अमेरिका ने रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों पर नए टैरिफ लगाने की धमकी से कदम पीछे खींच लिए हैं. इससे भारत को एक बड़ी राहत मिली है. अगर ये टैरिफ लागू हो जाते, तो अमेरिकी बाजार में भारत के निर्यात की कॉस्ट काफी बढ़ सकती थी. 16 अक्टूबर को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया. इसके तहत ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ के अंतर्गत आने वाले कुछ खास टैरिफ, प्रतिबंधों और पाबंदियों को हटा दिया गया है.

यह फैसला 18 अक्टूबर से कुछ दिन पहले आया है—वह तारीख जब इस कानून के तहत रूसी तेल और गैस की नई खरीद पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो सकता था. यह घटनाक्रम उस पॉलिसी में आया एक नया मोड़ है, जिसकी शुरुआत 500 प्रतिशत टैरिफ के प्रस्ताव से हुई थी. बाद में इसे बदलकर 100 प्रतिशत टैरिफ के ढांचे में ढाला गया, और अब राष्ट्रपति के आदेश के जरिए इसे फिलहाल रोक दिया गया है.
500% से 100% तक
ग्राहम ने इस प्रस्ताव के शुरुआती एडिशन में, रूसी तेल और दूसरे एनर्जी प्रोडक्ट्स को खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी. इसका मकसद मास्को पर दबाव डालना था, ताकि जो देश रूसी ऊर्जा खरीदना जारी रखते हैं, उनके लिए अमेरिका के साथ व्यापार करना बहुत महंगा हो जाए.
अंततः जो कानून पास हुआ, उसमें 100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान रखा गया. यह उन पांच सबसे बड़े देशों पर लागू होता जो रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदते हैं, बशर्ते वे 18 अक्टूबर या उसके बाद जानबूझकर ऐसी नई खरीद करते हैं. इसके अलावा, एक अलग प्रावधान उन लोगों या संस्थाओं के लिए भी था जो रूस पर लगे प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं.
18 सितंबर, 2026 को कानून के रूप में लागू होने के बावजूद, यह एक्ट रूसी तेल खरीदने वाले हर देश पर अपने आप टैरिफ नहीं लगाता था. इसका लागू होना कानून की शर्तों और राष्ट्रपति के फैसलों पर निर्भर था.
16 अक्टूबर को, ट्रंप ने कुछ खास शुल्कों और प्रतिबंधों को लागू करने से छूट दे दी, जिसमें 100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान भी शामिल था. इस आदेश में रूसी मूल के सामानों पर लगने वाले 500 प्रतिशत शुल्क का भी जिक्र है, जो रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों को दंडित करने के उस पुराने प्रस्ताव से अलग है.
भारत को ज्यादा टैरिफ का खतरा क्यों था?
भारत की कमजोरी का कारण रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल की खरीद और अमेरिका को होने वाला उसका निर्यात था. फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद, भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल की खरीद बढ़ा दी, जिससे रूस भारतीय रिफाइनरियों के लिए तेल का एक प्रमुख सप्लायर बन गया.
‘केप्लर’ के अनुसार, सितंबर 2026 में भारत ने रूस से रोजाना लगभग 1.74 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात किया. यह अगस्त के लगभग 2.1 मिलियन बैरल प्रति दिन के आंकड़े से कम था. सितंबर का यह अनुमान 27 सितंबर तक के डेटा पर आधारित था, न कि पूरे महीने के अंतिम आंकड़ों पर. इसके बावजूद, रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा.
भारत अपनी कच्चे तेल की 90 प्रतिशत से अधिक जरूरतों के लिए इंपोर्ट पर निर्भर है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा के लिए विदेशों से सस्ती और भरोसेमंद आपूर्ति मिलना बहुत जरूरी है. हालांकि, वाशिंगटन का तर्क था कि रूस से ऊर्जा खरीदने से जो कमाई होती है, उससे यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को आर्थिक मदद मिलती है.
भारतीय एक्सपोर्ट पर 100 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगने से अमेरिकी बाजार में भारतीय प्रोडक्ट्स की प्रतिस्पर्धात्मकता काफी कम हो सकती थी, जिससे ऑर्डर, कारोबार और नौकरियों पर खतरा पैदा हो जाता. इसलिए, भारत के सामने एक मुश्किल चुनौती थी—सस्ती ऊर्जा हासिल करने और एक बड़े निर्यात बाजार तक अपनी पहुंच बनाए रखने के बीच संतुलन बिठाना.
भारत पहले भी टैरिफ के ऐसे खतरे का सामना कर चुका है
यह ताजा घटनाक्रम रूस से जुड़े तेल के एक पुराने दंड के बाद हुआ है. 6 अगस्त 2025 को, ट्रम्प ने भारत द्वारा रूस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तेल ख़रीदने का हवाला देते हुए, भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का आदेश दिया. यह 27 अगस्त से लागू हुआ, जिससे कई भारतीय सामानों पर कुल शुल्क बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच गया.
