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​हुक्के पर बैन, यूपी के युवा किस नशे की तरफ जा रहे हैं?

हुक्का अब सिर्फ दोस्तों के साथ बैठकर धुआं उड़ाने या शौक पूरा करने का जरिया नहीं रह गया है. खासकर फ्लेवर्ड हुक्के को लेकर युवाओं और पहली बार तंबाकू या निकोटीन आजमाने वालों में इसके बढ़ते आकर्षण पर चिंता जताई जा रही है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में हुक्का बार से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इस मुद्दे को उठाया.

​हुक्के पर बैन, यूपी के युवा किस नशे की तरफ जा रहे हैं?

सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि हुक्का, वॉटरपाइप और शीशा युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं और इन्हें सिगरेट का सुरक्षित विकल्प मानना सही नहीं है. यह चिंता सिर्फ हुक्के तक सीमित नहीं है, उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में यूपी में तंबाकू का इस्तेमाल एक बड़ी समस्या के तौर पर सामने आता है.

सभी पदार्थ के आंकड़ें नहीं हैं

वहीं देश के स्तर पर शराब, कैनाबिस और ओपिओइड जैसे नशों का इस्तेमाल भी बड़ी संख्या में लोग करते हैं. हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे यूपी के युवाओं की मौजूदा नशे की दर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अलगअलग पदार्थों के लिए ऐसा नया और सिर्फ यूपी के युवाओं का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

युवाओं को लेकर 3 बड़ी चिंताएं

  • फ्लेवर्ड हुक्का: मीठे और फलों वाले फ्लेवर युवाओं और पहली बार इस्तेमाल करने वालों को आकर्षित कर सकते हैं.
  • सुरक्षित होने का भ्रम: हुक्के में पानी इस्तेमाल होने के कारण इसे सिगरेट से कम नुकसान वाला माना जाता है, लेकिन इसे सुरक्षित विकल्प नहीं माना जा सकता.
  • कम उम्र में शुरुआत: WHO के मुताबिक भारत में 1315 साल के स्कूली बच्चों में 2019 में तंबाकू इस्तेमाल की दर 8.4% थी.

यूपी में तंबाकू की क्या तस्वीर है?

WHO और स्वास्थ्य मंत्रालय के GATS2 सर्वे के मुताबिक यूपी में 15 साल या उससे ज्यादा उम्र के 35.5% लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू इस्तेमाल करते थे. इनमें 13.5% लोग धूम्रपान करते थे, जबकि 29.4% बिना धुएं वाला तंबाकू लेते थे. खैनी, गुटखा और बीड़ी प्रमुख उत्पादों में शामिल थे. वहीं 1517 साल की उम्र के युवाओं में तंबाकू इस्तेमाल की दर 2.8% दर्ज की गई थी. यह आंकड़ा पुराने सर्वे का है, इसलिए इसे 2026 की मौजूदा स्थिति नहीं माना जाना चाहिए.

क्या फ्लेवर युवाओं को हुक्के की तरफ खींच रहा है?

फ्लेवर्ड हुक्का इस बहस का सबसे अहम हिस्सा है. WHO के मुताबिक फ्लेवर तंबाकू और निकोटीन उत्पादों को युवाओं के लिए ज्यादा आकर्षक बना सकते हैं. मीठे और फलों वाले स्वाद तंबाकू के कड़वे स्वाद को कम महसूस करा सकते हैं, जिससे पहली बार इस्तेमाल करने वालों के लिए इन उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ सकती है. यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ युवाओं को आकर्षक फ्लेवर और मार्केटिंग के जरिए तंबाकू या निकोटीन उत्पादों की तरफ खींचे जाने को लेकर चिंता जताते रहे हैं.

कोर्ट में हुक्का बार को लेकर क्या हुआ?

मामले में सवाल सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि हुक्का बार चलाने की कानूनी अनुमति का भी था. याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि अगर ग्राहक खुद हुक्का इस्तेमाल करता है और उसे धूम्रपान के लिए निर्धारित स्थान में रखा जाता है, तो इसे सेवा नहीं माना जाना चाहिए.

कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत के मुताबिक हुक्का तैयार करना, पानी भरना, तंबाकू रखना, कोयला तैयार करना और उसकी देखभाल करना जैसी गतिविधियां केवल ग्राहक की selfservice नहीं हैं. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धूम्रपान के लिए निर्धारित स्थान का प्रावधान हुक्का बार चलाने की खुली अनुमति नहीं देता.

कानून में हुक्का बार को लेकर क्या प्रावधान हैं?

