AI Bubble Crisis: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की दुनिया में इस वक्त एक बड़ा सवाल घूम रहा है. क्या एआई का गुब्बारा फूटने वाला है या फिर इसमें से सिर्फ अतिरिक्त हवा निकल रही है. टेस्ला के प्रमुख एलन मस्क की एक हालिया चेतावनी ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है. मस्क ने कहा है कि एआई क्लाउड सेक्टर में बड़े पैमाने पर कंपनियां बंद होने वाली हैं. उनकी इस बात ने उस बाजार में नया दबाव बना दिया है, जो पहले से ही गिरते बॉन्ड दाम के साथ कर्ज से बने डेटा सेंटर्स को लेकर परेशान है. मस्क का अनुमान है कि नियोक्लाउड कंपनियों में तबाही आने वाली है. हालांकि दूसरी तरफ एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग ने निवेशकों को भरोसा दिलाया है कि कंप्यूटिंग क्षमता की मांग उम्मीद से कहीं ज्यादा है.

नियोक्लाउड कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर संकट
नियोक्लाउड ऐसी खास क्लाउड कंपनियां होती हैं जो ताकतवर जीपीयू से भरे डेटा सेंटर बनाती हैं या किराए पर लेती हैं. इसके बाद वे इस कंप्यूटिंग क्षमता को एआई डेवलपर्स को किराए पर देती हैं. मस्क का मानना है कि 200 से ज्यादा नियोक्लाउड कंपनियां खत्म हो जाएंगी या बड़ी कंपनियों में मिल जाएंगी. उन्होंने साफ कर दिया कि स्पेसएक्स ऐसी किसी कंपनी को नहीं खरीदेगी. मस्क के मुताबिक जिन कंपनियों के पास एआई डेटा सेंटर के अलावा कमाई का दूसरा बड़ा जरिया नहीं है, उन्हें अपना काम बढ़ाने के लिए पैसा जुटाने में बहुत दिक्कत होगी.
मस्क के इस बयान के बाद कोरवीव, नेबियस, आईआरईएन जैसी नियोक्लाउड कंपनियों के शेयर गिर गए. करीब दो हफ्ते पहले भी अमेरिकी ब्याज दरें बढ़ने की आशंका से कोरवीव के साथ नेबियस के शेयरों में भारी गिरावट आई थी. कोरवीव के 2032 में पूरे होने वाले बॉन्ड की कीमत प्रति डॉलर 80 सेंट से नीचे आ गई है. ये स्तर बताता है कि निवेशकों को कंपनी के कर्ज चुकाने की क्षमता पर गहरा शक है. असली समस्या ग्राहकों की कमी नहीं है. नियोक्लाउड कंपनियां भविष्य की कमाई के भरोसे भारी कर्ज लेकर महंगे जीपीयू खरीदती हैं. जब कर्ज महंगा होता है, तो मांग रहने के बाद भी इनका गणित बिगड़ जाता है.
बाजार में सुधार या बड़ी तबाही की आहट
सीएनबीसी के एक शो में बाजार के जानकार एड यार्डेनी ने कहा कि एआई का गुब्बारा फूट नहीं रहा है, बल्कि उसमें से सिर्फ हवा निकल रही है. उनके मुताबिक कर्ज की सख्त शर्तें फिजूलखर्ची को रोक सकती हैं, जिससे एआई का असली विकास प्रभावित नहीं होगा. अगर कर्ज देने वाले कमजोर कंपनियों से ज्यादा ब्याज मांगेंगे, तो बिना मजबूत आधार वाले प्रोजेक्ट बंद हो जाएंगे. कम पैसे वाली कंपनियों को अपनी संपत्ति बेचनी पड़ेगी या खरीदार ढूंढने होंगे. वहीं मजबूत फंड वाली कंपनियां निवेश जारी रखेंगी.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट बताती है कि दबाव पूरी तरह असली है. कोरवीव के अलावा ओरेकल जैसी कंपनियों के लिए कर्ज डिफॉल्ट के खिलाफ बीमा कराने की लागत काफी बढ़ गई है. ट्रेजरी यील्ड बढ़ने से इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वालों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है. क्रेडिट मार्केट अब सवाल उठा रहा है कि क्या भविष्य में होने वाली कमाई आज के भारी निवेश के बराबर हो पाएगी.
गार्टनर के आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल
रिसर्च फर्म गार्टनर का अनुमान है कि एआई कंपनियां 2026 में इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च करेंगी. इसके बाद 2027 से 2030 के बीच 6 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त खर्च होगा. गार्टनर के मुताबिक इस निवेश, कर्ज की लागत के साथ 12 फीसदी रिटर्न निकालने के लिए डेटा सेंटर मालिकों को 2030 तक कुल 8.5 ट्रिलियन डॉलर की कमाई करनी होगी. लेकिन इस दौरान एआई डेटा सेंटर्स से सिर्फ 3.6 ट्रिलियन डॉलर की कमाई होने का अनुमान है.
गार्टनर ने चेतावनी दी है कि 2030 के अंत तक 3.5 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का एआई इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च डूबने के खतरे में पड़ सकता है. रिपोर्ट का ये भी कहना है कि तब तक नियोक्लाउड सेक्टर की ये छोटी कंपनियां या तो दिवालिया हो जाएंगी या बिक जाएंगी. साथ ही तेजी से बेहतर होते चिप्स के कारण पुराने उपकरण अपनी लागत निकालने से पहले ही बेकार हो सकते हैं.
दिग्गज टेक कंपनियों के सामने भी बड़ी चुनौती
नियोक्लाउड का भविष्य उनके ग्राहकों की आर्थिक ताकत पर टिका है. माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन या अल्फाबेट के पास अपने पुराने क्लाउड के साथ सॉफ्टवेयर बिजनेस से पैसा आता है, जिससे वे एआई निवेश को संभाल सकती हैं. रॉयटर्स के अनुसार इन तीनों कंपनियों के पास करीब 1.7 ट्रिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्टेड रेवेन्यू है, जो अभी मिलना बाकी है. ये तीनों कंपनियां 2026 में 600 अरब डॉलर तक खर्च कर सकती हैं.
अगर बड़ी कंपनियों की क्लाउड ग्रोथ मजबूत रहती है, तो ये संकट सिर्फ छोटी नियोक्लाउड कंपनियों तक सीमित रहेगा. लेकिन अगर कमाई के मुकाबले खर्च तेजी से बढ़ा, तो बड़ी कंपनियां अपने प्रोजेक्ट्स रोक सकती हैं. इससे नियोक्लाउड कंपनियों को काम मिलना कम हो जाएगा. फिर ये संकट चिप सप्लायर्स से लेकर पूरे टेक बाजार में फैल सकता है.



