DharamIndiaTrending

एक​​​ ही पिता के दो पुत्र, लेकिन किस्मत ने बनाया एक को धन का देवता तो दूसरे को लंकापति रावण! जानिए कुबेर और रावण के रिश्ते की अनसुनी कहानी

एक​​​ ही पिता के दो पुत्र, लेकिन किस्मत ने बनाया एक को धन का देवता तो दूसरे को लंकापति रावण! जानिए कुबेर और रावण के रिश्ते की अनसुनी कहानी

रामायण की कथाओं में रावण के पराक्रम, उसकी विद्वता और सोने की लंका का जिक्र अक्सर सुनने को मिलता है। वहीं दूसरी ओर भगवान कुबेर को धन-संपत्ति का देवता और देवताओं का खजांची माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन दोनों का आपस में बेहद करीबी रिश्ता था? हैरानी की बात यह है कि कुबेर और रावण एक ही पिता की संतान थे। दोनों के पिता महर्षि विश्रवा थे, लेकिन उनकी माताएं अलग-अलग थीं। यही वजह है कि कुबेर और रावण सौतेले भाई कहलाए।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक भाई को देवताओं के बीच धन का अधिपति बनने का सम्मान मिला, जबकि दूसरे ने अपनी शक्ति और महत्वाकांक्षा के बल पर लंका पर अधिकार जमा लिया। इतना ही नहीं, जिस स्वर्ण नगरी पर रावण ने राज किया, वह कभी उसके सौतेले भाई कुबेर की हुआ करती थी। आइए जानते हैं इस रोचक पौराणिक कथा के बारे में।

कौन थे कुबेर और रावण के पिता महर्षि विश्रवा?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि विश्रवा ऋषि पुलस्त्य के पुत्र थे। पुलस्त्य को ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक माना जाता है। महर्षि विश्रवा महान तपस्वी और विद्वान थे। उनके परिवार से जुड़ी दो अलग-अलग शाखाओं ने रामायण की कथा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महर्षि विश्रवा का विवाह इलाविदा से हुआ था। उनसे भगवान कुबेर का जन्म हुआ, जिन्हें आगे चलकर धन का देवता और यक्षों का अधिपति माना गया।

इसके बाद महर्षि विश्रवा का विवाह राक्षस कुल की राजकुमारी कैकेसी से हुआ। उनसे रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ।

इस तरह कुबेर और रावण के पिता एक ही थे, लेकिन माताएं अलग थीं। यही कारण है कि दोनों को सौतेला भाई कहा जाता है।

कैसे एक भाई बना धन का देवता और दूसरा लंकापति?

धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान कुबेर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें धन का अधिपति बनाया। उन्हें देवताओं के खजांची का पद भी प्राप्त हुआ।

मान्यता है कि कुबेर को अपार धन-संपत्ति के साथ पुष्पक विमान भी प्राप्त हुआ था। इसी दौरान लंका नगरी पर भी उनका अधिकार था। सोने की भव्य इमारतों और अपार संपत्ति से सजी लंका को कुबेर की नगरी के रूप में जाना जाता था।

दूसरी ओर रावण भी अत्यंत शक्तिशाली, विद्वान और भगवान शिव का परम भक्त था। उसने कठोर तपस्या करके कई शक्तियां और वरदान प्राप्त किए। धीरे-धीरे उसकी महत्वाकांक्षा और सत्ता की इच्छा बढ़ती चली गई।

रावण ने अपने ही सौतेले भाई से छीन ली सोने की लंका

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में रावण और कुबेर से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग मिलता है। कथा के अनुसार, रावण को जब पता चला कि उसके सौतेले भाई कुबेर के पास अपार धन-संपत्ति, पुष्पक विमान और स्वर्ण नगरी लंका है, तो उसके मन में भी उस पर अधिकार करने की इच्छा जाग उठी।

रावण ने अपनी शक्ति और सेना के बल पर कुबेर को चुनौती दी। दोनों के बीच संघर्ष हुआ और अंततः रावण ने कुबेर को पराजित कर दिया।

इसके बाद रावण ने लंका पर अपना अधिकार जमा लिया। इतना ही नहीं, उसने कुबेर का पुष्पक विमान भी अपने कब्जे में ले लिया। इस तरह कुबेर को अपनी ही नगरी छोड़नी पड़ी।

लंका छोड़ने के बाद कहां रहने लगे भगवान कुबेर?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण से पराजित होने के बाद कुबेर लंका छोड़कर चले गए। इसके बाद उन्होंने कैलाश पर्वत के निकट अलकापुरी को अपना निवास बनाया।

अलकापुरी को कुबेर की भव्य नगरी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में यह स्थान धन, वैभव और यक्षों के निवास से जुड़ा हुआ है।

हालांकि लंका का राजपाट छिन जाने के बाद भी कुबेर का देवताओं के बीच सम्मान कम नहीं हुआ। वे धन के देवता और देवताओं के खजांची के रूप में प्रतिष्ठित रहे।

कुबेर और रावण की कहानी से क्या मिलती है सीख?

कुबेर और रावण की यह पौराणिक कथा बताती है कि एक ही परिवार में जन्म लेने वाले दो व्यक्तियों के विचार, स्वभाव और जीवन की दिशा कितनी अलग हो सकती है।

कुबेर को धन और समृद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है, जबकि रावण अपनी अपार विद्वता और शक्तियों के बावजूद अहंकार तथा अत्यधिक महत्वाकांक्षा के कारण विनाश की ओर बढ़ा।

इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि केवल ज्ञान, शक्ति और संपत्ति ही किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाते, बल्कि उसका आचरण, विवेक और सही-गलत की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी रामायण और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में कथाओं के विवरण में अंतर मिल सकता है। पाठक इसे धार्मिक एवं पौराणिक कथा के रूप में ग्रहण करें।

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply