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Passport-Citizenship Row: बंटवारे के बाद भारत-पाक पासपोर्ट क्यों जारी होता था? यह है पूरी कहानी

भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है. यह केवल विदेश यात्रा की अनुमति और विदेशों में पहचान सुनिश्चित करने का एक जरूरी दस्तावेज भर है. सरकार को यह इसलिए स्पष्ट करना पड़ा क्योंकि लोग पासपोर्ट, आधार या वॉटर कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मान रहे हैं, जो पूर्ण सत्य नहीं है. इन सभी दस्तावेजों की उपयोगिता पहले से ही तय की गई है. भारतीय नागरिकता का निर्धारण सिटीजन शिप एक्ट 1955 में दर्ज नियमों से तय होता है. आइए इसी बहाने देश में पासपोर्ट की सुधार यात्रा को समझते हैं. यह भी जानते हैं कि बंटवारे के बाद भारतपाकिस्तान के जॉइन्ट पासपोर्ट की सच्चाई क्या है?

Passport-Citizenship Row: बंटवारे के बाद भारत-पाक पासपोर्ट क्यों जारी होता था? यह है पूरी कहानी

आजादी के बाद देश में पासपोर्ट के मामले में अनेक सुधार हुए हैं. जब देश आजाद हुआ तो न तो भारत के पास पर्याप्त सुविधाएं और तकनीक थे न ही के पास. आज देश में पासपोर्ट सेवा केंद्रों की संख्या 5 सौ से ज्यादा है. सरकार का लक्ष्य है कि अगले साल यानी 2027 तक हर लोकसभा क्षेत्र में कम से कम एक पासपोर्ट सेवा केंद्र जरूर हों. देश में अभी भी केवल 10 फीसदी आबादी के पास पासपोर्ट है. इस समय भारतीय पासपोर्ट धारक को 27 देशों में वीजा फ्री एंट्री है. 47 देशों में वीजा ऑन अराइवल की सुविधा है. 66 देश ईवीजा की सुविधा देते हैं.

अंग्रेजों के राज में एक सामान्य पासपोर्ट लागू था

अंग्रेज़ों के शासन में एक सामान्य पासपोर्ट व्यवस्था थी. लोग उसी व्यवस्था से परिचित थे. साल 1947 में देश आजाद हुआ और ब्रिटिश सत्ता समाप्त हो गई. पर, प्रशासन तुरंत बदलना संभव नहीं था. ऑफिस, प्रिंटिंग और नियमों का ट्रांज़िशन समय ले रहा था. इस खालीपन में कई पुराने दस्तावेज़ और कुछ साझा व्यवस्था चलती रही. विभाजन के तुरंत बाद लाखों लोगों ने सीमा पार की. नए पासपोर्ट बनवाना हर किसी के लिए तुरंत संभव नहीं था, इसलिए अस्थायी दस्तावेज़ दिए गए. इन्हें स्पेशल पास, ट्रैवल परमिट या ब्रितानीभारतीय पासपोर्ट की शेष प्रतिया कहा जा सकता है. लोगों की आवाजाही को रोकना मुश्किल था. प्रशासन ने व्यवधान कम करने के लिए कई सहज रास्ते अपनाए.

भारतपाकिस्तान पासपोर्ट.

भारतपाक की दोनों सरकारें नई, चुनौतियां भी

भारत और पाकिस्तान, दोनों ही देशों की सरकारें नए देश चला रही थीं. व्यवस्था बनाना अपने आप में चुनौती थी. पासपोर्ट जारी करने का नेटवर्क प्राथमिकता में कहीं पीछे था. ऐसे में जो व्यवस्था चल रही थी, दोनों ने उसे ही लागू रखा. नई व्यवस्था बनाने में समय लगना तय था. पूरा सिस्टम फिर से बनाया जाना था. कागज़, मुद्रण, पदाधिकारियों की नियुक्ति सबके लिए समय की जरूरत थी. इसलिए दोनों नई सरकारों ने कुछ पुरानी प्रक्रियाओं को बरकरार रखा. यह असल में जॉइंट व्यवस्था नहीं, पर साझा संक्रमण की व्यवस्था थी. ऐसा करने से सीमा पार लोगों को मुश्किल कम हुई. नया नागरिकता ढांचा और पासपोर्ट नियम बनाना कानून का काम था.

कई अंतरराष्ट्रीय देश उस समय ब्रिटिशभारतीय दस्तावेज़ों को वैध मानते थे. नई सरकारों को समय चाहिए था ताकि वे अपने पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य करवा सकें. इसलिए पुराने या साझा रूपों का सहारा लिया गया. यह कूटनीतिक और प्रैक्टिकल दोनों कारणों से हुआ.

विभाजन, विस्थापन और पहचान

भारतपाकिस्तान, दोनों देशों में विभाजन के समय पहचान बहुत अस्थिर थी. कई लोग बिना दस्तावेज़ के फंस गए. गांव, रिश्तेदार, जमीने सब पीछे छूटे. लोग केवल अपने परिवार और सामान पर ध्यान दे रहे थे. पासपोर्ट बनवाने की प्राथमिकता कई के लिए संभव ही नहीं थी. इसलिए स्थानीय प्रशासन ने शरणार्थियों के लिए सरल पास या यात्रा कागज़ दिए. ये संसाधनों की कमी और राहत कार्यों की जरुरत का परिणाम थे. और यह कुछ सालों तक ऐसे ही चलता रहा.

