बुधवार को भारत के सेंट्रल बैंक ने ‘सिस्टम के लिए जरूरी नॉनबैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों’ के लिए एक नया नियम लागू किया है, जो ‘अपरलेयर NBFCs’ से जुड़ा हुआ है. इसके तहत 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा एसेट वाली कंपनियों को शेयरों की पब्लिक लिस्टिंग करानी होगी. इस कदम से देश के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप की पैरेंट कंपनी के प्राइवेट बने रहने की संभावना लगभग खत्म हो गई है.

ऐसा करते हुए, बैंक ने इंडस्ट्री के उस सुझाव को खारिज कर दिया जिसमें इस सीमा को बढ़ाकर 2.5 लाख करोड़ रुपए करने की बात कही गई थी. बैंक ने यह भी कहा कि इस कैटेगरी में आने वाली कंपनियों की पहचान रेगुलेटर हर साल करेगा—यह शर्त उसने सबसे पहले 2002 में जारी किए गए स्केलबेस्ड रेगुलेशन में बताई थी. हालांकि, वित्त वर्ष 2026 में रेगुलेटर ने अपरलेयर NBFCs की कोई लिस्ट जारी नहीं की.
इन तमाम बातों के बीच अगर टाटा संस का आईपीओ आएगा तो वो देश के सभी आईपीओ का बाप हो सकता है. ये बात हम यूं ही नहीं कर रहे हैं. वैल्यूएशन के आधार पर देखें तो टाटा संस 5 फीसदी का शुरुआती आईपीओ भी लेकर आती है तो उसका साइज 60 से 70 हजार करोड़ रुपए के आसपास हो सकता है. जोकि जियो और एनएसई के आईपीओ के कुल आईपीओ साइज के बराबर है. अब आप समझ सकते हैं कि टाटा संस के लिए आईपीओ का ड्राफ्ट तैयार करना आसान नहीं होगा.
क्यों अहम है आरबीआई का नया सर्कूलर
सेंट्रल बैंक द्वारा जारी सैकड़ों टेक्निकल सर्कुलर में से यह खास सर्कुलर इसलिए अहम है क्योंकि अपरलेयर NBFC रेगुलेशन को लेकर एक खास सवाल है—क्या टाटा ग्रुप की पैरेंट कंपनी ‘टाटा संस’ को पब्लिक लिस्टिंग करानी होगी? बुधवार के सर्कुलर ने उस रेगुलेटरी सीमा को फाइनल कर दिया जिसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे पहले अप्रैल में एक ड्राफ्ट सर्कुलर में पेश किया था. पहले, अपरलेयर NBFC के तौर पर शामिल होना इस बात पर निर्भर करता था कि कंपनी एसेट साइज के हिसाब से देश की टॉप 10 कंपनियों में है या नहीं.
टाटा संस की लिस्टिंग पर सवाल
नमक से लेकर सेमीकंडक्टर तक का कारोबार करने वाले इस बड़े ग्रुप की अनलिस्टेड होल्डिंग कंपनी, टाटा संस को सितंबर 2025 की मूल डेडलाइन तक लिस्ट होने का निर्देश दिया गया था. पिछले साल जनवरी में, जब RBI ने लिस्ट होने वाली अपरलेयर NBFCs की लिस्ट जारी की थी, तो उसने कहा था कि टाटा संस की NBFC लाइसेंस सरेंडर करने की अर्ज़ी पर विचार किया जा रहा है. तब से, रेगुलेटर इस मामले पर पूरी तरह खामोश है.
टाटा संस की ज्यादातर हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने एक प्रस्ताव पास किया है जिसमें कहा गया है कि कंपनी को अनलिस्टेड ही रहना चाहिए. इसके बाद, इसके दो वाइस चेयरमैनवेणु श्रीनिवासन और विजय सिंहने सार्वजनिक बयानों में कहा है कि लिस्टिंग एक अच्छा नतीजा होगा. उनके बयानों से ट्रस्टीज के बीच मतभेद पैदा हो गए हैं, जिनमें ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा भी शामिल हैं, जिन्होंने लिस्टिंग का कड़ा विरोध किया है.
