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यह है अद्भुत मंदिर जहां ज्योतिर्लिंग बदलता है रंग, एक दिव्य सर्प करता है इस दक्षिण कैलाश की रक्षा!

श्रीशैलम का श्री भ्रामरांबा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर ज्योतिष और अध्यात्म का संगम है जहां ज्योतिर्लिंग दिन के समय अपना रंग बदलता है. यहां पर महाभारत काल के गुप्त शिवलिंग भी है. श्रीशैलम को दक्षिण कैलाश के रूप में भी जाना जाता है.
Jyotirlinga Mallikarjuna Mandir

 भारत में अनेक मंदिर है जिनसे जुड़े अनेक रहस्य आश्चर्य में डालते हैं. इसी तरह एक मंदिर है आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में जहां का श्री भ्रामरांबा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर अपने भीतर कई रहस्यों को छुपाए बैठा है. यह भव्य मंदिर नल्लमाला की पहाड़ियों और कृष्णा नदी के किनारे स्थित है जो ज्योतिष और अध्यात्म की दृष्टि से अति प्रभावशाली स्थान माना गया है. ज्योतिर्लिंग और शक्ति पीठ दोनों के संगम वाला यह एक ऐसे स्थान है जहां पर शिव जी ‘मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग’ के रूप व मां शक्ति ‘भ्रामरांबा शक्ति पीठ’ की आराधना की जाती है. ब्रह्मांड की पुरुष और स्त्री ऊर्जा का यहां अति शक्तिशाली संगम है.

शिवलिंग से जुड़ा रहस्य 
श्रीशैलम का ज्योतिर्लिंग दिनभर अपना रंग बदलता है. सुबह के समय हल्का सफेद होता है, दोपहर में इसका रंग पीला होता है और शाम के समय शिवलिंग लालिमा के साथ दिखाई देता है. किंवदंतियों के अनुसार महाभारत काल में पांडवों ने अपने वनवास के समय पांच गुप्त शिवलिंग की स्थापित यहीं पर की.

कैसे पड़ा मल्लिकार्जुन नाम
‘मल्लिकार्जुन’ नाम के पीछे की कथा है कि देवी पार्वती ने एक मोम के शिवलिंग पर मल्लिका फूल यानी चमेली चढ़ाएं जिससे वह शिवलिंग पिघला नहीं और वहां भगवान शिव प्रकट हो गए. तब से शिवलिंग को मल्लिकार्जुन कहा गया और भगवान को चमेली के फूल चढ़ाए जाने लगें.

नाग आज भी करता है मंदिर की रक्षा
16वीं सदी से एक कथा कही जाती रही है कि नाग अंपला नाम का एक सर्प था जो दिव्य था और इस मंदिर की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहता था. यह सर्प इस क्षेत्र में आज भी नाग देवता के रूप में उपस्थित होकर मंदिर परिक्रमा करने वालों की सुरक्षा में तैनात रहता है, इस तरह की मान्यता यहां के लोगों में है.

‘दक्षिण कैलाश’ के रूप में प्रसिद्ध
प्राचीन ग्रंथों में श्रीशैलम को एक अद्भुत मंदिर के रूप में वर्णित किया गया है. इस मंदिर को ‘दक्षिण कैलाश’ कहा गया है. ऐसी मान्यता है कि माता पार्वती ने यहां पर एक भौंरे का रूप धारण किया और तपस्या में लीन हो गईं. ऐसे में देवी के भौंरे रूप को ‘भ्रामरांबा’ के रूप में जाना गया और इसी रूप में माता की आराधना की जाती है. मंदिर को लेकर एक लोककथा ये भी प्रचलित है कि प्रवेश द्वार पर भगवान गणेश एक अदृश्य रजिस्टर के साथ उपस्थित है और यहां आने वाले हर भक्त के पाप-पुण्य को उसी रजिस्टर में दर्ज करते हैं. मान्यता है कि जो भी भक्त यहां पर आकर साधना करते हैं उनकी चंद्र-शक्ति और सूर्य-ऊर्जा संतुलित रहती है.

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