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​मासूमों को कैंसर और पल-पल ‘मरता’ परिवार… इलाज के लिए रुला देने वाला पलायन

भारत में बच्चों के कैंसर का इलाज सिर्फ बीमारी से लड़ाई नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए घर से दूर जाने और लंबे समय तक रहने की बड़ी चुनौती भी बन जाता है. हर साल हजारों परिवार अपने गांवों और छोटे शहरों से बच्चों के इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख करते हैं. सेंट जूड्स इंडिया के मुताबिक, सीमित साधनों वाले 32 हजार से ज्यादा परिवार हर साल अपने बच्चे के कैंसर के इलाज के लिए सफर करते हैं. इन परिवारों के सामने अस्पताल तक पहुंचने के साथसाथ सुरक्षित और कम खर्च में रहने की जगह तलाशना भी बड़ी परेशानी होती है.

​मासूमों को कैंसर और पल-पल ‘मरता’ परिवार… इलाज के लिए रुला देने वाला पलायन

सितंबर का महीना बच्चों में कैंसर को लेकर अवेयरनेस बढ़ाने के लिए मनाया जाता है. इसी दौरान बच्चों के कैंसर के इलाज से जुड़ी गैरमेडिकल परेशानियों पर भी ध्यान दिया जा रहा है. सेंट जूड्स इंडिया के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 50 हजार बच्चे कैंसर से प्रभावित होते हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की होती है, जिन्हें इलाज के लिए अपने घर से दूर बड़े शहरों में जाना पड़ता है.

पैसे खत्म होने तक लॉज में रहने की मजबूरी

इलाज के लिए शहर पहुंचे परिवारों के सामने सबसे बड़ी परेशानी अस्पताल के आसपास रहने की होती है. सेंट जूड्स इंडिया के मुताबिक, जो परिवार कुछ खर्च उठा सकते हैं, वे अक्सर सस्ते लॉज या दूसरी जगहों पर तब तक रहते हैं, जब तक उनके पास पैसे बचे रहते हैं. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए स्थिति और मुश्किल हो जाती है. ऐसे परिवारों को कई बार रेलवे स्टेशन या अस्पताल के बाहर फुटपाथ जैसी जगहों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

कैंसर के इलाज के दौरान बच्चों की इम्यूनिटी पहले से कमजोर हो सकती है. ऐसे में साफसफाई की कमी और असुरक्षित रहने की जगह से इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. संस्था के मुताबिक, इन हालात में बच्चों को निमोनिया और टीबी जैसे दूसरे इंफेक्शन का भी सामना करना पड़ सकता है. यानी इलाज अस्पताल में चल रहा होता है, लेकिन रहने की खराब जगह बच्चे की रिकवरी के रास्ते में एक और परेशानी खड़ी कर सकती है.

अस्पताल के पास ‘घर जैसा माहौल’ देने की कोशिश

सेंट जूड्स इंडिया ऐसे बच्चों और उनके परिवारों के लिए बड़े कैंसर अस्पतालों के पास रहने की सुविधा देता है. संस्था का मॉडल सिर्फ रहने की जगह देने तक सीमित नहीं है. यहां परिवारों को साफसुथरी और मुफ्त रहने की सुविधा के साथ ट्रांसपोर्ट में मदद, न्यूट्रिशन से जुड़ी सलाह, काउंसलिंग और बच्चों के लिए एजुकेशन प्रोग्राम भी दिए जाते हैं. इन सेंटर्स में इंफेक्शन से बचाव के लिए भी खास इंतजाम किए जाते हैं. इसका मकसद यह है कि परिवार इलाज के दौरान रहने, खाने और दूसरी बेसिक जरूरतों की चिंता से कुछ हद तक मुक्त होकर बच्चे के इलाज और रिकवरी पर ध्यान दे सकें.

इलाज बीच में छोड़ने की दर में कमी

सेंट जूड्स के मुताबिक, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के अनुमानों में इन सेंटर्स की मदद से बच्चों के कैंसर का इलाज बीच में छोड़ने की दर में बड़ी कमी देखी गई है. संस्था का कहना है कि यह दर पहले करीब 30 फीसदी थी, जो इन सुविधाओं के बाद 5 फीसदी से भी कम रह गई. संस्था के सेंटर्स फिलहाल चेन्नई, दिल्ली, गुवाहाटी, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, नवी मुंबई, मुजफ्फरपुर, बेंगलुरु, वाराणसी, वेल्लोर और विशाखापत्तनम में हैं. इनके जरिए 876 से ज्यादा बच्चों की मदद की जा रही है.

ठीक हो चुके बच्चों के लिए भी मदद

सेंट जूड्स ने कैंसर से ठीक हो चुके बच्चों और युवाओं के लिए भी ‘सेंट जूड्स फॉर लाइफ’ प्रोग्राम शुरू किया है. यह प्रोग्राम नवंबर 2020 में रानी विकाजी की याद में शुरू किया गया था. संस्था के मुताबिक, अब तक 2 हजार से ज्यादा कैंसर सर्वाइवर्स इस प्रोग्राम से जुड़ चुके हैं. बच्चों के कैंसर के इलाज में दवाओं और अस्पताल की भूमिका सबसे अहम है, लेकिन हजारों परिवारों के लिए अस्पताल तक पहुंचना, लंबे समय तक शहर में रहना और बच्चे को सुरक्षित माहौल देना भी इलाज का जरूरी हिस्सा है. ऐसे में इन परिवारों के लिए सुरक्षित और कम खर्च में रहने की सुविधा इलाज जारी रखने और बच्चे की रिकवरी में मदद कर सकती है.

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