Rupee Fall: भारतीय रुपये के लिए साल 2026 कुछ खास अच्छा साबित नहीं हो रहा है. इस साल की शुरुआत से ही डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार कमजोरी देखने को मिल रही है. अब तक रुपया करीब 6 प्रतिशत टूट चुका है. प्राइवेट सेक्टर के बड़े बैंक एक्सिस बैंक ने अपनी एक रिसर्च रिपोर्ट में एक डराने वाला अनुमान जताया है. रिपोर्ट के मुताबिक रुपये की गिरावट का ये सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं है. आने वाले समय में इसमें भारी गिरावट देखने को मिल सकती है.

2013 के बुरे दौर में पहुंचा इंडेक्स
एक्सिस बैंक की रिपोर्ट बताती है कि व्यापार से जुड़े लगातार झटकों के कारण रुपये को अभी खुद को एडजस्ट करने की जरूरत पड़ सकती है. सबसे बड़ी चिंता की बात ट्रेडवेटेड रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट इंडेक्स का बुरी तरह गिरना है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक ये इंडेक्स लुढ़ककर 91.75 पर आ गया है. अर्थशास्त्रियों की मानें तो इससे पहले इंडेक्स का ये हाल 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ के समय देखा गया था. उस वक्त भी भारतीय करेंसी ने भारी दबाव झेला था. अगर हम पिछले कुछ महीनों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति पूरी तरह साफ हो जाती है. अप्रैल 2025 में ये इंडेक्स 102 के करीब था. वहीं जुलाई 2026 आतेआते ये खिसक कर 91.8 तक पहुंच गया. इंडेक्स का ये गिरता ग्राफ रुपये की कमजोर सेहत की गवाही दे रहा है.
गिरावट के पीछे बड़े कारण
एक्सिस बैंक के अर्थशास्त्री तन्मय दलाल ने का कहना है कि मार्च तक रुपये की फेयर वैल्यू में जो गिरावट आनी थी, वो शायद पूरी हो चुकी है. लेकिन अब कुछ नए खतरे रुपये पर मंडरा रहे हैं. व्यापार की शर्तों में लगातार आ रहे झटकों के साथसाथ रिलेटिव एआई प्रोडक्टिविटी में 5 प्रतिशत की कमी एक बड़ा कारण बनकर उभरी है. थ्योरी के हिसाब से देखा जाए तो इसके चलते अगले एक साल के भीतर REER में 10 प्रतिशत तक की कमजोरी आ सकती है. तन्मय के मुताबिक घरेलू विकास के लिए जरूरी न्यूट्रल रेट्स का ग्लोबल ट्रेंड्स के साथ मेल न खाना भी इस समस्या की एक बहुत बड़ी वजह है. महंगाई पर काबू पाने की कोशिशों के बीच ग्लोबल मार्केट के दबाव से रुपया उबर नहीं पा रहा है.
रिजर्व बैंक का बड़ा कदम
रुपये को इस तरह लगातार टूटता देख रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी खामोश नहीं है. भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी करेंसी को बचाने के लिए बाजार में बड़ा दांव खेला है. अर्थशास्त्री तन्मय दलाल के अनुसार, साल 2023 के मध्य से लेकर अब तक RBI लगभग 250 अरब डॉलर बेच चुका है. ये कोई छोटी रकम नहीं है. इसे अगर हम आंकड़ों में समझें, तो ये रकम जून से अगस्त के बीच समर्पित डॉलरइनफ्लो कार्यक्रम के तहत देश में आए कुल इनफ्लो की तुलना में लगभग दोगुनी बैठती है. रिजर्व बैंक द्वारा इतनी बड़ी मात्रा में डॉलर बेचने का मकसद बाजार में रुपये को सहारा देना है. इन सबके बावजूद बाजार के हालात बता रहे हैं कि रुपये का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है. आगे भी इसे कई ग्लोबल झटकों का सामना करना पड़ सकता है.



