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बंगाल की माटी में जन्में डॉ. मुखर्जी का वो ‘गणित’, जिसने BJP को दिलाया राष्ट्रीय दल का दर्जा और अब यहां खिला कमल

पश्चिम बंगाल में पार्टी की पहली जीत के मौके पर भाजपा अपने संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के त्याग बलिदान का आदरपूर्वक स्मरण कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी मुख्यालय पर अपने भाषण में कहा कि डॉ. मुखर्जी ने राष्ट्र की एकता बनाए रखने के लिए संघर्ष किया और 1951 में जनसंघ की स्थापना कर जो बीज बोया था, आज बंगाल में भाजपा की जीत उसके विस्तार का प्रतीक है. उल्लास से भरे पार्टी के अन्य नेताकार्यकर्ता पंडित नेहरू और कांग्रेस के वर्चस्व के दौर में डॉक्टर मुखर्जी की अगुवाई में अखिल भारतीय जनसंघ की शुरुआत और उस कठिन यात्रा को याद कर रहे हैं, जिसमें अनेक उतार चढ़ाव के बीच भी पार्टी अपने संकल्पों पर अडिग रहते हुए आगे बढ़ती गई.

बंगाल की माटी में जन्में डॉ. मुखर्जी का वो ‘गणित’, जिसने BJP को दिलाया राष्ट्रीय दल का दर्जा और अब यहां खिला कमल
बंगाल की माटी में जन्में डॉ. मुखर्जी का वो ‘गणित’, जिसने BJP को दिलाया राष्ट्रीय दल का दर्जा और अब यहां खिला कमल

पार्टी ने देश के विभाजन की पीड़ा विस्थापन बीच उम्मीदों के “दीपक” के साथ अंधेरे से उजाले की ओर कदम बढ़ाए और आज सूरज की किरणों बीच उसका “कमल” गंगोत्री से गंगासागर तक खिला हुआ है. बेशक अब भाजपा विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन है लेकिन 21 अक्तूबर 1951 को दिल्ली के आर्य कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में सम्पन्न जनसंघ के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन से शुरू हुई इस यात्रा को मंजिल हासिल करने के लिए कठिन लंबी डगर पार करनी पड़ी. पढ़िए किन परिस्थितियों में भारतीय जनसंघ का गठन हुआ और डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कैसे उसका नेतृत्व स्वीकार किया.

नेहरूलियाकत पैक्ट के नाराज मुखर्जी का इस्तीफा

विभाजन की पीड़ा के बीच देश बेहद तकलीफदेह दौर से गुजर रहा था. मजहब के नाम पर पाकिस्तान हासिल करने के बाद भी जिन्ना और उनके साथी भारत के लिए समस्याएं बढ़ा रहे थे. भारत सिर्फ कश्मीर के मोर्चे पर नहीं जूझ रहा था. लगातार उस ओर से हिंदूसिख आबादी का भारत की ओर विस्थापन हो रहा था. पूर्वी पाकिस्तान की ओर से आ रहे हिंदू शरणार्थियों की बाढ़ बीच सरदार पटेल ने एक मौके पर यहां तक कहा कि अगर पाकिस्तान ने इसे नहीं रोका तो उसे इस आबादी को बसाने के लिए जमीन देनी होगी.

पंडित नेहरू.

हिंदू हितों पर लगातार कुठाराघात ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को काफी चिंतित कर रखा था. 8अप्रैल 1950 को दिल्ली में पंडित नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच एक समझौता हुआ. पाकिस्तान की ओर से वहां हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार और उनका पलायन रोकने का आश्वासन दिया गया. नेहरू कैबिनेट के सदस्य डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने समझौते को बंगाल के हिंदुओं के साथ धोखा बताते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि सरदार पटेल चाहते थे कि मुखर्जी इस्तीफे की जगह कैबिनेट में रहते हुए नेहरू का विरोध करें.

संघ ने किया मुखर्जी से संपर्क

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों ने डॉक्टर मुखर्जी के इस्तीफे को काफी गंभीरता से लिया. इस्तीफे के बाद 18 अप्रैल 1950 को डॉक्टर मुखर्जी ने संसद में वक्तव्य दिया कि अगर नेहरू सरकार ने अपनी नीति नहीं बदली तो पाकिस्तान में कोई हिंदू नहीं रह जाएगा और एक बार फिर वही समस्याएं खड़ी हो जाएंगी, जिनके कारण देश का विभाजन हुआ था.

