर देखते ही देखते पूरे देश पर उनका राज हो गया.

आजाद भारत में भी कोलकाता में बैठकर कांग्रेस के नेताओं ने राज्य सरकार चलाई. फिर कम्युनिस्टों ने यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया. ममता बनर्जी ने उन्हें उखाड़ फेंका था. सिर्फ पंद्रह वर्ष बाद अब पहली बार भारतीय जनता पार्टी यहाँ की सत्ता पर काबिज होने जा रही है. इस तरह कहा जा सकता है कि कोलकाता ने बहुत बरस तक किसी को बर्दाश्त नहीं किया. उसका जब मूड बना, सत्ता सिंहासन पर बैठी सरकार को उखाड़ फेंका.
आइए, ताजे संभावित बदलाव के बीच जानने का प्रयास करते हैं कि कैसे अंग्रेजों ने बंगाल में मुगलों का सिंहासन हिलाने की नींव रखी और दिल्ली तक सफाया करके अंत किया?
इस तरह शुरू हुआ मुगल सिंहासन हिलाने का सिलसिला
अंग्रेजों ने भारत में व्यापार के जरिए प्रवेश किया. सत्रहवीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगल बादशाहों से व्यापार की अनुमति मिली. उन्होंने सूरत, मद्रास और कलकत्ता में अपने केंद्र बनाए. शुरू में उनका उद्देश्य केवल व्यापार था. वे भारतीय वस्त्र और मसाले लेते थे. बदले में यूरोप का सामान लाते थे. उस समय मुगल साम्राज्य मजबूत था, इसलिए अंग्रेज राजनीति से दूर रहे.
सत्रहवीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगल बादशाहों से व्यापार की अनुमति मिली. फोटो: AI Image
मुगल साम्राज्य का पतन और अवसर
अठारहवीं सदी में मुगल शक्ति कमजोर होने लगी. औरंगजेब की मृत्यु के बाद केंद्रीय नियंत्रण ढीला पड़ गया. प्रांतों के नवाब और सूबेदार स्वतंत्र होने लगे. बंगाल, अवध और हैदराबाद जैसे क्षेत्र लगभग अलग शासन करने लगे. इतिहासकार बिपिन चंद्र अपनी पुस्तक आधुनिक भारत का इतिहास में बताते हैं कि इसी कमजोरी ने अंग्रेजों को हस्तक्षेप का मौका दिया.
बंगाल की समृद्धि पर थी अंग्रेजों की नजर
बंगाल उस समय भारत का सबसे समृद्ध प्रदेश था. यहां कृषि और उद्योग दोनों विकसित थे. कपड़ा उद्योग बहुत प्रसिद्ध था. अंग्रेजों को यहां की संपन्नता आकर्षित करती थी. वे व्यापार से आगे बढ़कर सत्ता पर नियंत्रण चाहते थे. इसी कारण उन्होंने बंगाल की राजनीति में दखल देना शुरू किया.
प्लासी की लड़ाई निर्णायक साबित हुई
साल 1757 की प्लासी की लड़ाई एक महत्वपूर्ण मोड़ थी. बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों का विरोध किया. लेकिन अंग्रेजों ने चालाकी से उनके सेनापति मीर जाफर को अपने पक्ष में कर लिया. रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों ने नवाब को हरा दिया. यह जीत युद्ध से ज्यादा विश्वासघात का परिणाम थी. इतिहासकार आर.सी. मजूमदार इसे निर्णायक घटना मानते हैं.
रॉबर्ट क्लाइव.
बक्सर की लड़ाई में और मजबूत होकर उभरे अंग्रेज
साल 1764 में बक्सर की लड़ाई हुई. इसमें अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब और मीर कासिम को हराया. यह जीत बहुत महत्वपूर्ण थी. इसके बाद अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिल गई. यानी राजस्व वसूली का अधिकार उनके पास आ गया. इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई.
व्यापारी से शासक बन बैठे अंग्रेज
दीवानी मिलने के बाद अंग्रेज केवल व्यापारी नहीं रहे. वे शासक बन गए. उन्होंने प्रशासन और सेना पर नियंत्रण स्थापित किया. अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए उन्होंने भारतीय शासकों के बीच संघर्ष का लाभ उठाया. सुमित सरकार अपनी पुस्तक मॉडर्न इंडिया में बताते हैं कि अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई.
दक्षिण और पश्चिम भारत में विस्तार
अंग्रेजों ने दक्षिण भारत में मैसूर के खिलाफ युद्ध किए. टीपू सुल्तान ने उनका विरोध किया, लेकिन 1799 में वे हार गए. इसके बाद दक्षिण भारत पर अंग्रेजों का नियंत्रण बढ़ा. मराठों के साथ भी कई युद्ध हुए. साल 1818 तक मराठा शक्ति कमजोर हो गई. इससे अंग्रेजों का प्रभाव पूरे भारत में फैल गया.
उन्नीसवीं सदी में लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स का सिद्धांत लागू किया. जिन राज्यों का कोई उत्तराधिकारी नहीं होता, उन्हें अंग्रेज अपने अधीन कर लेते. सतारा, झांसी और नागपुर जैसे राज्य इसी तरह कब्जे में लिए गए. इससे भारतीय शासकों में असंतोष बढ़ा.
फिर हुआ 1857 का विद्रोह
साल 1857 में बड़ा विद्रोह हुआ. इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है. सैनिकों, किसानों और कई शासकों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया. दिल्ली में बहादुर शाह जफर को फिर से सम्राट घोषित किया गया, लेकिन अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया. इतिहासकार बिपिन चंद्र के अनुसार, यह विद्रोह असफल जरूर रहा, लेकिन इसका प्रभाव गहरा था.
बहादुर शाह जफर. फोटो: Getty Images
दिल्ली में मुगल सत्ता का अंत
साल 1857 के बाद अंग्रेजों ने सत्ता पूरी तरह अपने हाथ में ले ली. 1858 में कंपनी का शासन समाप्त हुआ. भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया. अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून भेज दिया गया. उनके साथ ही मुगल साम्राज्य का अंत हो गया.
अंग्रेजों रातोंरात कामयाबी नहीं पाई. उन्होंने भारत में धीरेधीरे अपनी शक्ति बढ़ाई. व्यापार से शुरुआत की और सत्ता तक पहुंच गए. बंगाल उनकी ताकत का पहला केंद्र बना. प्लासी और बक्सर की जीत ने उन्हें और मजबूत किया. इसके बाद उन्होंने पूरे भारत में विस्तार किया और अंत में दिल्ली तक पहुंचकर मुगल सत्ता का अंत कर दिया. इतिहासकारों के अनुसार, अंग्रेजों की सफलता के पीछे उनकी रणनीति और भारतीय शासकों की कमजोरी, दोनों जिम्मेदार थीं.