9 जुलाई 1953 में दोनों सरकारों ने एक समझौता किया, जिसका उद्देश्य धीरेधीरे पुरानी व्यवस्था को हटाना और पासपोर्ट एवं वीजा की सुविधा शुरू करना था. वीसा में स्पष्ट उल्लेख करना अनिवार्य कर दिया गया कि वीसा धारक कब तक रहेगा, कहां रहेगा. इसके पहले बिना पासपोर्ट के यात्रा होती रही.

एग्रीमेंट में वीजा के लिए तय किये गए थे नियम

आवेदक को रिश्तेदारों से मिलने के लिए, व्यापार के उद्देश्य से, धार्मिक यात्रा के लिए वीसा के नियम आसान बनाए गए थे. शिक्षा एवं संपत्ति बंटवारे के मामले में वीजा नियम आसान थे. बुजुर्गों, बच्चों एवं महिलाओं के मामले में भी रियायत देने की व्यवस्था की गई. एग्रीमेंट लागू होने के पहले लोग व्यापार, धार्मिक यात्रा या परिवार के पुनर्मिलन के लिए सीमाओं पर आतेजाते रहे. दोनों देशों ने समयसमय पर विशेष परमिट और पास दिए. इन दस्तावेज़ों ने ही जॉइंट पासपोर्ट जैसा तात्पर्य दिया. परंतु वे स्थायी पासपोर्ट नहीं थे. वे अस्थायी और उद्देश्यआधारित थे, जो धीरेधीरे समाप्त हो गए.

राजनीतिक कारण भी रिश्ते को सहजअसहज करते रहे

दोनों देशों के बीच रिश्ते तुरंत स्पष्ट नहीं हुए. लड़ाई भी हुई. तनाव भी रहा. पर, कई द्विपक्षीय मामलों में सहमति भी बनती और कई बार बिगड़ती रही. पहले लोग कहीं से भी आतेजाते थे. कोई रोकटोक नहीं थी. एग्रीमेंट के बाद तय कर दिया गया कि किनकिन सीमा चौकियों से लोगों का आनाजाना होगा. इसके लिए सीमाओं पर सुविधाएं बनाई गई. यह भी तय कर दिया गया कि बिना वैध दस्तावेज प्रवेश की कोशिश करने वालों पर कार्रवाई होगी. लेकिन पहले कई समझौते ऐसे भी हुए जो तत्काल जरूरी थे. ऐसे में यह सहयोग जॉइंट दस्तावेज़ के रूप में दिखा. पर, यह पूर्ण साझेदारी नहीं थी. यह दोनों देशों की मजबूरी और जरूरत थी. समयसमय पर वीसा नियमों में परिवर्तन भी होते रहे. साल 1974 में एक बार फिर से तत्कालीन हालातों के मद्देनजर वीसा नियमों में बदलाव हुए.

फाइल फोटो

यह है जॉइंट पासपोर्ट का सच

जॉइंट पासपोर्ट जैसी कोई व्यवस्था असल में कभी नहीं लागू हुई. यह सिर्फ बंटवारे के बाद के फौरी इंतजामात का सच है. पासपोर्ट बनाना मात्र काग़ज़ का होना नहीं था. तकनीक सीमित थी. दोनों देशों के पास समान इंफ्रास्ट्रक्चर भी नहीं था. इसलिए पुराने मुद्रा और प्रिंटिंग सेट अप की साझा उपयोगिता बनी रही. इससे कुछ स्थानों पर एक तरह के दस्तावेज़ जारी होते रहे. समय के साथ लोगों की यादों में कुछ चीज़ें मिल जुल कर रह जाती हैं. कई लोगों ने देखा कि कुछ दस्तावेज़ दोनों देशों में काम करते थे. इससे जॉइंट पासपोर्ट की धारणा प्रचलित हुई. इतिहास में अक्सर स्थानीय अनुभव और आधिकारिक रिकॉर्ड अलग दिखते हैं. इसलिए कुछ कहानियाँ यह कथन देती हैं कि पासपोर्ट साझा था. वस्तुत: यह साझा संक्रमण और अस्थायी समझौतों का नतीजा था.

सरल शब्दों में कहें तो विभाजन के बाद जॉइंट पासपोर्ट जैसा जो प्रभाव दिखा, वह कई कारणों का मेल था. प्रशासनिक निरंतरता, मानव विस्थापन, अंतरिम कूटनीति और तकनीकी सीमाएं प्रमुख थीं. यह सहयोग आवश्यक था. पर यह कभी स्थायी साझेदारी या नया संयुक्त नागरिकता दस्तावेज़ नहीं था. यह एक संक्रमणकालीन समाधान था. समय ने इसे समाप्त कर दिया. इतिहास में ये प्रसंग हमें उस आपात काल और मानवीय चुनौतियों की याद दिलाते हैं.

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