
न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान भारत समेत सात देशों और यूरोपीय संघ ने ‘पार्टनर्स फॉर मल्टीलेटरलिज्म’ पहल की शुरुआत की है। न्यूयॉर्क में आयोजित पहले P4M शिखर सम्मेलन में बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर दिया गया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस सम्मेलन की सहअध्यक्षता की।
P4M के शुरुआती सहप्रायोजकों में भारत, ऑस्ट्रेलिया, बारबाडोस, ब्राजील, कनाडा, केन्या और यूरोपीय संघ शामिल हैं। यह बैठक संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के उच्चस्तरीय सप्ताह से इतर आयोजित की गई।
क्या है P4M पहल का उद्देश्य?
P4M का मकसद अलगअलग क्षेत्रों और महाद्वीपों के देशों को एक मंच पर लाकर बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करना है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान, वैश्विक शांति और समावेशी समृद्धि को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणा में कहा गया कि दुनिया इस समय बड़े बदलावों से गुजर रही है। बढ़ते ध्रुवीकरण, संघर्षों के विस्तार, अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन, संरक्षणवाद, दबाव की राजनीति और बल प्रयोग की धमकियों को वैश्विक शांति एवं सुरक्षा के लिए चुनौती बताया गया।
आज की दुनिया के मुताबिक बहुपक्षीय व्यवस्था में बदलाव की जरूरत
P4M घोषणा में कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था आज भी जरूरी है, लेकिन इसे वर्तमान की अधिक जटिल, परस्पर जुड़ी और बहुध्रुवीय दुनिया के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है।
घोषणा में बहुपक्षीय संस्थाओं को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण और समावेशी बनाने के लिए सुधारों पर जोर दिया गया। साथ ही वैश्विक संस्थाओं में अधिक देशों की भागीदारी और निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत रेखांकित की गई।
जयशंकर बोले वैश्विक व्यवस्था दबाव में
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था दबाव के दौर से गुजर रही है और ऐसे समय में बहुपक्षवाद की भूमिका और मजबूत होनी चाहिए। उन्होंने अधिक सहभागी विचारविमर्श और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया।
जयशंकर ने ईंधन, खाद्य, उर्वरक और वित्त से जुड़ी वैश्विक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने उभरती प्रौद्योगिकियों से पैदा होने वाले जोखिमों से निपटने के लिए नए ढांचे और सुरक्षा उपाय विकसित करने की जरूरत बताई।
सप्लाई चेन में विविधता पर भी जोर
विदेश मंत्री ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि किसी एक महत्वपूर्ण मार्ग या क्षेत्र में व्यवधान आने की स्थिति में उसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अधिक न पड़े, इसके लिए सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और विविध बनाना जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभु समानता की प्रतिबद्धता
P4M की संयुक्त घोषणा में अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई।
घोषणा में बल प्रयोग या बल प्रयोग की धमकी पर रोक के साथ अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकारों के सम्मान की बात भी कही गई।
AI से जलवायु तक, कई मुद्दों पर सहयोग
P4M घोषणा में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी, प्रदूषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल बदलाव, वैश्विक स्वास्थ्य और विकास वित्त जैसे मुद्दों पर व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत बताई गई।
इसके साथ ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत एवं विविध बनाने तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
संयुक्त राष्ट्र सुधार को बनाया अहम मुद्दा
P4M पहल में संयुक्त राष्ट्र के सुधार को भी प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। सहप्रायोजक देशों ने संयुक्त राष्ट्र समेत बहुपक्षीय संस्थाओं को मजबूत करने और उन्हें मौजूदा वैश्विक चुनौतियों से निपटने में अधिक सक्षम बनाने के लिए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई।
घोषणा में यूएन80 जैसी पहलों के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र में सुधार का समर्थन किया गया है।
एंटोनियो कोस्टा बोले कोई देश अकेले नहीं सुलझा सकता वैश्विक चुनौतियां
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने सम्मेलन के बाद कहा कि अलगअलग महाद्वीपों और पृष्ठभूमि वाले देशों के बीच इस बात को लेकर साझा समझ है कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों का समाधान कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि P4M साझा सिद्धांतों को ठोस कार्रवाई में बदलने के लिए एक मंच की भूमिका निभाएगा।
दूसरे देशों के लिए भी खुला रहेगा P4M
P4M के सहप्रायोजकों ने इस पहल को दुनिया के अन्य क्षेत्रों के देशों के लिए भी खुला रखने की बात कही है। वरिष्ठ अधिकारियों के बीच समन्वय के लिए एक तंत्र बनाने और सहयोग के प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान करने पर भी सहमति बनी है।
भारत की P4M में भागीदारी ऐसे समय हुई है, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार, वैश्विक शांति, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन, उभरती प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े विषय चर्चा के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।
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