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ऑपरेशन सिंदूर की शौर्य गाथा: वीर पति के बलिदान पर गर्व से उठा सिर, वीरांगना बोलीं- ‘बेटों को भी सेना में भेजूंगी’

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले सपूतों पर उनके परिवार के साथ पूरा देश नाज कर रहा है। सरकार ने भले अब उन्हें बलिदानी होने का दर्जा दिया है, लेकिन परिवार तो पहले दिन से उनके त्याग पर गर्व कर रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर की शौर्य गाथा: वीर पति के बलिदान पर गर्व से उठा सिर, वीरांगना बोलीं- ‘बेटों को भी सेना में भेजूंगी’

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले सपूतों पर उनके परिवार के साथ पूरा देश नाज कर रहा है। सरकार ने भले अब उन्हें बलिदानी होने का दर्जा दिया है, लेकिन परिवार तो पहले दिन से उनके त्याग पर गर्व कर रहा है।

हिमाचल प्रदेश के पवन कुमार जरयाल की वीरांगना सुषमा बताती हैं, ‘जब उनके घायल होने की सूचना आई थी, हमने सोच लिया था कि यदि वह लौट आते हैं तो हमारे हैं और नहीं लौटते हैं तो देश के हो जाएंगे। बच्चे सेना में जाना चाहें तो उन्हें आशीर्वाद दूंगी। यही अनुभूति हरियाणा के दिनेश कुमार, बिहार के सुनील कुमार सिंह, राजस्थान के सुरेंद्र कुमार और दूसरे बलिदानियों के स्वजन के उद्गार से हो रहा है।

कांगड़ा निवासी पवन कुमार जरयाल हेडक्वार्टर 10 इन्फैंट्री ब्रिगेड में सूबेदार मेजर थे। 9 मई 2025 को पुंछ सेक्टर में पाकिस्तानी गोलाबारी का मुंहतोड़ जवाब देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्हें 31 अगस्त, 2026 को सेवानिवृत्त होना था।

दैनिक जागण जब उनके घर यह सूचना लेकर पहुंचा कि केंद्र सरकार ने पहली बार जिन छह सैनिकों के नाम ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में सार्वजनिक किए हैं, उनमें पहले क्रम पर पवन कुमार हैं तो स्वजन की भावनाएं दुख और गर्व दोनों को प्रकट कर रही थीं।

सुषमा कहती हैं कि मेरे पति का नाम देश के महान वीरों के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया है। उनका नाम राष्ट्रीय समर स्मारक के त्याग चक्र में चमकेगा।

आने वाली पीढ़ियां जानेंगी कि कैसे सूबेदार पवन कुमार ने असाधारण साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। पिता हवलदार गरज सिंह कहते हैं, पवन देश की रक्षा में बलिदान हुआ है। मैं अपने सैन्य जीवन में जो न कर पाया, वह मेरे बेटे ने कर दिखाया।

लांस नायक दिनेश की पत्नी बोलीं बेटों को भी सेना में भेजूंगी

हरियाणा के पलवल के नगला मोहम्मदपुर निवासी लांस नायक दिनेश कुमार शर्मा 7 मई, 2025 को जम्मूकश्मीर के पुंछ सेक्टर में पाकिस्तानी गोलाबारी का मुंहतोड़ जवाब देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। उस समय एक बेटा और एक बेटी थी। पत्नी सीमा देवी तीसरी बार गर्भवती थीं।

अक्टूबर, 2025 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पति पर नाज करते हुए सीमा कहती हैं कि अपने बेटों को भी सेना में भेजूंगी। पांच भाइयों में सबसे बड़े दिनेश के दो छोटे भाई कपिल और हरदत्त अग्निवीर हैं।

हम बेटा खोने के बाद भी हिम्मत नहीं हारे…

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बलिदान के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित राइफलमैन सुनील कुमार की मां सुदेश कुमारी और पिता यशपाल सिंह का सिर गर्व से ऊंचा है। जम्मू के अरनिया का त्रेवा गांव भी गौरवान्वित महसूस कर रहा है। सुनील के पिता और दोनों भाई भी सेना में रहे हैं।

बेटे के बिछुड़ने का गम गहराई तक समाया हुआ है। मां का दर्द अक्सर आंसुओं में झलक आता है। बेटे को खोने के बाद भी मातापिता ने हिम्मत नहीं हारी है। 25 वर्षीय सुनील कुमार ने 10 मई 2025 को आरएसपुरा में खरकोला पोस्ट पर पाकिस्तानी गोलाबारी का जवाब देते हुए बलिदान हुए थे।

खुले में आकर करने लगे पाकिस्तानी ड्रोन पर फायरिंग

बिहार के बक्सर निवासी हवलदार सुनील कुमार सिंह यादव ऑपरेशन सिंदूर के समय राजौरी सेक्टर में 237 फील्ड वर्कशाप कंपनी में तैनात थे। नौ मई 2025 की रात सुनील ने दुश्मन के छह ड्रोनों को अपनी सेंट्री पोस्ट की ओर बढ़ते देखा तो साथियों को खतरे की सूचना दी और खुले में आकर राइफल से फायरिंग शुरू कर दी।

उन्होंने अंतिम सांस तक साथियों को ड्रोन की सटीक जानकारी दी, जिससे कई जवान बच गए। इस वीरतापूर्ण कार्य के लिए उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी सुजाता देवी ने कहा था, मुझे गर्व है कि मेरे पति ने देश के लिए हंसतेहंसते जान दे दी। अगर जरूरत पड़ी तो दोनों बेटों को भी देश के हवाले कर दूंगी। उनके छोटे भाई चंदन सिंह भी सेना में हैं और तब स्वयं राजौरी में तैनात थे।

सार्जेंट सुरेंद्र की पत्नी ने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए, बस बलिदान को सम्मान मिलेराजस्थान में झुंझुनूं जिले के मेहरादासी गांव निवासी सार्जेंट सुरेंद्र कुमार मोगा ने आपरेशन सिंदूर के दौरान अदम्य साहस का परिचय दिया था।

उनकी वीरांगना सीमा देवी ने भावुक होकर कहा कि हमें सरकार से कुछ नहीं चाहिए था, बस मेरे पति के बलिदान को पूरा सम्मान मिलना चाहिए था। आज देर से ही सही, देश ने उनके बलिदान को स्वीकार किया है।

मां नानू देवी का कहना था कि बेटे को खोने का दर्द कभी कम नहीं हो सकता, लेकिन उसका नाम राष्ट्र के वीरों में शामिल होना पूरे परिवार के लिए गर्व की बात है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सुरेंद्र को मरणोपरांत वायु सेना मेडल से सम्मानित किया।

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