लिस्टिंग से पड़ सकता है असर
टाटा संस की पब्लिक लिस्टिंग के दूरगामी असर हो सकते हैं, क्योंकि इसके शेयरहोल्डर इसके बोर्ड पर कंट्रोल रखते हैं. इसके सबसे बड़े मालिक, यानी टाटा ट्रस्ट्स के तहत आने वाले पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट्स के पास खास अधिकार हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के तौर पर इसके स्ट्रक्चर में ये सुविधाएं मिलती हैं. अगर कंपनी को पब्लिक लिमिटेड स्ट्रक्चर में बदला जाता है जो पब्लिक लिस्टिंग के लिए जरूरी है तो ये सुविधाएं खत्म हो जाएंगी.
अभी अहम फैसलों के लिए टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स की मंजूरी जरूरी होती है, जबकि पब्लिक कंपनी में बोर्ड के सभी सदस्यों का वोट बराबर होगा, जिससे ट्रस्ट्स का कंट्रोल करने वाला मुख्य जरिया खत्म हो जाएगा. नए नियम उस तारीख से लागू होंगे जब RBI उन कंपनियों की नई लिस्ट जारी करेगा जो ‘अपर लेयर’ कैटेगरी में आएंगी.
RBI ने कहा कि अपर लेयर में वे NBFCs शामिल होंगी जिनकी एसेट साइज फाइनेंशियल ईयर की लेटेस्ट ऑडिटेड बैलेंस शीट के अनुसार 1 लाख करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा है. NBFCUL एंटिटीज की पहचान करने के तरीके पर जारी फाइनल गाइडलाइंस में, सेंट्रल बैंक ने पहले के कई पैरामीटर वाले तरीके को आसान बना दिया और एसेट की लिमिट को बढ़ाकर 2.5 लाख करोड़ रुपए करने के सुझावों को खारिज कर दिया.
टाटा संस का एसेट बेस
ईटी की रिपोर्ट के अनुसार कि टाटा संस का स्टैंडअलोन एसेट साइज़ लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपए है. टाटा ग्रुप का कंसोलिडेटेड मार्केट कैपिटलाइज़ेशन 300 बिलियन डॉलर से ज्यादा है. इस मामले से जुड़े ग्रुप के सीनियर अधिकारियों ने कहा कि रेगुलेटरी बदलावों से भविष्य में टाटा संस की लिस्टिंग की संभावना बनी हुई दिखती है, हालांकि इसके असर का बारीकी से अध्ययन करना होगा. वैसे आरबीआई के नए नियम आने के टाटा ग्रुप की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.
RBI ने कहा कि उसे थ्रेशोल्ड को कम से कम 2.5 लाख करोड़ रुपए तक बढ़ाने के साथसाथ प्रॉफिटेबिलिटी और एसेट क्वालिटी जैसे अतिरिक्त पैरामीटर्स को शामिल करने के सुझाव मिले थे. हालांकि, उसने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कहा कि 1 लाख करोड़ की सीमा सेक्टर के मौजूदा प्रोफाइल और मौजूदा अपरलेयर NBFCs के एनालिसिस के आधार पर तय की गई थी.
आरबीआई को दिए गए थे सुझाव
RBI को दिए गए सुझावों में तर्क दिया गया कि केवल एसेट साइज़ से सिस्टम के लिए कंपनी की अहमियत का पूरी तरह पता नहीं चल सकता है, इसलिए इसमें आपसी जुड़ाव और सिस्टम से जुड़े जोखिम को दिखाने वाले पैरामीटर्स भी शामिल किए जाने चाहिए. इसमें यह भी कहा गया कि किसी भी संशोधित तरीके में कंपनी के रिस्क प्रोफ़ाइल, लेवरेज, आपसी जुड़ाव और अन्य सुपरवाइज़री बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए.
रेगुलेटर ने पहले के पैरामीट्रिक स्कोरिंग तरीके को हटाकर एसेट साइज़ का स्पष्ट क्राइटेरिया अपनाकर फ्रेमवर्क को और अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में भी कदम उठाया है. उसका कहना है कि यह सिस्टम के लिए अहमियत का एक काफी अच्छा पैमाना है.
इसके अलावा, RBI ने कहा कि सरकारी स्वामित्व वाली NBFCs के लिए लिस्टिंग अनिवार्य नहीं होगी, क्योंकि उनका मकसद विकास से जुड़ा होता है.



