Madhya Pradesh

जबलपुर की ‘मम्मी’… बेटी नहीं हुई तो 9 कन्याओं का बसाया घर, 8 का खुद किया कन्यादान; कहानी अनिता ठाकुर की

कहते हैं कि मां बनने के लिए जन्म देना ज़रूरी नहीं होता, ममता तो वो अहसास है जो पराए को भी अपना बना ले. मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले से मानवता की एक ऐसी ही मिसाल सामने आई है, जिसने समाज के सामने एक बड़ा उदाहरण पेश किया है. यह कहानी है शहपुरा विकासखंड के ढिमर जोझी गांव की रहने वाली 54 वर्षीय महिला अनिता ठाकुर की, जिन्हें आज उनके गांव के बच्चोंबच्चों से लेकर बूढ़े बुजुर्ग तक ‘मम्मी’ कहकर पुकारता है.

जबलपुर की ‘मम्मी’… बेटी नहीं हुई तो 9 कन्याओं का बसाया घर, 8 का खुद किया कन्यादान; कहानी अनिता ठाकुर की
जबलपुर की ‘मम्मी’… बेटी नहीं हुई तो 9 कन्याओं का बसाया घर, 8 का खुद किया कन्यादान; कहानी अनिता ठाकुर की

जबलपुर जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर शहपुरा विकासखंड के ढीमर जोझी गांव की रहने वाली 54 वर्षीय अनिता ठाकुर के तीन बेटे हैं. एक भरापूरा परिवार होने के बावजूद अनिता के मन में एक टीस हमेशा रहती थी उनके घर में किसी बेटी की किलकारी नहीं गूंजी. उन्हें हमेशा से एक बेटी की चाह थी, जिसे वे लाडप्यार से बड़ा कर सकें और उसका कन्यादान कर सकें. जब खुद के घर बेटी नहीं हुई, तो अनिता ने मायूस होने के बजाय अपनी ममता का दायरा बढ़ा लिया.

2006 में की नेक यात्रा की शुरुआत

उन्होंने तय किया कि वे समाज की उन बेटियों की मां बनेंगी, जिनका कोई सहारा नहीं है या जिनके मातापिता गरीबी के कारण उनका हाथ पीला करने में असमर्थ हैं. अनिता ठाकुर की यह नेक यात्रा साल 2006 में शुरू हुई थी. उन्होंने सबसे पहले मुस्कान पटेल नाम की एक निर्धन बेटी की शादी कराई. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. पिछले 20 वर्षों में अनिता ने एकएक कर 9 बेटियों के हाथ पीले कराए हैं और इनमें से 8 बेटियों का खुद कन्यादान कर मां का फर्ज निभाया है.

एक बच्चे को भी लिया गोद

इसके अलावा सिर्फ बेटियां ही नहीं, अनिता ने ‘निक्की ठाकुर’ नाम के एक अनाथ बच्चे को गोद भी लिया है, जिसके मातापिता का साया सिर से उठ गया था. आज वे उसकी परवरिश अपनी संतान की तरह कर रही हैं. हैरानी की बात यह है कि अनिता ठाकुर कोई बहुत अमीर महिला नहीं हैं. वे खुद एक साधारण आदिवासी परिवार से आती हैं और नर्मदा किनारे अभावों में जीवन जी रही हैं. उनके पास महज डेढ़ एकड़ जमीन है.

कागजों तक सीमित रही जमीन

सरकार ने उन्हें ढाई एकड़ जमीन आवंटित तो की थी, लेकिन वह सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई. जमीन के उस हिस्से पर आज भी दबंगों का कब्जा है. तमाम आर्थिक तंगियों और संघर्षों के बावजूद, अनिता ने कभी अपनी गरीबी को दूसरों की खुशियों के बीच नहीं आने दिया. वे अपनी छोटी सी जमापूंजी और संसाधनों को जुटाकर शादियों का प्रबंध करती हैं. इस पुनीत कार्य में उनके तीनों बेटे भी कंधे से कंधा मिलाकर अपनी मां का साथ देते हैं.

सिस्टम की बेरुखी पर संभाला मोर्चा

अनिता ठाकुर के इस मिशन की शुरुआत के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है. ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना किसी चुनौती से कम नहीं है. जब गांव की निर्धन कन्याओं के विवाह के लिए सरकारी मदद मांगी गई, तो जटिल दस्तावेजी प्रक्रिया और प्रमाण पत्रों की कमी आड़े आ गई. कई पात्र युवतियां सरकारी सहायता से वंचित रह गईं. सिस्टम की इस बेरुखी को देखकर अनिता ने संकल्प लिया कि वे कागजों की मोहताज नहीं रहेंगी.

उम्मीद बनीं अनिता ठाकुर

उन्होंने मेहनत और निजी संसाधनों से शादियां कराना शुरू कर दिया. मम्मी के नाम से मशहूर अनीता ठाकुर ने मुस्कान पटेल, अंजी ठाकुर, लक्ष्मी ठाकुर, पूनम ठाकुर, कीर्ति ठाकुर, नेहा ठाकुर, दर्शना बर्मन, सोमवती ठाकुर, बइयो ठाकुर साथ ही एक युवक छोटेलाल ठाकुर का घर भी अनिता ने ही बसाया. आज ढिमर जोझी और आसपास के गांवों में अनिता ठाकुर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक उम्मीद का नाम बन चुकी हैं.

लोग उन्हें आदर से ‘मम्मी’ कहते हैं. जब भी किसी गरीब परिवार में बेटी की शादी की चिंता होती है तो सबकी निगाहें अनिता की ओर उठती हैं. वे न केवल आर्थिक मदद करती हैं, बल्कि गृहस्थी का जरूरी सामान जुटाने से लेकर विदाई तक की हर रस्म एक सगी मां की तरह निभाती हैं.

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