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​मीना दिवस : कंधे पर बस्ता नहीं हाथ में लैपटॉप लेकर स्कूल जाती है मीना, जानिए 1990 से कितनी बदल गई Meena

​मीना दिवस :  कंधे पर बस्ता नहीं हाथ में लैपटॉप लेकर स्कूल जाती है मीना, जानिए 1990 से कितनी बदल गई Meena

दरख्शां कदीर सिद्दीकी, लखनऊ : उत्तर प्रदेश के 45 हजार सरकारी स्कूलों में गुरुवार को ‘मीना दिवस’ बहुत ही धूमधाम और खुशी के साथ मनाया गया। इस मौके पर ‘मीना मंच’ के जरिए बच्चियों ने पढ़ाईलिखाई, बराबरी, अपनी सुरक्षा, अच्छी सेहत और अपने अधिकारों जैसे बड़े मुद्दों पर खुलकर बात की और सबको जागरूक किया। यूनिसेफ ने 1990 में लड़के और लड़कियों की परवरिश में हो रहे भेदभाव को खत्म करने के लिए 9 साल की मीना नाम का काल्पनिक कार्टून कैरेक्टर तैयार किया। वहीं मीना आज रेडियो से निकलकर स्मार्ट स्क्रीन तक पहुंच चुकी है और अब वह पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा रही है। जानिए 1990 से अब तक कितनी बदल गई मीना। 

कंधे पर बस्ता, हाथ में तोता मिट्ठू और आंखों में वही निडर मुस्कान लिए यह डिजिटल मीना आज यूपी के सरकारी स्कूलों में बेटियों को आत्मनिर्भर और टेकसैवी बनाने का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है।

गांव की गलियों से निकलकर कॉरपोरेट कार्यालयों और सोशल मीडिया तक पहुंची मीना का यह सफर सिर्फ एक लड़की के बदलने की कहानी नहीं, बल्कि हर उस औरत की उड़ान है जो अपने हक के लिए सीना ठोककर खड़ी होती है। आइए जानते हैंमिट्ठू तोते वाली सीधीसाधी मीना से लेकर आज की टेकसेवी, बिंदास ‘मॉडर्न मीना’ बनने की यह बेहद खूबसूरत और दमदार कहानी!

गांव की पगडंडियों से निकलकर यूनिसेफ की सबसे चहेती लाडली ‘मीना’ अब स्मार्ट स्क्रीन पर धाक जमाने के लिए पूरी तरह तैयार है। वही मीना, जो कभी पोस्टरों और रेडियो की आवाज़ बनकर बेटियों को स्कूल भेजने की अलख जगाती थी, अब स्मार्ट टीवी, यूट्यूब और मोबाइल ऐप्स के जरिए 21वीं सदी का नया पाठ पढ़ा रही है। बेसिक शिक्षा विभाग और यूनिसेफ के इस साझा प्रयास ने ‘मीना मंच’ को पूरी तरह हाईटेक रंग में ढाल दिया है।

1990 से 2026 तक: कैसेकैसे बदली अपनी ‘मीना’

1990 का दौर: बुनियादी हक और पहचान

यूनिसेफ ने जब दक्षिण एशिया में मीना कैरेक्टर लॉन्च किया, तब इसका एकमात्र मकसद था बेटियों को बुनियादी हक दिलाना। उस दौर में मीना सिर्फ कॉमिक बुक्स, पोस्टरों और चौपालों तक सीमित थी। कहानियों का पूरा फोकस इस बात पर रहता था कि बेटियों को भी लड़कों के बराबर खाना मिले, उन्हें स्कूल भेजा जाए, और बालविवाह व बालश्रम जैसी कुरीतियों पर रोक लगे।