फरवरी 2026 में, अमेरिका और भारत के बीच हुए एक व्यापक व्यापार समझौते के तहत, ट्रंप ने 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ को हटाने की घोषणा की. भारतीय सामानों पर अमेरिका का जवाबी टैरिफ भी 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया. यह बदलाव भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद बंद करने के वादे से जुड़ा था.
व्हाइट हाउस ने बताया कि भारत की योजना अमेरिका से 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की ऊर्जा, तकनीक, कृषि उत्पाद और अन्य सामान ख़रीदने की है. यह केवल एक इरादा था, न कि इस बात का सबूत कि इतनी पूरी राशि का सामान खरीद लिया गया है. दोनों देशों ने एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में बातचीत करने के लिए भी प्रतिबद्धता जताई है.
दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले फेज पर काम कर रहे हैं. हालांकि, अमेरिका के टैरिफ ढांचे में आए बदलावों के कारण फरवरी में बनी सहमति में कुछ समायोजन करने की आवश्यकता पड़ गई है.
निर्यातकों के लिए इस छूट का क्या मतलब है?
अक्टूबर के आदेश से ‘ग्राहम एक्ट’ के तहत लगने वाले कुछ शुल्क तत्काल प्रभाव से हट गए हैं, लेकिन इससे भारतीय सामानों पर लगे सभी अमेरिकी टैरिफ खत्म नहीं हुए हैं और न ही फरवरी के व्यापार ढांचे में कोई बदलाव आया है.
भारत को कुछ राहत तो मिली है, लेकिन भविष्य में अमेरिकी कार्रवाई से कोई स्थायी छूट नहीं मिली है. ‘ग्राहम एक्ट’ अभी भी लागू है, जिसका मतलब है कि ट्रंप प्रशासन के पास इस छूट पर दोबारा विचार करने का विकल्प मौजूद है.
भारतीय एक्सपोर्ट सेक्टर से जुड़े एक अधिकारी, जिन्होंने अपना नाम न बताने का अनुरोध पर मनी कंट्रोल की रिपोर्ट में कहा कि यह यथास्थिति बनाए रखने जैसा है. फिलहाल टैरिफ की स्थिति वैसी ही है जैसी पहले थी. फिलहाल, जबरन श्रम से जुड़े ‘सेक्शन 301’ के तहत, भारत से जाने वाले अधिकांश सामानों पर अमेरिका 10 प्रतिशत का टैरिफ लगाता है.
ट्रंप का रूसी डीजल समझौता एक हफ्ते पहले हुआ था
इस छूट के समय पर ध्यान देना जरूरी है. 9 अक्टूबर को, ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक समझौते की घोषणा की, जिसके तहत रूस अमेरिका और ग्लोबल मार्केट्स को 300,000 टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा. अमेरिकी ट्रेजरी ने भी एक अस्थायी लाइसेंस जारी किया, जिससे रूसी डीजल की बिक्री और उससे जुड़े लेनदेन पर लगी पाबंदियों में ढील दी गई.
इस समझौते को फ्यूल की आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों को कम करने के एक उपाय के रूप में पेश किया गया था. लेकिन इससे वाशिंगटन की पॉलिसी में विरोधाभास को लेकर सवाल खड़े हो गए. एक तरफ प्रशासन उन देशों को दंडित करने की तैयारी कर रहा था जो रूस से ऊर्जा खरीद रहे थे, वहीं दूसरी तरफ वह खुद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में रूसी डीजल की बिक्री को आसान बना रहा था. इस घटनाक्रम से यह साबित नहीं होता कि डीजल समझौते की वजह से ही यह छूट मिली है, लेकिन इससे इस फैसले के पीछे के संदर्भ को समझने में मदद मिलती है.
वाशिंगटन ने कदम पीछे क्यों खींचे?
‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ के अजय श्रीवास्तव का कहना है कि इस छूट के पीछे कई कारण हो सकते हैं. यह छूट ‘ग्राहम एक्ट’ के कानून बनने के एक महीने से भी कम समय के भीतर दी गई है.
श्रीवास्तव ने कहा कि रूस के साथ 9 अक्टूबर के समझौते के तहत, अमेरिका ने अपने घरेलू स्तर पर फ्यूल की कमी और ऊंची कीमतों को कम करने के लिए रूसी डीजल खरीदने का फैसला किया. ऐसे में, अगर अमेरिका खुद रूसी ऊर्जा खरीद रहा हो और साथ ही ऐसा करने वाले अन्य देशों को दंडित करे, तो उस पर ‘दोहरे मापदंड’ अपनाने का आरोप लग सकता है. उन्होंने चीन के साथ वाशिंगटन की उस समझ का भी जिक्र किया, जिसके तहत अमेरिका 10 जनवरी तक चीन पर टैरिफ न बढ़ाने के लिए सहमत हुआ था.
उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका खुद इस दायरे से बाहर है और चीन को भी सुरक्षा मिली हुई है, ऐसे में केवल भारत को निशाना बनाने से दोनों देशों के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ता पटरी से उतर सकती है. ट्रंप के कार्यकारी आदेश में औपचारिक रूप से अमेरिकी राष्ट्रीय हितों का हवाला दिया गया और अधिकारियों को रूस से ऊर्जा खरीद की निगरानी जारी रखने की अनुमति दी गई.