  1. COTPA लागू है कोर्ट ने कहा कि भारत में तंबाकू और सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान को COTPA और 2008 के नियमों के तहत नियंत्रित किया जाता है.
  2. सार्वजनिक जगह पर धूम्रपान सामान्य तौर पर प्रतिबंधित है COTPA की धारा 4 के तहत सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक है. इसका सीमित अपवाद धूम्रपान के लिए तय जगह है.
  3. 2017 के बाद नियम और सख्त हुए 2017 में Rule 4 में बदलाव कर no other service की जगह no service किया गया. कोर्ट ने इसका मतलब लिया कि तय धूम्रपान क्षेत्र में किसी भी तरह की सेवा नहीं दी जा सकती.
  4. हुक्का सर्विस पर सीधी रोक कोर्ट के मुताबिक 2017 संशोधन के बाद धूम्रपान क्षेत्र में हुक्का देना या उसकी सेवा करना पूरी तरह प्रतिबंधित है. यह हुक्का तंबाकू, निकोटीन या हर्बल किसी भी प्रकार का हो, इस निष्कर्ष पर नियम लागू होता है.
  5. सिर्फ ग्राहक खुद हुक्का चलाए, तब भी मामला नहीं बदलता याचिकाकर्ताओं ने selfservice का तर्क दिया था कि कर्मचारी धूम्रपान क्षेत्र में सेवा नहीं देंगे. कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया.
  6. हुक्का तैयार करना भी service माना गया पानी भरना, तंबाकू रखना, कोयला तैयार करना, कोयला बदलना और हुक्के की देखभाल जैसी गतिविधियों को कोर्ट ने व्यावसायिक सेवा के हिस्से के रूप में देखा.
  7. 18 साल से कम उम्र वालों पर रोक नियमों में धूम्रपान के लिए तय जगह के प्रवेश पर 18 साल से कम उम्र के लोगों को रोकने और वहां स्वास्थ्य चेतावनी बोर्ड लगाने का प्रावधान भी बताया गया है.
  8. रेस्टोरेंट का लाइसेंस हुक्का बार की अनुमति नहीं देता कोर्ट में राज्य की ओर से दलील दी गई कि Food Safety कानून के तहत रेस्टोरेंट का लाइसेंस अपने आप हुक्का बार चलाने की अनुमति नहीं देता.
  9. पुलिस कार्रवाई का अधिकार फैसले में COTPA की धाराओं 12, 13 और 15 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उल्लंघन मिलने पर संबंधित अधिकारियों के पास तलाशी, जब्ती और दंडात्मक कार्रवाई की शक्तियां हैं.
  10. गैरधूम्रपान करने वालों का आर्टिकल 21 अधिकार कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जगह पर दूसरे लोगों के तंबाकू के धुएं से प्रभावित न होना और साफ हवा में सांस लेना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार से जुड़ा है. इसे किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के कारोबार के अधिकार के आधार पर कम नहीं किया जा सकता.
  11. कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में हुक्का बार चलाना और रेस्टोरेंट के जरिए हुक्का सेवा देना 2008 के नियमों के Rule 4 , 2017 के संशोधन और COTPA की योजना के खिलाफ है. इसी आधार पर संबंधित सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं.

हुक्के के इस्तेमाल के मामले में क्या कहा?

कोर्ट ने इस मामले में कहा, ‘सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियम, 2008′ के नियम 4 का साफ़ उल्लंघन है और यह COTPA की योजना और मकसद के भी सीधे खिलाफ है.’ साथ ही सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जगह पर साफ हवा में सांस लेने का धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति का अधिकार, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है. इस अधिकार को किसी ऐसे संस्थान के व्यावसायिक हितों के आधार पर कम नहीं किया जा सकता, जिसे संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत व्यापार करने का अधिकार प्राप्त है.

सिर्फ तंबाकू नहीं, दूसरे नशे भी चिंता

केंद्र सरकार के 2018 के नेशनल सर्वे ऑन एक्स्टेंट एंड पैटर्न ऑफ सब्स्टेंस यूज के मुताबिक, देश में करीब 16 करोड़ लोग शराब, 3.1 करोड़ लोग कैनाबिस और 2.26 करोड़ लोग ओपिओइड का इस्तेमाल करते थे. इस सर्वे में उत्तर प्रदेश को कैनाबिस इस्तेमाल की अधिकता वाले राज्यों में शामिल किया गया था.

युवाओं से जुड़ी एक और चिंता इनहेलेंट्स को लेकर है. सरकारी सर्वे में 1075 साल की आबादी में इनहेलेंट इस्तेमाल की दर 0.7% थी, जबकि बच्चों और किशोरों में यह 1.17% दर्ज हुई. इससे पता चलता है कि कम उम्र में नशे की शुरुआत को लेकर अलग तरह की चुनौतियां भी मौजूद हैं.

हुक्का और सिगरेट में क्या फर्क है?

हुक्के में पानी का इस्तेमाल होने के कारण अक्सर यह धारणा बनती है कि धुआं पानी से फिल्टर होकर कम नुकसानदेह हो जाता है. लेकिन यह धारणा हुक्के को सुरक्षित नहीं बनाती. कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि हुक्के के धुएं में कार्बन मोनोऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर और दूसरे हानिकारक पदार्थ मौजूद हो सकते हैं.

WHO भी तंबाकू इस्तेमाल को कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों की बीमारियों के बड़े जोखिम कारकों में गिनता है. हुक्के से निकलने वाला धुआं आसपास मौजूद लोगों के लिए भी जोखिम पैदा कर सकता है.

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