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प्रयागराज में रामलीला के लिए ‘मुस्लिम’ कारीगर बना रहे धनुष-बाण और दिव्य अस्त्र-शस्त्र, पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल.

प्रयागराज में रामलीला के लिए ‘मुस्लिम’ कारीगर बना रहे धनुष-बाण और दिव्य अस्त्र-शस्त्र, पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल.

प्रयागराज: नवरात्रि और दशहरे की तैयारियों के बीच प्रयागराज की ऐतिहासिक श्री पथरचट्टी रामलीला कमेटी में एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो धार्मिक सद्भाव और पारंपरिक कारीगरी की मिसाल पेश करती है। यहां मुस्लिम कारीगर निसार अहमद कई वर्षों से रामलीला में इस्तेमाल होने वाले अस्त्र-शस्त्र, रथ और अन्य सामान तैयार करते आ रहे हैं।

निसार की बनाई कारीगरी में भगवान राम की लीला में इस्तेमाल होने वाले धनुष-बाण, गदा, तलवार, त्रिशूल और अन्य पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र शामिल हैं। वह इन वस्तुओं को इस तरह तैयार करते हैं कि मंचन के दौरान उनका स्वरूप आकर्षक और प्रभावशाली नजर आए।

पीढ़ियों से जुड़ा है रामलीला का काम

निसार अहमद का परिवार लंबे समय से कारीगरी के इस काम से जुड़ा है। बताया जाता है कि उनके पिता और दादा भी पथरचट्टी रामलीला से जुड़े रहे हैं। इस तरह रामलीला के लिए सामान तैयार करने का हुनर उन्हें परिवार से विरासत में मिला।

दिलचस्प बात यह है कि उनका परिवार मोहर्रम के दौरान ताजिए बनाने के लिए भी जाना जाता है। एक ओर मोहर्रम के लिए ताजिए तैयार किए जाते हैं तो दूसरी ओर दशहरे के समय रामलीला के लिए अस्त्र-शस्त्र और रथ बनाने का काम किया जाता है।

भगवान राम का किरदार पसंद है

निसार बताते हैं कि उन्हें रामलीला के लिए काम करने में खुशी और सुकून मिलता है। उन्होंने रामानंद सागर की ‘रामायण’ भी देखी है और भगवान राम का किरदार उन्हें काफी पसंद है।

उनका कहना है कि हर धर्म में अच्छाई और शक्ति का संदेश मिलता है। उनके लिए रामलीला के लिए सामान तैयार करना केवल कारीगरी का काम नहीं, बल्कि अपनी कला और परंपरा से जुड़ी सेवा भी है।

परिवार और मोहल्ले ने कभी नहीं जताई आपत्ति

निसार के मुताबिक, उनके परिवार, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने कभी उनके रामलीला से जुड़े काम पर आपत्ति नहीं जताई। उनका मानना है कि समाज में सभी लोगों को मिल-जुलकर रहना चाहिए।

वह खुद रामलीला देखने भी जाते हैं और भगवान राम की लीला के मंचन के लिए अपनी कला का योगदान देना अपने लिए सम्मान की बात मानते हैं। उनकी इच्छा है कि वह आखिरी समय तक अपनी इस कला से जुड़े रहें।

कला के जरिए मजबूत होती है सद्भाव की परंपरा

श्री पथरचट्टी रामलीला कमेटी अपनी भव्य प्रस्तुतियों और आधुनिक लाइट एंड साउंड व्यवस्था के लिए जानी जाती है। ऐसे बड़े आयोजन को तैयार करने में कलाकारों और कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

निसार अहमद की कहानी इसी परंपरा का एक उदाहरण है। मोहर्रम के लिए ताजिए और रामलीला के लिए अस्त्र-शस्त्र बनाने वाला उनका परिवार दिखाता है कि कला और हुनर कई बार धार्मिक सीमाओं से आगे जाकर लोगों को जोड़ने का काम करते हैं। प्रयागराज की यह परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी सद्भाव की एक खूबसूरत तस्वीर पेश करती है।

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