
आज के समय में जब हर हाथ में स्मार्टफोन है और हर खाली पल सोशल मीडिया, वीडियो या गेम्स में बीत जाता है, तब एक नई चिंता सामने आ रही है। हाल ही में कई विद्यालयों और अभिभावकों ने यह महसूस किया है कि बच्चे पहले की तुलना में अधिक व्यस्त तो हैं, लेकिन उनकी कल्पनाशक्ति, धैर्य और स्वयं से कुछ नया सोचने की क्षमता कम होती जा रही है। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमने बच्चों के जीवन से वह “खाली समय” छीन लिया है, जहाँ से रचनात्मकता जन्म लेती है? दरअसल, बोरियत कोई नकारात्मक स्थिति नहीं है। यह मन का वह शांत क्षण है, जब बाहर का शोर कम होता है और भीतर के विचार आकार लेने लगते हैं। जब बच्चे कुछ देर बिना किसी स्क्रीन, खिलौने या तय गतिविधि के रहते हैं, तब उनका मन अपने लिए नए रास्ते खोजता है। वे कहानियाँ गढ़ते हैं, चित्र बनाते हैं, नए खेल सोचते हैं, प्रश्न पूछते हैं और अपनी कल्पना की दुनिया में खो जाते हैं। यही प्रक्रिया उनकी रचनात्मकता को विकसित करती है।
व्यस्त बचपन, खोती कल्पनाशक्ति
इसके विपरीत आज अधिकांश बच्चों का दिन पहले से तय होता है। सुबह स्कूल, फिर ट्यूशन, उसके बाद खेल की कोचिंग और बचा हुआ समय मोबाइल या टीवी। हर पल किसी न किसी गतिविधि से भरा हुआ है। ऐसे में बच्चे के पास अपने मन से सोचने और कुछ नया करने का अवसर ही नहीं बचता। वह लगातार जानकारी तो प्राप्त करता है, लेकिन अपने विचारों को जन्म देने का समय नहीं पाता। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि रचनात्मक सोच अक्सर तब विकसित होती है, जब मन कुछ समय के लिए किसी दबाव या निर्देश से मुक्त होता है। यही कारण है कि कई बड़े वैज्ञानिकों, लेखकों और कलाकारों ने स्वीकार किया है कि उनके कई महत्वपूर्ण विचार उन्हें आराम, सैर या शांत बैठने के दौरान आए। जब मन को भटकने की आजादी मिलती है, तभी वह नए संबंध जोड़ता है और नई संभावनाएं खोजता है।
हर पल व्यस्त रखना जरूरी नहीं
यहां यह समझना भी आवश्यक है कि बोरियत का अर्थ आलस्य नहीं है। पूरे दिन बिना उद्देश्य के समय बिताना लाभदायक नहीं हो सकता, लेकिन हर क्षण को किसी न किसी काम से भर देना भी उतना ही नुकसानदायक है। जीवन में संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। बच्चों को कुछ ऐसा समय अवश्य मिलना चाहिए, जिसमें वे अपनी पसंद से कुछ करें या कुछ भी न करें। यही स्वतंत्रता उन्हें आत्मनिर्भर सोच की ओर ले जाती है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका मातापिता और शिक्षकों की है। अक्सर बच्चे के शांत बैठते ही हम उसे मोबाइल पकड़ा देते हैं या किसी नई गतिविधि में लगा देते हैं। हमें यह समझना होगा कि हर खाली समय को भरना आवश्यक नहीं है। यदि बच्चा खिड़की से बाहर देख रहा है, बादलों को निहार रहा है या अकेले बैठा है, तो संभव है कि उसका मन किसी नई कल्पना को जन्म दे रहा हो। ऐसे क्षणों को रोकने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।
खाली समय से ऊंची उड़ान
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह नहीं कि बच्चों को हर समय व्यस्त रखा जाए, बल्कि यह है कि उन्हें सोचने, सपने देखने और अपनी कल्पनाओं को उड़ान देने का अवसर मिले। कुछ पल की बोरियत भविष्य की बड़ी खोज, सुंदर कविता, नई कहानी या अनोखे विचार की शुरुआत बन सकती है। इसलिए हमें बोरियत को समस्या नहीं, बल्कि रचनात्मकता की पहली सीढ़ी के रूप में देखना चाहिए। जब बच्चों को थोड़ा खाली आकाश मिलेगा, तभी उनके विचार ऊंची उड़ान भर पाएंगे और वही उड़ान भविष्य के नवाचारों तथा एक संवेदनशील समाज की नींव बनेगी।
शिक्षा में मिले कल्पना के पंख
विद्यालयों को भी केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बच्चों को चित्रकला, कहानी लेखन, संगीत, नाटक, बागवानी और मुक्त चर्चा जैसी गतिविधियों के अवसर मिलने चाहिए। साथ ही, कुछ समय ऐसा भी होना चाहिए, जहां वे बिना किसी निर्धारित लक्ष्य के अपनी रुचि के अनुसार सोच और सीख सकें। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि सोचने की क्षमता विकसित करना भी है। डिजिटल युग में तकनीक से दूरी बनाना संभव नहीं है और न ही इसकी आवश्यकता है। तकनीक सीखने का प्रभावी माध्यम है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग ही उचित है। यदि बच्चे का हर खाली पल स्क्रीन पर बीतेगा, तो उसकी कल्पना धीरेधीरे तैयार सामग्री पर निर्भर हो जाएगी। जबकि रचनात्मकता तब जन्म लेती है, जब मन स्वयं कुछ नया रचने का प्रयास करता है।
रचनात्मकता ही भविष्य की ताकत
इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि रचनात्मकता केवल कलाकारों या लेखकों के लिए ही आवश्यक नहीं होती, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में इसकी आवश्यकता पड़ती है। एक वैज्ञानिक नई खोज करता है, एक डॉक्टर उपचार का नया तरीका सोचता है, एक इंजीनियर बेहतर तकनीक विकसित करता है और एक उद्यमी नई समस्याओं का समाधान खोजता है। इन सभी की शुरुआत कल्पनाशील सोच से होती है। यदि बचपन से ही बच्चों को केवल तैयार उत्तर याद करने और तय नियमों का पालन करने की आदत डाल दी जाएगी, तो वे भविष्य में नए विचारों के बजाय केवल पुराने तरीकों को दोहराने तक सीमित रह सकते हैं।
बच्चों से संवाद भी जरूरी
आज परिवारों में संवाद का समय भी पहले की तुलना में कम होता जा रहा है। यदि मातापिता बच्चों के साथ प्रतिदिन कुछ समय बिना मोबाइल के बातचीत करें, उनके सवालों को ध्यान से सुनें और उन्हें अपनी कल्पनाएं व्यक्त करने का अवसर दें, तो यह उनकी रचनात्मक क्षमता को और मजबूत बना सकता है। प्रकृति के बीच समय बिताना, पुस्तकें पढ़ना, डायरी लिखना और छोटेछोटे प्रयोग करना भी बच्चों के भीतर छिपी सृजनशीलता को जगाने के प्रभावी माध्यम हैं। वास्तव में, रचनात्मकता किसी महंगे संसाधन की मोहताज नहीं होती, उसे केवल स्वतंत्र सोच, धैर्य और थोड़ासा खाली समय चाहिए। यही खाली समय बच्चों को केवल सफल ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, आत्मविश्वासी और मौलिक व्यक्तित्व वाला इंसान भी बनाता है।
डॉ. मोनिका राज, असिस्टेंट प्रोफेसर, बी एन मंडल यूनिवर्सिटी, मधेपुरा
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