Savings Account Interest: सेविंग्स अकाउंट में पैसे रखने पर बैंक आपको ब्याज देते हैं. आप में से कई लोगों के पास सेविंग्स अकाउंट होगा, लेकिन बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि उनके खाते में ब्याज कब जुड़ रहा है. मान लिजिए कि आप अपने किसी ऐसे दोस्त के साथ बैठे हैं जिसे फाइनेंस की अच्छी समझ है. आप दोनों अपने खर्चों की तुलना कर रहे हैं और अचानक अपनी बैंकिंग ऐप खोल लेते हैं. तब तक आपको पता भी नहीं था कि आपके सेविंग्स अकाउंट में ब्याज कब जुड़ता है. अचानक आपको पता चलता है कि आप दोनों के बैंक अलगअलग तरीके से ब्याज दे रहे हैं.

आपके दोस्त के बैंक अकाउंट में हर महीने ब्याज क्रेडिट होता है, जबकि आपके अकाउंट में हर तीन महीने में. शुरुआत में ये कोई बड़ी बात नहीं लगती. लेकिन जब आप हिसाब लगाते हैं, तो पता चलता है कि समान बैलेंस होने के बावजूद आपके दोस्त को ज्यादा पैसा मिल रहा है. खाते में रखा पैसा ब्याज कमाता है. ये जानना बहुत जरूरी है कि ये ब्याज आपके बैलेंस में कितनी बार जुड़ता है. ऐसा इसलिए क्योंकि ब्याज आपके बैलेंस में जुड़कर समय के साथ कंपाउंड होता है.
मंथली बनाम तिमाही ब्याज.. समझिए दोनों के बीच का अंतर
ज्यादातर बैंक सेविंग्स अकाउंट पर तिमाही आधार पर ब्याज क्रेडिट करते हैं. इसके अलावा कुछ ऐसे भी बैंक हैं जो हर महीने ब्याज देते हैं. मंथली ब्याज क्रेडिट का सीधा सा मतलब है कि आपने एक महीने में सेविंग्स अकाउंट पर जो ब्याज कमाया, वो उसी महीने आपके अकाउंट में जुड़ जाएगा. इसलिए, हर महीने आपको अपने अकाउंट में पिछले महीने के मुकाबले थोड़ा ज्यादा पैसा दिखाई देगा.
कंपाउंडिंग का फॉर्मूला कैसे करता है काम
ओलिव के कोफाउंडर व सीईओ रोहित गर्ग के मुताबिक, ब्याज दर हमेशा रिटर्न तय करने का सबसे बड़ा कारण होती है. लेकिन ब्याज कितनी जल्दी क्रेडिट हो रहा है, ये तय करता है कि उस रिटर्न पर कितनी जल्दी नया ब्याज मिलना शुरू होगा.
जब ब्याज जल्दीजल्दी क्रेडिट होता है, तो कमाए गए ब्याज पर भी आपको जल्दी ब्याज मिलने लगता है. बजाज कैपिटल के हेड ऑफ रिसर्च सौविक बिस्वास बताते हैं कि यही कंपाउंडिंग का असली फायदा है. अगर आपके सेविंग्स अकाउंट में हर महीने ब्याज क्रेडिट होता है, तो आपकी कमाई गई रकम आपके मूलधन में जुड़ जाती है. इसके बाद आपको उस बढ़े हुए अमाउंट पर ब्याज मिलता है. आसान भाषा में कहें तो तिमाही के मुकाबले मंथली पेमेंट में आप ब्याज पर ब्याज जल्दी कमाना शुरू कर देते हैं.
ब्याज क्रेडिट होने के तरीके से कितना पड़ता है फर्क
अगर दोनों बैंकों की ब्याज दर समान है, तो तिमाही के मुकाबले मंथली क्रेडिट में आपको थोड़ा ज्यादा फायदा होता है. छोटे समय में ये अंतर बहुत कम लग सकता है. लेकिन अगर आप लंबे समय तक बड़ा बैलेंस मेंटेन करते हैं, तो ये छोटा सा फायदा भी एक अच्छी रकम बन जाता है.
इसे एक उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए दो दोस्तों ने अपने बैंक अकाउंट में 3 लाख रुपये रखे हैं. एक बैंक हर महीने ब्याज देता है व दूसरा बैंक हर तीन महीने में. दोनों अकाउंट पर 3% सालाना ब्याज मिल रहा है. तीन साल बाद, मंथली क्रेडिट वाले अकाउंट में 3,28,251 रुपये होंगे. वहीं तिमाही क्रेडिट वाले अकाउंट में 3,28,142 रुपये होंगे. यहां 109 रुपये का अंतर है.
अगर ब्याज दर 4% हो, तो 3 लाख रुपये का बैलेंस तीन साल बाद मंथली कंपाउंडिंग से 3,38,181 रुपये हो जाएगा. जबकि तिमाही में ये 3,38,047 रुपये होगा. यानी बिना कुछ एक्स्ट्रा किए सिर्फ मंथली क्रेडिट वाले अकाउंट से आपको 134 रुपये ज्यादा मिलेंगे. लेकिन अगर ब्याज दर में 1% का भी अंतर हो, तो इसका असर बहुत बड़ा होता है. सिर्फ पहले साल में ही आपको लगभग 3,000 रुपये ज्यादा मिल सकते हैं. बंधन बैंक,आईडीएफसी फर्स्ट बैंक,आरबीएल बैंक,उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक,उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक,जन स्मॉल फाइनेंस बैंक मंथली क्रेडिट के साथ 7% तक ब्याज देते हैं.


