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​‘हमारे मजहब के कई लोग हिंदू-देवताओं…’ दशहरा पर सालों से रावण के पुतले बनाता आ रहा ये मुस्लिम परिवार, कह डाली दिल छूने वाली बात

Muslim Family Making Ravan Effigies in Saharanpur: मजहब अलग हो सकते हैं, लेकिन हुनर और मेहनत की कोई जाति या धर्म नहीं होता. सहारनपुर के गांधी पार्क में दशहरे की तैयारियों के बीच यह बात एक मुस्लिम परिवार अपने काम से साबित कर रहा है. मुजफ्फरनगर से सहारनपुर आकर यह परिवार पिछले करीब 18 साल से रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले तैयार कर रहा है. इन पुतलों का दशहरे पर दहन किया जाएगा.

​‘हमारे मजहब के कई लोग हिंदू-देवताओं…’ दशहरा पर सालों से रावण के पुतले बनाता आ रहा ये मुस्लिम परिवार, कह डाली दिल छूने वाली बात

सहारनपुर के गांधी पार्क में इस बार दशहरे के लिए 70 फीट ऊंचा रावण और 6565 फीट ऊंचे कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतले तैयार किए जा रहे हैं. इन्हें तैयार करने वाले कोई और नहीं बल्कि मुस्लिम कारीगर हैं. मुजफ्फरनगर के रहने वाले मुस्लिम कारीगर इंतजार और पप्पू उर्फ रियासत अपने परिवार के साथ इन पुतलों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं.

18 सालों पुतले तैयार कर रहा परिवार

ये परिवार पिछले 18 सालों से रावण के पुतले तैयार कर रहा है. इसके अलावा इनके द्वारा कांवड़ भी बनाई जाती है. इंतजार और रियासत के मुताबिक, इस बार पुतले तैयार करने में नए तरह के कागज का इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे पुतलों का आकर्षण बढ़ने के साथ बारिश के पानी से होने वाले नुकसान को भी कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है.

दशहरे से करीब 20 दिन पहले ही परिवार के सदस्य मुजफ्फरनगर से सहारनपुर पहुंच जाते हैं. इसके बाद गांधी पार्क में पुतले बनाने का काम शुरू होता है. बांस, कागज और दूसरे सामान की मदद से विशालकाय पुतलों को आकार देने में कई दिन की मेहनत लगती है. हर हिस्से को सावधानी से तैयार किया जाता है, ताकि दशहरे के दिन पुतले मैदान में आकर्षण का केंद्र बन सकें.

परिवार के लिए आजीविका का साधन

इंतजार और रियासत बताते हैं कि उनका परिवार लंबे समय से इस काम से जुड़ा है. सहारनपुर के अलावा परिवार के दूसरे सदस्य पंजाब, हरियाणा, मुजफ्फरनगर और रामपुर समेत अलगअलग स्थानों पर जाकर भी हिंदू देवी देवताओं के पुतले तैयार करते हैं. परिवार के लिए यह केवल एक काम नहीं, बल्कि आजीविका का साधन है.

कारीगरों के मुताबिक, उनके समाज के करीब 80 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में इस काम से अपनी रोजीरोटी चलाते हैं. दशहरे के दौरान रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने के अलावा वे दूसरे धार्मिक आयोजनों में भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं. कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़ तैयार करने से लेकर शोभायात्राओं और झांकियों को सजाने आतिशबाजी और फूलों की बारिश तक का काम वे करते हैं.

मजहब के आधार पर कोई परेशानी महसूस नहीं हुई

इंतजार और रियासत का कहना है कि उन्हें इस काम में कभी मजहब के आधार पर कोई परेशानी महसूस नहीं हुई. उनके लिए सभी लोग एकदूसरे से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं. हिंदू परिवारों के धार्मिक आयोजनों में पुतले तैयार करना उनके काम का हिस्सा है और इससे उन्हें रोजगार भी मिलता है. कारीगरों का कहना है कि समाज में हिंदूमुस्लिम के नाम पर बहस करने वालों का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन उनके लिए सबसे जरूरी अपना काम ईमानदारी से करना और परिवार का पालनपोषण करना है.

वे कहते हैं कि लोग मिलजुलकर रहें और एकदूसरे के काम का सम्मान करें, यही सबसे अहम बात है. उनके मुताबिक, पुतले बनाने का काम उन्हें आर्थिक सहारा देने के साथ मन का सुकून भी देता है. जब वे अपनी मेहनत से तैयार किए गए पुतलों को दशहरे के आयोजन में देखते हैं, तो उन्हें अपने हुनर पर गर्व महसूस होता है. दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है.

रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन

इस पर्व पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है. सहारनपुर में इन पुतलों को तैयार करने वाला मुस्लिम परिवार बताता है कि त्योहारों की रौनक बढ़ाने में अलगअलग समुदायों के लोग अपनी भूमिका निभाते हैं. गांधी पार्क में तैयार हो रहे विशालकाय पुतले इस बात की भी याद दिलाते हैं कि समाज की रोजमर्रा की जिंदगी एकदूसरे के सहयोग से चलती है.

कोई पुतले बनाता है, कोई आयोजन करता है और कोई उसे देखने पहुंचता है. इन सभी की भागीदारी से ही त्योहार पूरे होते हैं. इंतजार और रियासत जैसे कारीगरों के लिए पुतले बनाना उनका पुश्तैनी हुनर और रोजीरोटी का जरिया है. लेकिन उनके काम का संदेश इससे आगे जाता है. उनका मानना है कि इंसान की पहचान उसके काम और व्यवहार से होनी चाहिए, न कि उसके मजहब से. सहारनपुर में पिछले करीब 18 साल से चली आ रही यह परंपरा आपसी भाईचारे और मिलजुलकर रहने की एक मिसाल पेश कर रही है.

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