दिल्ली में एक बार फिर हवा जहरीली हो गई है. सर्दी आते ही यहां स्मॉग की चिंता बढ़ जाती है. हवा में धूल, धुआं और बारीक कण जमा होते हैं. सांस लेना मुश्किल हो सकता है. आंखों में जलन और खांसी जैसी परेशानियां भी बढ़ती हैं. यह समस्या सिर्फ दिल्ली की नहीं है. दुनिया के कई बड़े शहर पहले गंभीर वायु प्रदूषण से जूझ चुके हैं.आइए, जानते हैं कि लंदन, लॉस एंजेलिस, मेक्सिको सिटी और बीजिंग ने कैसे अपने शहरों की हवा साफ की? दुनिया के वो शहर जिन्होंने को हराया?

लंदन, लॉस एंजिल्स, मेक्सिको सिटी और बीजिंग ने अलगअलग रास्ते अपनाए. किसी ने कोयले का इस्तेमाल घटाया. किसी ने वाहनों और कारखानों के उत्सर्जन पर रोक लगाई. कुछ शहरों ने सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाया. उनके अनुभव बताते हैं कि हवा साफ करने के लिए एक उपाय काफी नहीं होता. लगातार काम और सख्त नियम जरूरी हैं.
लंदन: कोयले के धुएं से स्वच्छ ईंधन तक
लंदन में 1952 का ग्रेट स्मॉग एक बड़ी चेतावनी बना. घरों और कारखानों में कोयला जलाने से धुआं निकलता था. ठंडी और स्थिर हवा के कारण धुआं शहर के ऊपर जमा हो गया. दृश्यता बहुत कम हो गई. लोगों को सांस लेने में परेशानी हुई और स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा.
इस आपदा के बाद ब्रिटेन ने 1956 में क्लीन एयर एक्ट लागू किया. कानून के तहत धुएं पर नियंत्रण के लिए कदम उठाए गए. कुछ इलाकों को धुआं नियंत्रण क्षेत्र बनाया गया. वहां घरों में कोयला जलाने की जगह कम धुआं पैदा करने वाले ईंधन को बढ़ावा मिला. लोगों को गैस और बिजली जैसे विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया.
1952 में लंदन का कुछ ऐसा हाल था, बाद में सख्ती के कारण हवा हुई साफ
बाद के वर्षों में भी नियम बदले. वाहनों से निकलने वाले धुएं पर ध्यान दिया गया. लंदन ने अल्ट्रा लो एमिशन ज़ोन जैसी नीति अपनाई. इस क्षेत्र में अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के इस्तेमाल को महंगा बनाया गया. इससे लोगों और वाहन कंपनियों पर साफ विकल्प अपनाने का दबाव पड़ा.
लंदन का अनुभव बताता है कि साफ हवा एक लंबे समय का लक्ष्य है. कानून के साथ लोगों को स्वच्छ ईंधन का विकल्प देना भी जरूरी है. सिर्फ प्रतिबंध लगाने से बदलाव कठिन हो सकता है.
लॉस एंजिल्स: कारों के धुएं पर कार्रवाई
लॉस एंजिल्स लंबे समय तक घने धुंध जैसे स्मॉग के लिए जाना जाता था. वहां कारों की संख्या बढ़ रही थी. वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषक धूप के साथ मिलकर जमीन के पास ओजोन बनाते थे. शहर की भौगोलिक स्थिति और मौसम भी प्रदूषण को फैलने से रोकते थे.
इस समस्या से निपटने के लिए शहर और राज्य ने प्रदूषण की निगरानी करने वाली संस्थाओं को मजबूत किया. वाहनों के उत्सर्जन पर सख्त नियम बने. कारों की जांच के कार्यक्रम शुरू हुए. पुराने और अधिक धुआं छोड़ने वाले वाहनों को सुधारने या बदलने पर जोर दिया गया. ईंधन और इंजन तकनीक में भी बदलाव हुए.
