
शहर की तेज रफ्तार जिंदगी से दूर पहाड़ों में कुछ दिन बिताना कई लोगों का सपना होता है। छुट्टियों में लोग पहाड़ों की ठंडी हवा, शांत वातावरण और खूबसूरत नजारों का आनंद लेने पहुंचते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग कुछ दिन बाद वापस अपनी पुरानी जिंदगी में लौट आते हैं।
नयनतारा चौहान की कहानी इससे अलग है। कॉर्पोरेट लॉयर की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने मनाली में आउटडोर शेफ के तौर पर काम करना शुरू किया और अब वह लद्दाख के एक गांव में करीब दो महीने से रह रही हैं। सोशल मीडिया पर साझा किए गए उनके अनुभवों ने लोगों को लद्दाख की जिंदगी का एक ऐसा पहलू दिखाया है, जो आमतौर पर पर्यटकों को नजर नहीं आता।
ड्राई टॉयलेट का इस्तेमाल कर समझी पानी की कीमत
नयनतारा के मुताबिक, लद्दाख के गांव में रहना उनके लिए सिर्फ खूबसूरत पहाड़ों के बीच समय बिताना नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की कई ऐसी चीजों से सामना भी है जो शहरों में रहने वालों के लिए सामान्य नहीं हैं।
उन्होंने बताया कि गांव में ड्राई टॉयलेट का इस्तेमाल किया जाता है। शुरुआत में उन्हें इसे अपनाने में कुछ परेशानी हुई और करीब एक सप्ताह में वह इसकी आदत डाल पाईं।
यहां सामान्य फ्लश वाले टॉयलेट की तरह बड़ी मात्रा में पानी इस्तेमाल नहीं होता। पानी की जगह पेपर और मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। नयनतारा का कहना है कि इस अनुभव ने उन्हें शहरों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले पानी की अहमियत को नए तरीके से समझने का मौका दिया।
उनके मुताबिक, शहर में एक बार फ्लश करने में कितना पानी खर्च हो जाता है, इसका एहसास लद्दाख जैसे इलाके में रहने के बाद ज्यादा स्पष्ट हुआ।
नदी पर निर्भर है पानी की सप्लाई
लद्दाख के साबु गांव में पानी की व्यवस्था भी शहरों जैसी आसान नहीं है। नयनतारा ने बताया कि गांव की पानी की सप्लाई पास से गुजरने वाली नदी के पानी पर निर्भर करती है।
नदी में पानी का बहाव मौसम और ग्लेशियर से आने वाले पानी के स्तर के साथ बदलता रहता है। जब पानी का बहाव पर्याप्त होता है तो घरों तक पानी पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान रहता है। लेकिन जब नदी का प्रवाह कम हो जाता है, तो ग्रामीण मिलकर पानी को घरों तक पहुंचाने की व्यवस्था करते हैं।
इसके लिए पानी का रास्ता तैयार करने के साथ रबड़ की पाइप और मोटर का इस्तेमाल किया जाता है। यह व्यवस्था नयनतारा के लिए शहर की लगातार उपलब्ध पानी की सप्लाई से बिल्कुल अलग अनुभव है।
शाम की चाय और ताजी सब्जियों में मिलता है सुकून
नयनतारा के अनुभवों में गांव की छोटी-छोटी चीजें भी खास जगह रखती हैं। उनका कहना है कि शाम के समय ठंडी हवा के बीच बैठकर चाय पीने का अनुभव अलग ही सुकून देता है।
यहां शहरों की तरह हर समय पिज्जा, बर्गर या दूसरी चीजें आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन ताजी सब्जियां मिल जाती हैं। खानपान साधारण है और जीवनशैली भी अपेक्षाकृत सीधी-सादी है।
गांव के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, हालचाल पूछते हैं, साथ बैठकर बातें करते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। नयनतारा को लोगों के बीच यह जुड़ाव खासा पसंद आया।
खूबसूरत नजारों से आगे की कहानी
लद्दाख को आमतौर पर ऊंचे पहाड़ों, बर्फीले इलाकों और खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों के लिए जाना जाता है। लेकिन नयनतारा ने अपने सोशल मीडिया वीडियो में पर्यटन से अलग वहां की रोजमर्रा की जिंदगी दिखाने की कोशिश की है।
उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर लद्दाख में रहने के अनुभव से जुड़े करीब 28 वीडियो साझा किए हैं। इनमें गांव का जीवन, पानी की व्यवस्था, रहने की परिस्थितियां, खानपान और स्थानीय लोगों की दिनचर्या जैसे पहलू दिखाई देते हैं।
उनके वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। कुछ लोगों ने उनके अनुभव को ऐसी जिंदगी से जोड़ा है, जिसे वे खुद जीना चाहते हैं, जबकि कुछ ने कहा कि किसी जगह को समझने के लिए उसकी खूबसूरती के साथ वहां की चुनौतियों को देखना भी जरूरी है।
अब शहर लौटने का नहीं कर रहा मन
करीब दो महीने गांव में रहने के बाद नयनतारा को यहां की सादगी और जीवनशैली पसंद आने लगी है। शहर की सुविधाओं से दूर रहने के बावजूद उन्हें ग्रामीण जीवन का आपसी जुड़ाव और प्रकृति के करीब रहने का अनुभव आकर्षित कर रहा है।
उनकी कहानी इस बात की ओर भी ध्यान खींचती है कि जिन सुविधाओं को शहरों में हम बिल्कुल सामान्य मानते हैं, उनकी अहमियत उन जगहों पर जाकर समझ आती है जहां पानी और दूसरी बुनियादी चीजों के लिए भी लोगों को प्रकृति और सामूहिक प्रयास पर निर्भर रहना पड़ता है।
नयनतारा के लिए लद्दाख का यह सफर सिर्फ एक यात्रा नहीं रह गया है। करीब दो महीने यहां बिताने के बाद उनका मन अब वापस शहर लौटने के बजाय इसी सादगी भरी जिंदगी में बसने का करने लगा है।