संघ के वे लोग जो गांधी हत्याकांड में प्रतिबंध के बाद से ऐसे राजनीतिक दल की जरूरत महसूस करते थे, जो संघ की सोच के समर्थन में संसद और बाहर अपनी आवाज उठा सके, ने मुखर्जी से संपर्क प्रारंभ किया. मुखर्जी का उन दिनों हिंदू महासभा से तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे. महात्मा गांधी की हत्या को उन्होंने गलत तथा हिन्दू हितों के लिए नुकसानदेह बताया था. कैबिनेट से निकलने के बाद मुखर्जी जल्दी ही किसी नए राजनीतिक दल के गठन की जरूरत महसूस कर रहे थे.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी.

प्रतिबंध हटने के बाद भी संघ कांग्रेस और कम्युनिस्टों के निशाने पर

संघ पर गांधी हत्याकांड के बाद 4 फरवरी 1948 को सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था. 11 जुलाई 1949 को ये प्रतिबंध हटा. लेकिन इसके बाद भी संगठन सरकार के निशाने पर था. कांग्रेस और कम्युनिस्ट लगातार उस पर हमलावर थे. राजनीतिक मंचों पर उसकी हिमायत में बोलने वाला कोई दल नहीं था. ऐसे समय में संघ के शीर्ष पदाधिकारियों के बीच समान विचारधारा वाले राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी.

उन्हीं दिनों तत्कालीन सह सरकार्यवाह बाला साहब देवरस ने युगधर्म में लिखा, “अभी तक दैनिक कार्यक्रमों द्वारा उत्पन्न अनुशासन एवं त्याग के गुणों के प्रकटीकरण के क्षेत्र तक ही संघ सीमित रहा. लेकिन संघ के बाहर का समुदाय इन भावनाओं से अनभिज्ञ रहा है. यह अवस्था अब समाप्त होगी. संघ समाज को साथ लेकर उसकी समस्याओं के निदान की कोशिश करेगा.”

एम. एस. गोलवरकर.

शुरुआती हिचक बाद शर्तों साथ गुरु जी ने दी सहमति

एक ओर संघ का बड़ा हिस्सा सहयोगी राजनीतिक दल के गठन को जरूरी मान रहा था. लेकिन सरसंघचालक एम. एस. गोलवरकर शुरू में हिचक रहे थे? दत्तोपंत ठेंगड़ी के अनुसार, “गुरुजी इस बात को अनुभव करते थे कि हिन्दू हितों को एक दल से संबद्ध करने पर वे संकुचित हो जायेंगे. उनकी दबाव क्षमता कम हो जाएगी. हिंदू हितों के प्रवक्ता यदि सभी दलों में रहते हैं तो दबाव क्षमता ज्यादा रहेगी.

अखिल भारतीय स्तर पर सत्ता के लिए राजनीतिक दल का निर्माण हमें हिंदू हितों से विमुख कर सकता है. वे राजनीति में हिंदू संगठन को प्रेशर ग्रुप की भूमिका में चाहते थे. हाथी बनने की जगह हाथी पर अंकुश लगाने की भूमिका में.” लेकिन जल्दी ही वे सहमत हुए. पर संघ का सहयोग चाहने वाले दल से उनकी कुछ अपेक्षाएं थीं, जो उन्होंने उन दिनों “पाञ्चजन्य” और “ऑर्गेनाइजर” में अपने लेख में स्पष्ट की थीं.

गुरु जी ने लिखा, “यदि संघ के किसी स्वयंसेवक का सहयोग चाहिए तो वह तभी मिल सकेगा जब दिखाई देगा कि आदर्शवाद के आधार पर दल की पृथक राजनीतिक छवि है. मैंने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा एक प्रेस कांफ्रेंस में दिए उस वक्तव्य की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया जिसमें उन्होंने हिंदू राष्ट्र में निष्ठा के कारण हिंदू महासभा को सांप्रदायिक बताया था. मैंने उनसे कहा कि संघ उससे अधिक नहीं तो उसके समान ही विश्वास करता है कि भारत हिन्दू राष्ट्र है. तो क्या वे संघ को अपने से दूर करना चाहेंगे?

टिप्पणी को असावधानीवश किए जाने की उनकी स्वीकृति के बाद ही हमारी सहमति बनी. मैंने अपने ऐसे निष्ठावान और तपे हुए सहयोगियों को चुना जो निःस्वार्थी और दृढ़ निश्चयी थे और जो नए दल का भार अपने कंधों पर ले सकते थे.”

