वंदे मातरम् और विवाद. दोनों का चोलीदामन का साथ है. जब देश गुलाम था तब इस गीत ने लोगों में जोश भरा लेकिन जब हम आजाद हुए तो इसी गीत को लेकर कई विवाद हुए. इसे धर्म से जोड़ा गया. देश के कई हाईकोर्ट तक इसे लेकर मामला पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट को भी इसमें व्यवस्था देनी पड़ी. 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में झंडारोहण के समय वंदे मातरम् गाने को रोकने का आरोप लगाते हुए भाजपा नेता हमलावर हैं तो कांग्रेस भी दोदो हाथ करती हुई दिखाई दे रही है. प्रदर्शन भी शुरू हुए हैं. आइए, ताजे संदर्भों में जानते हैं कि वंदे मातरम् को लेकर मामला कोर्ट तक कबकब पहुंचा? अदालतों ने क्या फैसले सुनाए?

वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसकी रचना की थी. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस गीत ने करोड़ों लोगों में देशभक्ति का जोश भरा. देश की आजादी के बाद इसे राष्ट्रगान जन गण मन के समान दर्जा दिया गया. इसके बावजूद समयसमय पर इस गीत को अनिवार्य रूप से गाने, शिक्षण संस्थानों में लागू करने और इसकी भाषा को लेकर कई विवाद खड़े हुए. ये विवाद अदालतों की चौखट तक भी पहुंचे.
विवाद की मुख्य वजहें
वंदे मातरम् को लेकर विवादों के दो प्रमुख पहलू रहे हैं. पहला पहलू धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है. कुछ मुस्लिम संगठनों का मानना है कि इस गीत में मातृभूमि को देवी के रूप में वंदनीय दिखाया गया है. इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत की अनुमति है. इसलिए इसे गाना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन माना गया. दूसरा पहलू भाषा और उच्चारण का रहा है, जिसमें संस्कृत और बांग्ला शब्दों के सही अर्थ को लेकर कानूनी बहसें हुईं.
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास आनंदमठ भारतीय साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है.
क्या कहता है कानून और संविधान?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. वहीं अनुच्छेद 25 सभी को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है. कानूनी सवाल हमेशा यह रहा कि क्या किसी नागरिक को राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य किया जा सकता है? क्या किसी धार्मिक भावना के आधार पर इसे गाने से इनकार करना अपराध की श्रेणी में आता है? विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने इन सवालों पर अपनीअपनी कई महत्वपूर्ण व्याख्याएं दी हैं.
क्या था बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य का मसला?
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत से जुड़ा सबसे प्रमुख फैसला साल 1986 का बिजॉय इमैनुएल मामला है. यह मामला हालांकि राष्ट्रगान से जुड़ा था, लेकिन राष्ट्रगीत पर भी इसके कानूनी सिद्धांत लागू होते हैं. केरल के एक स्कूल में तीन बच्चों ने राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया था. वे जेहोवा विटनेस संप्रदाय के थे. स्कूल ने उन्हें निकाल दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान नहीं गाता है लेकिन सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, तो यह अपमान नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी को भी गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
मद्रास हाई कोर्ट
चेन्नई उच्च न्यायालय और भाषा विवाद की सच्चाई क्या थी?
वर्ष 2017 में मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष एक दिलचस्प मामला आया. के. वीरामाणि नामक अभ्यर्थी ने शिक्षक पात्रता परीक्षा में एक अंक कम होने पर याचिका दायर की. सवाल था कि वंदे मातरम् मूल रूप से किस भाषा में लिखा गया था. अभ्यर्थी ने उत्तर बांग्ला लिखा था, जबकि सरकारी उत्तर कुंजी में संस्कृत को सही माना गया. अदालत ने महाधिवक्ता से स्पष्टीकरण मांगा. जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि बंकिम चंद्र ने इसे संस्कृत और बांग्ला दोनों के सम्मिश्रण से लिखा था. अदालत ने अभ्यर्थी को सही मानते हुए अंक देने का आदेश दिया.
तमिलनाडु के स्कूलों में अनिवार्य गायन का हुआ आदेश
मद्रास उच्च न्यायालय के जस्टिस एम. वेणुगोपाल ने 2017 में ही एक अन्य आदेश दिया. उन्होंने निर्देश दिया कि तमिलनाडु के सभी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सप्ताह में कम से कम एक बार वंदे मातरम् गाया जाना चाहिए. इसके अलावा सरकारी और निजी कार्यालयों में महीने में एक बार इसे गाने का निर्देश दिया गया. हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि किसी व्यक्ति को इसे गाने में वास्तविक धार्मिक या भाषाई कठिनाई है, तो उसे बाध्य नहीं किया जाएगा.
महाराष्ट्र में नगर निगम और बीएमसी का प्रस्ताव
मुंबई नगर निगम ने 2017 में अपने सभी अनुदान प्राप्त स्कूलों में वंदे मातरम् गाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव पारित किया. इसके खिलाफ कई याचिकाएं बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर की गईं. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है. अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए अनिवार्य रूप से थोपने के बजाय स्वैच्छिक भावना को अधिक महत्वपूर्ण माना.
दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल हुई जनहित याचिकाएं
दिल्ली उच्च न्यायालय में वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के समान आधिकारिक नियम और दिशानिर्देश देने के लिए कई जनहित याचिकाएं दायर की गईं. वरिष्ठ अधिवक्ता और याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि जैसे राष्ट्रगान के लिए एक निश्चित समय और प्रोटोकॉल तय है, वैसा ही वंदे मातरम् के लिए भी राष्ट्रीय नीति बने. अदालत ने केंद्र सरकार से इस पर रुख स्पष्ट करने को कहा. केंद्र सरकार ने जवाब दिया कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों का अपना विशेष स्थान है, लेकिन हर नागरिक पर इसे गाने की कानूनी बाध्यता लगाना आवश्यक नहीं है.
दिल्ली हाईकोर्ट.
क्या रहा सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम रुख?
सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 51ए के तहत नागरिकों का कर्तव्य राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना है. इस अनुच्छेद में विशेष रूप से राष्ट्रीय गीत शब्द का उल्लेख नहीं है. इसलिए अदालत किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य करने का सर्वव्यापी आदेश जारी नहीं कर सकती. सम्मान करना आवश्यक है, परंतु कानूनी डंडे से देशभक्ति थोपना उचित नहीं माना गया.
कुछ खास अवसरों पर अनिवार्य है वंदे मातरम् का गायन
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि सर्वोच्च अदालत, उच्च न्यायालयों के आदेश के बीच अभी जो व्यवस्था देश में लागू है, उसके मुताबिक पद्म सम्मान समेत अन्य सिविलियन अवॉर्ड देते समय, राष्ट्रपति के राज्यों के दौरे के समय राष्ट्रगान के साथ ही राष्ट्रगीत का गायन अनिवार्य है. सब लोग अपनी जगह पर खड़े होकर यह सम्मान देंगे. यही व्यवस्था 15 अगस्त एवं 26 जनवरी के लिए भी लागू की गई है. ऐसा न करने पर तीन साल तक की सजा या अर्थ दंड या दोनों भी हो सकते हैं.
अदालतों ने अपने विभिन्न निर्णयों में राष्ट्रगीत की गरिमा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है. न्यायपालिका का स्पष्ट मत रहा है कि देश और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान हर नागरिक के दिल से आना चाहिए. कानूनी बाध्यता के बजाय जागरूकता और आपसी समझ ही इस संवेदनशील विषय का स्थायी समाधान है.