2000 का दौर: रेडियो और मीना की दुनिया

शताब्दी बदलते ही मीना की आवाज़ घरघर गूंजने लगी। ऑल इंडिया रेडियो पर ‘मीना की दुनिया’ नाम का रेडियो कार्यक्रम शुरू हुआ। स्कूलों में ‘मीना मंच’ गठित हुए और नाटकों के ज़रिए गांवगांव में बालिकाओं को एकजुट किया जाने लगा। इस दौर में स्वास्थ्य, पर्सनल हाइजीन और लड़कियों की ड्रॉपआउट रेट रोकने पर सबसे ज़्यादा जोर दिया गया।

2010 का दौर: स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षा

इस दशक में मीना थोड़ी और मुखर हुई। समाज में रूढ़िवादी माने जाने वाले मुद्दों जैसे माहवारी स्वच्छता , सेनेटरी पैड का इस्तेमाल और बालयौन शोषण से बचाव के लिए ‘गुड टचबैड टच’ जैसे संवेदनशील विषयों को मीना की कहानियों का हिस्सा बनाया गया। मीना अब सिर्फ सवाल पूछने वाली बच्ची नहीं, बल्कि गांव में बदलाव लाने वाली छोटी लीडर बन चुकी थी।

2020 से अब तक:  डिजिटल अवतार और साइबर सुरक्षा

कोविड काल के बाद जब पढ़ाई ऑनलाइन हुई, तो मीना ने भी डिजिटल रूप धर लिया। अब स्कूलों में कागज़ी किताबों की जगह स्मार्ट क्लास, प्रोजेक्टर और एनिमेटेड वीडियो ने ले ली है। आज की ‘मॉडर्न मीना’ अब सिर्फ चूल्हेचौके के भेदभाव की बात नहीं करती, बल्कि गांवदेहात की लड़कियों को स्मार्टफोन का सही इस्तेमाल, ऑनलाइन फ्रॉड से बचाव, सोशल मीडिया की सुरक्षा और साइबर बुलिंग से निपटना सिखा रही है।

‘डिजिटल मीना’ के ये हैं नए तेवर

साइबर सेफ्टी और टेकस्मार्ट: अब मीना गांव की बेटियों को समझा रही है कि अनजान लिंक पर क्लिक न करें, अपना पासवर्ड किसी से शेयर न करें और ऑनलाइन ठगी होने पर हेल्पलाइन पर शिकायत कैसे दर्ज कराएं।

हेल्पलाइन नंबरों की सीधी जानकारी: 1090 , 1098 और 112 जैसी आपातकालीन सेवाओं का इस्तेमाल कैसे करना है, मीना अब चुटकियों में सिखाती है।

क्लाइमेट चेंज और जीवन कौशल: पर्यावरण बचाओ आंदोलन से लेकर आत्मनिर्भर बनने और लीडरशिप क्वालिटी विकसित करने तक के गुण अब मीना की नई एनिमेटेड सीरीज़ में शामिल हैं।

मीना ने हर लड़की को सिखाया बेबाक होना

बेसिक शिक्षा अधिकारी विपिन कुमार का कहना है कि स्कूलों में मीना मंच के जरिए लड़कियों को एक सुरक्षित, बराबरी वाला और मजबूत माहौल देने के लिए लगातार काम किया जा रहा है। वहीं कंधे पर बस्ता, हाथ में मिट्ठू तोता और आंखों में निडर मुस्कान यह पहचान थी उस मीना की, जिसने हर लड़की को बेबाक होना सिखाया। वक्त बदला, दौर बदला और वही मीना आज मॉडर्न अवतार में हमारे सामने है। 

हौसलों को नई उड़ान देने का संकल्प है मीना दिवस : मोनिका रानी

मोनिका रानी,
महानिदेशक स्कूल शिक्षा

 

 

महानिदेशक स्कूल शिक्षा मोनिका रानी ने बताया कि मीना दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी बेटियों के हौसलों को नई उड़ान देने का संकल्प है।  हर विद्यालय में मीना मंच की गतिविधियों से बेटियों को जागरूक, सशक्त और आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

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