कविता अपने परिवार के साथ कश्मीर घूमने गई. उसकी टीनएजर बेटी ने एक फेमस कैफे को को खोजने और वहां जाकर फोटो खिंचाने की जिद ठान ली, जिसे उसने किसी मूवी में देखा था. अब आप किसी टूरिस्ट स्पॉट पर पहुंचे तो लोकल लोग ही नहीं, सोशल मीडिया का एल्गोरिदम भी आपको वहां के फेमस कैफे बारबार दिखाने लगता है. वजह सिर्फ कॉफी नहीं, वो ओवरऑल एक्सपीरियंस है जिसे नई जेनरेशन कैमरे में भी कैद करना चाहती है और सोशल मीडिया पर शेयर भी.

कभी चाय के लिए नुक्कड़, मिलने के लिए घर और दोस्तों के साथ बातचीत के लिए पार्क थे. अब लोकेशन बदलकर कैफे हो गई है. कॉफी हो या चाय, मोमोज हों या पास्ता, सामने लैपटॉप हो या चार दोस्त कैफे अब मीटिंग रूम, स्टडी स्पेस, डेटिंग स्पॉट, फोटो बैकग्राउंड, इनफॉर्मल जॉब इंटरव्यू और दोस्तों का अड्डा तक बन चुके हैं.
बढ़ रहा है कैफे मार्केट
भारत के रेस्तरां और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री पर फोकस करने वाले मीडिया और इंडस्ट्री प्लेटफॉर्म रेस्तरां इंडिया की रिपोर्ट कहती है साल 2025 में भारत के ब्रांडेड कॉफीशॉप सेगमेंट में करीब 5,339 आउटलेट थे. इस सेगमेंट में एक साल में लगभग 12.7 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई.
भारत में कॉफी शॉप और कैफे मार्केट 2025 में करीब 424.6 मिलियन डॉलर का था, जिसके 2034 तक 1.15 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. दिल्लीमुंबई से लेकर देहरादून, जयपुर, लखनऊ और दूसरे टियर2 शहरों तक कैफे कल्चर का फैलना इसी बदलाव का संकेत है.
अब कॉफी नहीं, एक्सपीरियंस बिक रहा है
नई जनरेशन कैफे चुनते वक्त सिर्फ मेन्यू नहीं देखती. इंटीरियर कैसा है, वाइब कैसी है, फोटो कैसी आएगी और कुछ हट के एक्सपीरियंस मिलेगा या नहीं. इनसे तय होता है कि कैफे जाना है या नहीं. श्रीनगर का चायजाय कैफे कश्मीरी चाय, कश्मीरी क्यूज़ीन, कश्मीरी संस्कृति और झेलम के किनारे के माहौल से जोड़ता है. यानी कप में सिर्फ चाय नहीं, एक लोकेशन, एक कहानी और लोकल एक्सपीरियंस भी परोसा जाता है.
ओटीटी पर मुसाफिर कैफे सीरीज़ आने के बाद मसूरी का जड़ीपानी कैसल यंग जनरेशन के लिए नेक्स्ट डेस्टिनेशन बन गया. अब कैफे की यूएसपी सिर्फ कॉफी नहीं, लोकेशन और स्टोरी होती है.
GenZ के लिए कैफे क्यों खास?
कैफे अब सोशल स्पेस है. दोस्तों से मिलना हो, पढ़ाई करनी हो, लैपटॉप पर काम करना हो, इनफॉर्मल मीटिंग करनी हो या बस अकेले बैठना हो—यहां घर जैसी पाबंदी नहीं और ऑफिस जैसा फॉर्मल माहौल भी नहीं. ग्लोबल मार्केटरिसर्च कंपनी यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल की रिसर्च के मुताबिक जेन ज़ी कॉफी और चाय को सिर्फ ड्रिंक के तौर पर नहीं देख रही. नए एक्सपीरियंस, पर्सनलाइजेशन, डिजिटल ऑर्डरिंग और सोशल मीडिया जैसे फैक्टर उसके कंजंप्शन को प्रभावित कर रहे हैं.
यूरोमॉनिटर के अनुमान के मुताबिक भारत में 2029 साल के लोगों की औसत ग्रॉस इनकम 2024 से 2029 के बीच करीब 5 फीसदी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट से बढ़ सकती है. यानी युवा कंज्यूमर की खर्च करने की क्षमता बढ़ने के साथ एक्सपीरियंसबेस्ड खर्चों के लिए भी जगह बन रही है.
महंगी कॉफी भी कब लगती है वैल्यू फॉर मनी
महंगाई और बजट प्रेशर में कंज्यूमर अब सिर्फ प्रीमियम के लिए पैसा खर्च नहीं करना चाहता. यूरोमॉनिटर की रिसर्च के मुताबिक उसे चाहिए वैल्यू फॉर मनी और एक्सपीरियंस.यानी 200 रुपये की कॉफी तभी वर्थ इट लगती है जब उसके साथ अच्छा माहौल, वाईफाई, फोटो और दोस्तों के साथ वक्त बिताने की वजह भी मिले. इसीलिए स्टारबक्स जैसे ग्लोबल ब्रांड्स के साथ छोटे लोकल कैफे, चाय कैफे और बजटफ्रेंडली आउटलेट भी अपनी जगह बना रहे हैं. देहरादूनमसूरी और हिमाचल के धर्मकोट जैसे टूरिस्ट हब इसका उदाहरण हैं, जहां कैफे खुद डेस्टिनेशन एक्सपीरियंस का हिस्सा बन चुके हैं.
नया नुक्कड़, बस थोड़ा महंगा
लोकेशन या लाइफ कितनी भी बदल जाए लोग मिलना तो नहीं छोड़ेंगे और मिलने के लिए चाहिए एक सही जगह घर, नुक्कड़ की चाय और पार्क के बाद अब हॉट स्पॉट हैं कैफे. कैफे विद वाइब, विद वाईफाई, चार्जिंग पॉइंट और इंटीरियर. इसलिए बढ़ता कैफे कल्चर सिर्फ कॉफी की बढ़ती डिमांड नहीं है. ये उस जेनरेशन की स्टोरी है जो घर और ऑफिस के बीच अपनी तीसरी जगह तलाश रही है. इसलिए सवाल ये नहीं है कि कॉफी कैसी है? सवाल हैएक्सपीरियंस कैसा है?