स्मॉग के बाद कुछ ऐसा दिखा था लॉस एंजिल्स.
बसों और ट्रकों जैसे भारी वाहनों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कदम उठाए गए. बंदरगाहों पर माल ढुलाई करने वाले डीजल ट्रकों पर भी ध्यान दिया गया. इससे प्रदूषण के स्रोतों को अलगअलग पहचानकर उन पर काम करने का तरीका विकसित हुआ.
लॉस एंजिल्स का सबक यह है कि सिर्फ निजी कारों को देखना काफी नहीं. बस, ट्रक, उद्योग और माल ढुलाई भी योजना का हिस्सा होने चाहिए. नियम लागू करने वाली संस्थाओं के पास निगरानी और कार्रवाई की क्षमता होना भी जरूरी है.
मेक्सिको सिटी: गाड़ियों से लेकर ईंधन तक बदलाव
मेक्सिको सिटी पहाड़ों से घिरे ऊंचे इलाके में बसा है. वहां की भौगोलिक स्थिति और मौसम प्रदूषित हवा को शहर में रोक सकते हैं. तेजी से बढ़ती आबादी, कारों और उद्योगों ने समस्या को और गंभीर बनाया. शहर ने 1989 में एक दिन के लिए कुछ गाड़ियों को सड़क से हटाने की योजना शुरू की. इस व्यवस्था में नंबर प्लेट के आधार पर तय होता था कि कौनसी गाड़ी किस दिन चल सकती है. लेकिन अकेले इस कदम से समस्या हल नहीं हुई. कुछ परिवारों ने दूसरी गाड़ियां खरीद लीं.
मेक्सिको सिटी.
इससे योजना का असर सीमित हो गया. बाद में मेक्सिको सिटी ने ProAir नाम से लंबे समय की योजना अपनाई. इसमें प्रदूषण के कई स्रोतों पर एक साथ काम किया गया. ईंधन की गुणवत्ता सुधारी गई. बिना सीसे वाले पेट्रोल को बढ़ावा मिला. वाहनों के उत्सर्जन मानक सख्त किए गए. मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन का विस्तार भी योजना का हिस्सा बना.
यहां से एक अहम सीख मिलती है. वाहन प्रतिबंध तभी असरदार होते हैं, जब लोगों के पास भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन हो. साफ ईंधन और बेहतर वाहन मानक भी साथसाथ लागू होने चाहिए. मेक्सिको सिटी की कहानी पूरी तरह खत्म हुई समस्या की नहीं है. बढ़ती आबादी और वाहन इस्तेमाल के कारण प्रदूषण पर लगातार नजर रखना जरूरी है.
बीजिंग: कोयले और उद्योगों पर कड़ी कार्रवाई
बीजिंग में कोयला जलाना वायु प्रदूषण का बड़ा कारण था. घरों में सर्दियों के दौरान हीटिंग के लिए कोयले का इस्तेमाल होता था. उद्योगों और वाहनों से भी धुआं निकलता था. प्रदूषित हवा को आसपास के पहाड़ी इलाके में फैलने में कठिनाई होती थी.
चीन ने 2013 के बाद वायु प्रदूषण कम करने के लिए बड़े स्तर पर योजना शुरू की. कोयले पर निर्भरता घटाने के कदम उठाए गए. घरों में कोयले की जगह गैस और बिजली जैसे विकल्पों को बढ़ावा मिला. प्रदूषण फैलाने वाले कुछ कारखाने बंद किए गए या शहर से बाहर ले जाए गए. बाकी उद्योगों के लिए उत्सर्जन के नियम सख्त किए गए.
जहरीली हवा को दिखाती बीजिंग की तस्वीर.
पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर भी कार्रवाई हुई. हवा की निगरानी के लिए माप केंद्र बनाए गए. आंकड़ों से प्रदूषण के स्रोतों को समझने और नियम लागू करने में मदद मिली. शहर ने सिर्फ अपनी सीमा के भीतर कार्रवाई नहीं की. आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों को भी ध्यान में रखा गया.
बीजिंग का अनुभव बताता है कि हवा एक शहर की सीमा में बंद नहीं रहती. आसपास के जिलों और उद्योगों से आने वाला प्रदूषण भी असर डालता है. इसलिए क्षेत्रीय स्तर पर मिलकर काम करना जरूरी है.
दिल्ली के लिए क्या मायने हैं?
दिल्ली का प्रदूषण कई स्रोतों से आता है. वाहनों का धुआं, उद्योग, निर्माण की धूल, कचरा जलाना और आसपास के क्षेत्रों का प्रदूषण इसमें योगदान देते हैं. सर्दियों में मौसम और हवा की कम गति प्रदूषकों को जमीन के पास रोक सकती है. कुछ दिनों में खेतों में पराली जलाने से भी प्रदूषण बढ़ सकता है. हर स्रोत का असर समय और मौसम के साथ बदलता है.
इसलिए दिल्ली को पहले यह स्पष्ट करना होगा कि किस इलाके और मौसम में प्रदूषण कहां से आ रहा है. भरोसेमंद निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन से योजनाएं बेहतर बन सकती हैं. इसके बाद हर स्रोत के लिए अलग कदम तय किए जा सकते हैं.
दिल्ली की हवा जहरीली
सार्वजनिक परिवहन को सुविधाजनक और भरोसेमंद बनाना महत्वपूर्ण है. बसों और मेट्रो तक पहुंच आसान होनी चाहिए. पैदल चलने और साइकिल के लिए सुरक्षित रास्ते भी जरूरी हैं. इससे निजी वाहनों पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है.
उद्योगों और वाहनों के नियम सिर्फ कागज पर नहीं रहने चाहिए. नियमित जांच और उल्लंघन पर कार्रवाई जरूरी है. प्रदूषण फैलाने वाले पुराने उपकरणों को बदलने में छोटे कारोबारों और परिवारों को मदद देना भी उपयोगी हो सकता है. किसानों के लिए पराली के वैकल्पिक उपयोग और मशीनों की उपलब्धता जैसे व्यावहारिक विकल्प जरूरी हैं.
ये शहर भी हैं उदाहरण
दुनिया भर में कुछ और शहर हैं जो उदाहरण बन सकते हैं. यद्यपि इनका प्रदूषण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है लेकिन इनके अनुभव बताते हैं कि सख्त नियम, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छ ईंधन और लगातार निगरानी से हवा की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है. दिल्ली के लिए भी इन उपायों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाना होगा.
- टोक्यो, जापान: डीज़ल वाहनों के उत्सर्जन पर सख्त नियम लागू किए. स्वच्छ ईंधन और वाहन तकनीक को बढ़ावा दिया.
- पेरिस, फ्रांस: पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए जगह बढ़ाई. सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर पाबंदियां लगाईं.
- सियोल, दक्षिण कोरिया: पुराने डीज़ल वाहनों पर नियंत्रण और सार्वजनिक परिवहन में सुधार जैसे कदम उठाए.
- क्राको, पोलैंड: घरेलू हीटिंग में इस्तेमाल होने वाले कोयले और ठोस ईंधन को सीमित करने के लिए नियम बनाए. स्थानीय नागरिक समूहों ने भी कार्रवाई की मांग की.
- हेलसिंकी, फिनलैंड: सार्वजनिक परिवहन, पैदल रास्तों और साइकिल सुविधाओं को बढ़ावा देकर वाहननिर्भरता कम करने पर काम किया.
- शंघाई, चीन: वाहनों और उद्योगों के उत्सर्जन पर नियंत्रण के साथ स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा दिया.
अपने शहर का AQI देखने के लिए यहां करें



