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90 हजार की नौकरी, सादा जीवन… फिर भी 15 लाख का कर्ज, वायरल कहानी ने खोल दी आंखें…

90 हजार की नौकरी, सादा जीवन… फिर भी 15 लाख का कर्ज, वायरल कहानी ने खोल दी आंखें…

LinkedIn Viral Post: मिडिल क्लास परिवारों में बजट को लेकर हमेशा से एक सधा हुआ गणित चलता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिना किसी गलती या लापरवाही के भी एक आम इंसान कर्ज के ऐसे चक्रव्यूह में फंस सकता है जहाँ से निकलना नामुमकिन सा लगने लगे? फाइनेंशियल एडवाइजर विवेक ने लिंक्डइन पर एक बेहद चौंकाने वाला मामला शेयर किया है. उन्होंने बताया कि पुणे में रहने वाला एक 36 वर्षीय ऑपरेशंस मैनेजर आज 15 लाख रुपये के कर्ज के नीचे दबा हुआ है. हैरानी की बात यह है कि हर महीने 90,000 रुपये कमाने वाले इस शख्स ने कभी कोई गलत आर्थिक फैसला नहीं लिया था.

करीब 3 साल पहले तक इस शख्स की जिंदगी बिल्कुल पटरी पर थी. वह बिना किसी उधारी के एक सुकून भरी जिंदगी जी रहा था. उसकी टेक-होम सैलरी हर महीने 90,000 रुपये थी. इसमें से 82,000 रुपये उसके घर के जरूरी खर्चों, राशन, बच्चों की स्कूल फीस और माता-पिता की दवाइयों में चले जाते थे. हर महीने करीब 8,000 रुपये बचते थे. बचत भले ही कम थी, लेकिन सिर पर कोई कर्ज नहीं था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक उसके पिता बीमार पड़ गए. डॉक्टरों ने तत्काल एक इमरजेंसी सर्जरी की सलाह दी, जिसका कुल खर्च 5 लाख रुपये आया.

हाथ में इतना बड़ा कैश अमाउंट न होने के कारण, इस शख्स को मजबूरी में 14% की ब्याज दर पर 5 लाख रुपये का पर्सनल लोन लेना पड़ा. इस लोन की मासिक ईएमआई (EMI) 13,663 रुपये तय हुई. बस यही वह पहला फैसला था, जिसने उसके पूरे बजट का संतुलन बिगाड़ दिया.

EMI का बोझ और क्रेडिट कार्ड का खतरनाक जाल

अब जरा इस जाल के पीछे की वित्तीय गणित को समझिए. लोन की EMI आने के बाद उस शख्स की जिंदगी कैसे बदल गई. पहले घर का जरूरी खर्च 82,000 रुपये था, जिसमें अब 13,663 रुपये की EMI भी जुड़ गई. यानी अब उसका कुल मासिक खर्च बढ़कर लगभग 96,000 रुपये हो गया. लेकिन उसकी सैलरी तो अभी भी 90,000 रुपये ही थी. नतीजा ये हुआ कि वो हर महीने करीब 6,000 रुपये शॉर्ट (कम) होने लगा. इस हर महीने होने वाली 6,000 रुपये की कमी को पूरा करने के लिए उसने अपने क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. घर का राशन, पेट्रोल और छोटे-मोटे खर्च क्रेडिट कार्ड पर शिफ्ट हो गए.

40% का भारी-भरकम ब्याज

महज एक साल के अंदर उसके क्रेडिट कार्ड का बिल 4 लाख रुपये तक पहुंच गया. अब उसे क्रेडिट कार्ड का आउटस्टैंडिंग बैलेंस संभालने के लिए हर महीने 20,000 रुपये का मिनिमम ड्यू पेमेंट (Minimum Amount Due) करना पड़ रहा था, वह भी 40% के बेहद भारी ब्याज दर के साथ.

रायता समेटने के लिए एक और कर्ज; सिबिल स्कोर हुआ धड़ाम

जब क्रेडिट कार्ड का बिल और पर्सनल लोन की ईएमआई दोनों मिलकर बेकाबू होने लगे, तो इस स्थिति से निपटने के लिए उसने एक और बड़ा लोन लेने का फैसला किया. तब तक लगातार क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करने और वित्तीय दबाव के कारण उसका क्रेडिट स्कोर काफी गिर चुका था. खराब सिबिल स्कोर की वजह से उसे जो नया लोन मिला, वह बेहद महंगी दर पर मिला. उसे 6 लाख रुपये का एक और लोन लेना पड़ा, जिस पर बैंक ने 18% का भारी ब्याज वसूला. अब उसकी जिंदगी में 17,625 रुपये की एक और नई EMI जुड़ गई.

कमाई का 57% सिर्फ ब्याज में

पिछले दो सालों में हालात सुधरने के बजाय बदतर होते चले गए. आज की तारीख में उस पर कुल 15 लाख रुपये का कर्ज है. वह अपनी महीने की सैलरी का 57% हिस्सा, यानी लगभग 51,000 रुपये, सिर्फ पुराने कर्जों की EMI चुकाने में दे रहा है. विवेक के मुताबिक, वह शख्स अब सिर्फ ‘रॉबिन हुड’ वाली स्थिति में है— यानी पुराना कर्ज चुकाने के लिए लगातार नया कर्ज ले रहा है.

वित्तीय चक्रव्यूह से बचने के लिए एक्सपर्ट की सलाह

इस डरावनी स्थिति का विश्लेषण करते हुए फाइनेंशियल एडवाइजर विवेक कहते हैं कि कर्ज का चक्रव्यूह ठीक इसी तरह काम करता है. आपका एक लोन एक नई EMI को जन्म देता है, जो आपके हाथ का कैश कम करती है और वही कमी आपको अगला लोन लेने पर मजबूर करती है. इस जाल से बचने के लिए उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण टिप्स दिए हैं. अगर आपकी कुल मासिक EMI आपकी टेक-होम सैलरी के 40% से ज्यादा हो चुकी है, तो इसे तुरंत खतरे की घंटी (Red Flag) समझें.

इस स्थिति से बाहर निकलने का सबसे पहला और बुनियादी नियम यह है कि किसी भी नए लोन या क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल तुरंत बंद कर दें. अपने सभी कर्जों और उनकी ब्याज दरों की एक स्पष्ट लिस्ट बनाएं. सबसे पहले उस कर्ज को पूरी ताकत लगाकर चुकाएं जिस पर सबसे ज्यादा ब्याज (जैसे क्रेडिट कार्ड का 40% ब्याज) लग रहा हो. यह कहानी सिखाती है कि जीवन में कम से कम 6 महीने के खर्च के बराबर एक ‘इमरजेंसी फंड’ का होना कितना जरूरी है, ताकि किसी मेडिकल इमरजेंसी के वक्त आपको लोन के जाल में न फंसना पड़े.

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