Bijnor News: बिजनौर में दिवाली के लिए घर की साफसफाई के दौरान उल्लू के छह बच्चे मिले हैं. मकान मालिक ने पक्षियों को परेशानी में देखकर वन विभाग को सूचना दी. इसके बाद वन विभाग की टीम ने सभी छह बच्चों को सुरक्षित रेस्क्यू कर अपने संरक्षण में ले लिया. फिलहाल ये सभी वन विभाग के रेंज कार्यालय में रह रहे हैं, जहां उनकी खास देखभाल की जा रही है. इन नन्हें मेहमानों के खानेपीने से लेकर उनकी दिनचर्या तक का ध्यान रखा जा रहा है. अब इन्हें रोजाना करीब एक किलो चिकन खिलाया जा रहा है.

यह मामला कृष्ण विहार कॉलोनी का है. यहां रहने वाले जगदीश कुमार के घर में दिवाली के मद्देनजर साफसफाई की जा रही थी. इसी दौरान मकान के एक पुराने झरोखे में उन्हें उल्लू के छह बच्चे दिखाई दिए. जब उन्होंने ध्यान से देखा तो पता चला कि झरोखे पर जाली लगी हुई थी, जिसके कारण उल्लुओं की मां अपने बच्चों तक नहीं पहुंच पा रही थी. बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जगदीश कुमार ने तुरंत वन विभाग को इसकी सूचना दी. जानकारी मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और सभी छह बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया. इसके बाद उन्हें देखभाल के लिए रेंज कार्यालय ले जाया गया.
बार्न आउल प्रजाति के हैं सभी 6 बच्चे
वन क्षेत्राधिकारी महेश गौतम के मुताबिक, रेस्क्यू किए गए सभी छह उल्लू बार्न आउल प्रजाति के हैं. इनमें चार नर और दो मादा हैं. इनकी उम्र करीब ढाई महीने बताई जा रही है. फिलहाल इन्हें दो पिंजरों में रखा गया है, जहां वन विभाग की टीम उनकी निगरानी कर रही है. वन विभाग के कर्मचारी इनकी सेहत और जरूरतों का विशेष ध्यान रख रहे हैं, ताकि प्राकृतिक वातावरण से दूर रहने के दौरान भी उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो.
शाम होते ही शुरू होता है भोजन का इंतजाम
इन उल्लुओं की दिनचर्या भी काफी अलग है. ये आमतौर पर दिन में आराम करते हैं और अंधेरा होने के बाद भोजन की तलाश में सक्रिय होते हैं. इसी आदत को ध्यान में रखते हुए वन विभाग की टीम इन्हें शाम के समय खाना देती है. शुरुआत में इन छह बच्चों को करीब आधा किलो चिकन दिया गया था. हालांकि उनकी जरूरत को देखते हुए अब भोजन की मात्रा बढ़ाकर प्रतिदिन लगभग एक किलो कर दी गई है. चिकन को छोटेछोटे टुकड़ों में काटकर खिलाया जाता है, ताकि वे आसानी से खा सकें.
पूरी तरह विकसित होने पर प्राकृतिक आवास में छोड़ेंगे
वन विभाग की योजना इन उल्लुओं को हमेशा अपने संरक्षण में रखने की नहीं है. अधिकारियों के मुताबिक, जब सभी बच्चे पूरी तरह विकसित हो जाएंगे और स्वतंत्र रूप से उड़ने के साथ प्राकृतिक वातावरण में अपना जीवन बिताने में सक्षम हो जाएंगे, तब उन्हें उपयुक्त प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाएगा. फिलहाल वन विभाग की टीम उनकी देखभाल में जुटी है.



