पश्चिम एशिया में गहराते संकट और तनाव के कारण एक बार फिर कच्चे तेल की कीमतों में भारी तेजी देखने को मिल रही है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है। हालात यह बन गए हैं कि भारत के लिए कच्चे तेल के आयात की औसत कीमत छह हफ्ते में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है। वैश्विक बाजार में जहां इंटरनेशनल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड अभी 97.33 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है, वहीं भारत के लिए तेल की ‘इंडियन बास्केट’ इससे काफी ऊपर निकल चुकी है। जानकारों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहीं, तो देश में पेट्रोल और डीजल के दाम एक बार फिर बढ़ सकते हैं, जिससे आम जनता की जेब पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ना तय माना जा रहा है।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बीते शुक्रवार को भारत के लिए कच्चे तेल की ‘इंडियन बास्केट’ की औसत कीमत बढ़कर 101.07 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई, जो गत 23 जुलाई के बाद से सबसे अधिक स्तर है। इस बास्केट में स्वीटग्रेड ग्लोबल बेंचमार्क ‘डेटेड ब्रेंट’ के साथसाथ ओमान और दुबई के ‘सौरग्रेड’ बेंचमार्क का औसत शामिल होता है। अगर मासिक औसत पर नजर डालें तो सितंबर महीने में कच्चे तेल की बास्केट की औसत कीमत 99.38 डॉलर प्रति बैरल रही है, जबकि अगस्त के महीने में यह 90.19 डॉलर प्रति बैरल थी। इससे पहले मार्च, अप्रैल और मई के दौरान संघर्ष के चरम पर होने के समय भी यह कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर ही बनी हुई थी।
कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आए इस उछाल के पीछे मुख्य वजह पश्चिम एशिया का तनाव है। रेटिंग एजेंसी ICRA की एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ने के कारण सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली तेल की सप्लाई काफी हद तक सीमित हो गई है। ICRA के सीनियर वाइसप्रेसीडेंट और कॉर्पोरेट रेटिंग्स के कोग्रुप हेड, प्रशांत वशिष्ठ ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट से आगे एक नया प्रतिबंधित समुद्री क्षेत्र बनाने की चेतावनी दी गई है, जिससे वहां से होने वाली अतिरिक्त ऊर्जा आपूर्ति पर एक बड़ा और गंभीर खतरा मंडराने लगा है। इसी भूराजनीतिक उथलपुथल के कारण पिछले कुछ दिनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़े हैं।
कच्चा तेल महंगा होने का सीधा असर देश की तेल विपणन कंपनियों यानी ओएमसी पर पड़ रहा है, क्योंकि क्रूड महंगा होने से उनका नुकसान काफी बढ़ जाता है। एक तेल कंपनी के अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि यदि कीमतें लंबे समय तक इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं और खुदरा ईंधन पंपों पर कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया जाता है, तो इससे कंपनियों का वित्तीय घाटा और गहरा जाएगा। गौरतलब है कि मई महीने में संघर्ष के चरम के दौरान जब कच्चे तेल की इंडियन बास्केट की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई थी, तब देश के तेल रिटेलर्स को रोजाना 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था।
देश के भीतर ईंधन की खुदरा कीमतों की बात करें तो, भारत में पेट्रोल और डीजल के रेट में आखिरी बार संशोधन 25 मई 2026 को किया गया था। वर्तमान में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 102.12 रुपये प्रति लीटर है, जबकि डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बिक रहा है। बीते मई के महीने में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने चार बार पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी की थी। अब एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल के 100 डॉलर के पार जाने से यह आशंका जताई जा रही है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो खुदरा बाजारों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे देश में महंगाई के एक बार फिर तेजी से बढ़ने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।



