High Court Verdict Second Marriage: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी गैरमुस्लिम व्यक्ति की पहली पत्नी जीवित है और पहली शादी विधिक रूप से समाप्त नहीं हुई है, तो दूसरी शादी कानून की नजर में शुरू से ही अमान्य मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में दूसरी पत्नी के संबंध में भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के तहत आरोपी व्यक्ति को “पति” नहीं माना जा सकता।

पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना कानून का उल्लंघन
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने यह टिप्पणी एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना कानून का उल्लंघन है और ऐसी शादी से पतिपत्नी का वैध संबंध स्थापित नहीं होता। इसलिए दूसरी पत्नी के संदर्भ में बीएनएस की धारा 80 और 85 के प्रावधानों का लाभ आरोपी को नहीं मिल सकता।
दूसरी शादी कानूनी रूप से शून्य
मामले में आवेदक पर बीएनएस की धारा 85, धारा 80 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज है। अभियोजन के अनुसार मृतका आवेदक की दूसरी पत्नी थी, जिसकी शादी के सात वर्ष के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। जांच में सामने आया कि आरोपी की पहली पत्नी जीवित थी और उसके साथ वैवाहिक संबंध भी कायम थे। ऐसे में दूसरी शादी कानूनी रूप से शून्य मानी गई।
आरोपी को नहीं मिली कानूनी राहत
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में के रीमा अग्रवाल बनाम अनुपम फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि दहेज संबंधी कानूनों का उद्देश्य महिलाओं को उत्पीड़न से बचाना है, इसलिए इन प्रावधानों की व्याख्या व्यापक और उद्देश्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए। केवल दूसरी शादी अमान्य होने के आधार पर आरोपी को कानूनी राहत नहीं दी जा सकती।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि पहली पत्नी के रहते की गई कानून की दृष्टि में वैध नहीं है और ऐसे मामलों में आरोपी व्यक्ति को “पति” का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं होगा। साथ ही, दहेज उत्पीड़न और संदिग्ध मृत्यु जैसे मामलों में पीड़ित महिला के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी।


