जेपी मॉर्गन की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों की मुनाफा कमाने की क्षमता बेहतर होने वाली है. रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल की गिरती कीमतों से फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन बढ़ रहा है. हालांकि, बढ़ते कर्ज और फ्यूल टैक्स को लेकर अनिश्चितता इस सेक्टर की लंबी अवधि की कमाई की संभावनाओं को सीमित कर सकती है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी रिफाइनरीज और फ्यूल रिटेलर्स के पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर कंबाइंड मार्जिन अब हालिया मिडिल ईस्ट संघर्ष से पहले के स्तर से ऊपर है. यह बढ़त कच्चे तेल की कम कीमतों और कम सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी के कारण हुई है. वेस्ट एशिया में संघर्ष शुरू होने से ग्लोबल तेल की कीमतों में उछाल आया, लेकिन भारत में रिटेल पंप रेट काफी हद तक स्थिर रहे और जरूरी बढ़ोतरी के मुकाबले बहुत कम बढ़े. मई में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद भी, रिटेल पंप रेट लागत से कम थे.
एलपीजी पर अभी भी नुकसान ज्यादा
JP मॉर्गन ने कहा कि पेट्रोल और डीजल पर OMC के कंबाइंड मार्जिन के लिए हमारे अनुमान अब युद्धपूर्व लेवल से अधिक हैं. LPG पर नुकसान अभी भी अधिक है, लेकिन तेल की कीमतों में गिरावट के साथ इसमें भी जल्द ही कमी आनी चाहिए. साथ ही कहा कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कमाई पर भारी इन्वेंट्री नुकसान का असर पड़ सकता है, लेकिन दूसरी तिमाही में मुनाफा बेहतर होना चाहिए.
रिपोर्ट में कहा गया कि मार्जिन में इस सुधार को लेकर हमारे उत्साह को दो बातें सीमित करती हैं: पिछले कुछ महीनों में OMC पर काफी कर्ज चढ़ा है जिससे वैल्यूएशन पर असर पड़ा है, और मुनाफे की बहाली का एक बड़ा हिस्सा एक्साइज ड्यूटी में कटौती के कारण है. हो सकता है कि सरकार कुछ समय के लिए टैक्स कम रखे जिससे OMC कर्ज चुका सके. हालांकि, भविष्य में एक्साइज ड्यूटी बढ़ने का जोखिम बना हुआ है.
सरकार ने रिटेल कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी से बचने के लिए मार्च में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपए प्रति लीटर की कटौती की थी. जब ग्लोबल तेल की कीमतें युद्धपूर्व स्तर पर आ जाएंगी और स्थिर हो जाएंगी, तो ड्यूटी को फिर से बढ़ाया जा सकता है.
पेट्रोल और डीजल पर मार्जिन बढ़ा
तीन सरकारी OMCs भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड , इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड में से, अगर तेल की कीमतें कम होती रहती हैं, तो निकट भविष्य में बीपीसीएल और आईओसी को सबसे अधिक फायदा होने की उम्मीद है. ब्रोकरेज का अनुमान है कि बीपीसीएल और आईओसीएल के लिए पेट्रोल और डीजल के मौजूदा कंबाइंड मार्जिन संघर्ष से पहले के स्तर से ज्यादा हैं, जबकि एचपीसीएल के मार्जिन काफी हद तक तेल की कीमतों में हालिया उछाल से पहले के स्तर पर वापस आ गए हैं या उससे भी ज्यादा हो गए हैं. यह सुधार बेहतर कंबाइंड रिफाइनिंग और मार्केटिंग इकोनॉमिक्स को दिखाता है, भले ही स्टैंडअलोन फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन अभी भी ऐतिहासिक औसत से कम बने हुए हैं.
पहली तिमाही में रहेगाा दबाव
मार्जिन का बेहतर माहौल दूसरी तिमाही से कमाई को सपोर्ट कर सकता है, खासकर अगर कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से कम रहती हैं और रिफाइनिंग मार्जिन ऊंचे बने रहते हैं. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में हालिया गिरावट के कारण इन्वेंट्री में हुए नुकसान की वजह से पहली तिमाही की कमाई पर दबाव बने रहने की संभावना है. एनालिस्ट्स को यह भी उम्मीद है कि हाल के महीनों में पेट्रोल, डीजल और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस की सेल्स पर हुए नुकसान को झेलने के बाद तीनों तेल कंपनियों पर कर्ज का बोझ बढ़ सकता है. हालांकि LPG पर नुकसान अभी भी काफी है, लेकिन उम्मीद है कि तेल की कम कीमतों का असर इस सेक्टर पर पड़ने से यह नुकसान कम हो जाएगा.
सरकार को रेवेन्यू का नुकसान
फ्यूल मार्जिन में सुधार के पीछे एक मुख्य कारण सरकार का एक्साइज़ ड्यूटी कम रखने का फैसला रहा है, जिससे रिटेल फ्यूल की कीमतों का एक बड़ा हिस्सा OMCs को मिल सका है. एनालिस्ट्स का अनुमान है कि एक्साइज ड्यूटी में कटौती से सरकार को सालाना लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपये के रेवेन्यू का नुकसान हुआ है. इसने मौजूदा मुनाफे के स्तर के बने रहने पर सवाल खड़े कर दिए हैं. एनालिस्ट्स का कहना है कि सरकार OMCs को कुछ समय के लिए ज़्यादा मार्जिन बनाए रखने की इजाज़त दे सकती है ताकि हाल के समय में हुए नुकसान के दौरान जमा हुए कर्ज को कम करने में मदद मिल सके. हालांकि, फ्यूल टैक्स बढ़ाने का दबाव फिर से बन सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि सरकार को अगले दो फाइनेंशियल इयर्स में ज़्यादा खर्च करने पड़ सकते हैं.
कब हो सकती है अच्छी कमाई
JP Morgan को उम्मीद है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें कम रहती हैं तो OMCs दिसंबर और मार्च तिमाही में अच्छी कमाई कर सकती हैं, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी है कि फाइनेंशियल ईयर 2028 के बाद फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन के बारे में साफ तौर पर कुछ कहना मुश्किल है. इसलिए, इस सेक्टर में निवेश का फैसला कच्चे तेल की कीमतों और सरकार की टैक्स पॉलिसी में बदलाव पर काफी हद तक निर्भर करेगा, और मौजूदा माहौल में BPCL और IOC को बेहतर विकल्प माना जा रहा है.