जनसंघ का पहला सम्मेलन

21 अक्तूबर 1951 को दिल्ली के आर्य कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में सम्पन्न राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में अखिल भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई. भाई महावीर महामंत्री बनाए गए. इस अवसर पर मुखर्जी ने कहा था, “हम भारत के पुनर्जागरण और पुनर्निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं. अपने वर्ग, जाति और धर्म के भेदों को भूल कर भारतमाता की सेवा में जुट जाएं. वर्तमान जितना भी अंधकारमय हो लेकिन भविष्य उज्जवल है. हमारी पार्टी का प्रतीक चिह्न दीपक है. वह आशा, एकता,प्रतिबद्धता और साहस का प्रकाश फैला रहा है.”

नए दल की स्थापना में लाला हंसराज गुप्त , बसंतराव ओक ,धर्मवीर , बलराज मधोक तथा भाई महावीर प्रमुख भूमिका में थे. विभिन्न प्रदेशों में जिन्हें यह दायित्व दिया गया, वे थे, उत्तर प्रदेश में दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख, मध्यभारत में मनोहर राव मोघे, राजस्थान में सुंदर सिंह भंडारी, बिहार में ठाकुर प्रसाद आदि.

द्वारिका प्रसाद मिश्र पहला अध्यक्ष बनना चाहते थे

जनसंघ के पहले सम्मेलन में आमंत्रितों में सरदार पटेल के नजदीकी रहे द्वारिका प्रसाद मिश्र भी थे. संस्थापकों में शामिल और जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा “जिंदगी का सफर” में लिखा है कि स्थापना सम्मेलन के पहले ही तय हो चुका था कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही दल के अध्यक्ष होंगे और वे जिन दो महामंत्रियों का मनोनयन करेंगे, उनमें एक नाम संघ की ओर से सुझाया जाएगा.

मधोक ने लिखा, “लेकिन सम्मेलन शुरु होने के पहले एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई. द्वारका प्रसाद मिश्र चाहते थे कि उन्हें अध्यक्ष चुना जाए. कुछ प्रतिनिधि भी उनके पक्ष में थे. जब डॉक्टर मुखर्जी को इस बात का पता लगा तो उन्होंने मिश्र के पक्ष में हट जाने की बात कही. परन्तु संघ के अधिकारी और अधिकांश प्रतिनिधि डॉक्टर मुखर्जी को ही पहला अध्यक्ष चुनना चाहते थे. वास्तव में जनसंघ उन्हीं के मानस की उपज थी और वे ही उसके प्रवर्तक थे. इसलिए उनको छोड़कर अन्य किसी को अध्यक्ष चुनने का प्रश्न ही नहीं था. “

वजूद में आने के सिर्फ ढाई महीने में पहला चुनाव

जनसंघ के गठन और पहले आम चुनाव के बीच सिर्फ ढाई महीने का अंतराल था. इस कम वक्त के बीच दल ने लोकसभा की अस्सी और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की सीटों के लिए लगभग आठ सौ प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे थे. आजादी के फौरन बाद के इस चुनाव में कांग्रेस का वर्चस्व और पंडित नेहरू का आभामंडल अपने उत्कर्ष पर था. जनसंघ के पास धनसाधन और संगठन सबका अभाव था.

संघ के स्वयंसेवक उसकी पूंजी थे. मधोक ने लिखा कि डाॅक्टर मुखर्जी दल के प्रत्याशी चिरंजीत राय के समर्थन में शिमला में सभा करने पहुंचे. तब उन्हें हिंदी में बोलने का अधिक अभ्यास नहीं था. उन्होंने मुझसे अंग्रेजीहिंदी की एक डिक्शनरी लाने को कहा. मैंने उनसे कहा आप इसके चक्कर में न पड़ें. जहां हिंदी के शब्द न समझ आएं, वहां बांग्ला के शब्द इस्तेमाल करें. उसमें अधिकतर संस्कृत के शब्द हैं. वे हिंदी के साथ चल जायेंगे.

वे अंग्रेजी और बांग्ला के बहुत अच्छे वक्ता थे. हिंदी के उनके भाषणों में शुरू में ही प्रवाह आ गया था. इस चुनाव में पार्टी को लोकसभा की तीन सीटें मिली थीं, जिसमें मुखर्जी सहित बंगाल से दो थीं. विधानसभा सीटों की संख्या भी मामूली थी. लेकिन जनसंघ की बड़ी सफलता यह थी कि पहले उसके प्रत्याशियों को मिले वोटों के योग ने पहले ही चुनाव में उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिला दिया.

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