
बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में एक ऐसा इलाका है, जहां रहने वाले थारू समुदाय की जीवनशैली आज भी प्रकृति के काफी करीब है। जंगलों के आसपास बसे इस समुदाय के लोगों की उम्र और उनकी दिनचर्या को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां कई बुजुर्ग 80 से 85 साल की उम्र के बाद भी सक्रिय और स्वस्थ नजर आते हैं। गांव के बुजुर्गों की मानें तो इसके पीछे उनकी पारंपरिक जीवनशैली, प्राकृतिक खानपान और रोजाना की मेहनत बड़ी वजह हो सकती है।
जंगलों के बीच बसा है थारू समाज
पश्चिम चंपारण के कई प्रखंडों में थारू जनजाति की बस्तियां मौजूद हैं। इनमें से ज्यादातर बस्तियां जंगल या जंगल के आसपास स्थित हैं।
प्रकृति के करीब रहने के कारण इन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी जंगल, खेती और स्थानीय संसाधनों से जुड़ी हुई है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद समुदाय ने अपनी पारंपरिक जीवनशैली को काफी हद तक बनाए रखा है।
80 से 85 साल की उम्र तक सक्रिय रहने का दावा
रामनगर प्रखंड के थारू परसौनी गांव के स्थानीय लोगों के मुताबिक, गांव में कई लोगों की उम्र 80 से 85 वर्ष के बीच है। यहां एक बुजुर्ग की उम्र करीब 110 वर्ष तक बताई गई थी।
वहीं गांव के 80 और 90 साल के आसपास के कई बुजुर्ग आज भी रोजमर्रा के काम खुद करते हैं। सुबह उठकर कई किलोमीटर तक पैदल जाना और फिर वापस लौटना उनके लिए सामान्य दिनचर्या का हिस्सा बताया जाता है।
85 साल की उम्र में भी बिना सहारे चलते हैं बुजुर्ग
गांव के हर्ष नारायण महतो भी ऐसे ही बुजुर्गों में शामिल हैं। उनकी उम्र 85 वर्ष से अधिक बताई जाती है।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, वह आज भी बिना किसी सहारे के सुबह घूमने निकल जाते हैं और खुद ही वापस घर लौटते हैं। उन्हें देखने और सुनने में भी उम्र के मुताबिक ज्यादा परेशानी नहीं होने की बात कही जाती है।
हालांकि, किसी समुदाय की औसत उम्र या बीमारियों से दूरी के दावे को व्यापक वैज्ञानिक निष्कर्ष मानने से पहले स्वास्थ्य संबंधी प्रमाण और आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत होती है।
प्राकृतिक चीजों पर ज्यादा निर्भर है खानपान
थारू समुदाय के पारंपरिक खानपान में स्थानीय और प्राकृतिक चीजों की बड़ी भूमिका है। यहां ताजे पानी की मछली, केकड़ा, घोंघा, सीप, बांस की सब्जी, कचनार के फूल और जंगली मशरूम जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके अलावा आम के मंजर की सब्जी, भुंजा और चावल से बने कुछ पारंपरिक व्यंजन भी इनके भोजन का हिस्सा हैं।
जंगल और खेती पर निर्भर रहने के कारण कई खाद्य पदार्थ इन्हें स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो जाते हैं।
तेल और मसालों का इस्तेमाल कम
स्थानीय लोगों के मुताबिक, मछली, केकड़े और अन्य चीजों को तैयार करते समय बहुत ज्यादा तेल और मसालों का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
खाने को साधारण तरीके से पकाने की परंपरा आज भी कई परिवारों में जारी है। इसी तरह जंगल से मिलने वाली मौसमी सब्जियों का इस्तेमाल भी इनके भोजन में किया जाता है।
चावल पकाने का तरीका भी है अलग
थारू समुदाय के पारंपरिक भोजन में चावल यानी भात को खास महत्व दिया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां चावल को भाप से पकाने की परंपरा है।
आम तौर पर चावल पकाते समय कुछ लोग उसका माड़ अलग कर देते हैं, लेकिन इस पारंपरिक तरीके में माड़ को अलग नहीं किया जाता। इससे चावल में मौजूद पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा उसी में बना रहता है।
शाम 7 बजे तक कर लेते हैं रात का खाना
थारू समुदाय की दिनचर्या में भोजन का समय भी खास है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, यहां कई लोग रात का भोजन शाम करीब 7 बजे तक कर लेते हैं।
सुबह के भोजन में भी चावल और पारंपरिक व्यंजनों को प्राथमिकता दी जाती है। इसके साथ ही दिनभर खेत, जंगल और दूसरे कामों में शारीरिक मेहनत करना उनकी जीवनशैली का हिस्सा है।
लंबी उम्र के पीछे क्या हो सकता है कारण?
थारू समुदाय की जीवनशैली को देखें तो इसमें कई ऐसी बातें नजर आती हैं, जो आज की भागदौड़ वाली जिंदगी से अलग हैं। प्राकृतिक और स्थानीय भोजन, कम तेल-मसाले वाला खाना, नियमित शारीरिक मेहनत, समय पर भोजन और प्रकृति के करीब रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
हालांकि, सिर्फ इन कारणों को ही लंबी उम्र या बीमारियों से बचाव की निश्चित वजह मानना सही नहीं होगा। फिर भी थारू समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली इस बात की दिलचस्प मिसाल है कि कैसे स्थानीय भोजन और सक्रिय दिनचर्या पीढ़ियों से उनके जीवन का हिस्सा बनी हुई है।



