
स्वस्थ रहने के लिए संतुलित आहार को हमेशा महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन भोजन का स्वास्थ्य पर प्रभाव केवल इस बात से तय नहीं होता कि थाली में क्या रखा गया है। आयुर्वेद में भोजन की मात्रा, समय, प्रकृति और उसे खाने के क्रम को भी विशेष महत्व दिया गया है। यानी स्वस्थ आहार का अर्थ केवल सही खाद्य पदार्थ चुनना नहीं, बल्कि उन्हें सही तरीके से ग्रहण करना भी है। आज सामान्य तौर पर भोजन की शुरुआत नमकीन या मुख्य भोजन से और अंत मिठाई से करने की परंपरा है। हालांकि आयुर्वेदिक आहारविचार में भोजन के रसों के क्रम को लेकर अलग दृष्टिकोण मिलता है। इसमें भोजन के आरंभ में मधुर रस, मध्य में अम्ल और लवण रस तथा अंत की ओर कटु, तिक्त और कषाय रस लेने का वर्णन मिलता है।
जठराग्नि और भोजन का संबंध
आयुर्वेद में पाचनशक्ति को जठराग्नि कहा गया है और इसे स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। व्यक्ति द्वारा खाया गया भोजन तभी शरीर के लिए उपयोगी बनता है, जब उसका उचित पाचन हो।
भोजन की शुरुआत में जठराग्नि अपेक्षाकृत सक्रिय मानी जाती है। मधुर रस को सामान्यतः गुरु यानी अपेक्षाकृत भारी माना गया है। इसलिए पारंपरिक आहारविचार में इसे भोजन के प्रारंभिक भाग में लेने का उल्लेख मिलता है। इसका उद्देश्य अधिक मात्रा में मिठाई खाना नहीं, बल्कि भोजन के गुण और क्रम को समझना है।
मिठाई अंत में ही क्यों
मिष्ठान भारतीय भोजन और उत्सवों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सामान्यतः मिठाई भोजन के बाद खाई जाती है, लेकिन यदि व्यक्ति पहले ही पर्याप्त मात्रा में भोजन कर चुका हो और उसके बाद बड़ी मात्रा में मिठाई ले, तो भोजन की कुल मात्रा काफी बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में पेट भारी लगना, असहजता या भोजन के बाद सुस्ती महसूस होना संभव है। इसलिए आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से भोजन के अंत में भारी मिष्ठान लेने की आदत पर विचार किया जा सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति को भोजन से पहले मिठाई खानी चाहिए। मात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति मिष्ठान लेना चाहता है, तो सीमित मात्रा में इसे भोजन के आरंभिक हिस्से में लेने की पारंपरिक अवधारणा को समझा जा सकता है।
छह रसों से संतुलित भोजन
आयुर्वेद में भोजन के छह रस बताए गए हैं मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय। भारतीय भोजन में इन रसों के अनेक स्रोत आसानी से मिल जाते हैं।
मधुर रस अनाज, दूध और कुछ फलों में पाया जाता है। नींबू और अन्य खट्टे पदार्थ अम्ल रस के स्रोत हैं, जबकि नमक लवण रस प्रदान करता है। अदरक और काली मिर्च जैसे पदार्थ कटु, करेला जैसे खाद्य पदार्थ तिक्त तथा कुछ कसैले पदार्थ कषाय रस के उदाहरण माने जाते हैं। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में इन रसों का संतुलित उपयोग भोजन को विविध और संतुलित बनाने की दिशा में देखा जाता है। हालांकि आधुनिक पोषण की दृष्टि से भी भोजन की मात्रा और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक है।
भोजन के मध्य में अम्ललवण रस
भोजन के मध्य में अम्ल और लवण रस लेने का उल्लेख आयुर्वेदिक आहारविचार में मिलता है। भारतीय भोजन में दही, नींबू, चटनी और नमक इसके सामान्य उदाहरण हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भोजन में नमक या खटाई की मात्रा बढ़ा दी जाए। अत्यधिक नमक और बहुत अधिक खट्टे पदार्थ किसी व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते। इसलिए आयुर्वेदिक सिद्धांतों को अपनाते समय व्यक्ति की प्रकृति, आवश्यकता और स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान रखना जरूरी है।
अंत में भोजन को रखें हल्का
भोजन के अंतिम भाग में कटु, तिक्त और कषाय रसों का वर्णन मिलता है। आज की जीवनशैली में इसके विपरीत भोजन के बाद मिठाई, आईसक्रीम या अन्य भारी खाद्य पदार्थ लेना आम है।
भोजन के बाद यदि व्यक्ति पहले ही पर्याप्त मात्रा में भोजन कर चुका है, तो उसके ऊपर अधिक मात्रा में भारी मिष्ठान लेना पाचन पर अतिरिक्त भार डाल सकता है। इसलिए भोजन के अंतिम हिस्से को अपेक्षाकृत हल्का रखने की आदत उपयोगी हो सकती है।
व्यक्ति की प्रकृति और अनुकूलता के अनुसार छाछ जैसे विकल्प भी भोजन के बाद लिए जा सकते हैं। हालांकि हर व्यक्ति के लिए एक ही खाद्य पदार्थ समान रूप से उपयुक्त हो, यह आवश्यक नहीं है।
मधुमेह और अन्य रोगों में सावधानी
मधुमेह, मोटापा, पाचन संबंधी रोग या अन्य चिकित्सकीय स्थितियों से जूझ रहे लोगों को भोजन में मिष्ठान और चीनी की मात्रा को लेकर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
मधुर रस को भोजन के आरंभ में लेने की पारंपरिक अवधारणा का अर्थ यह नहीं है कि मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति मिठाई का सेवन बढ़ा दें। ऐसे मामलों में आहार व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, दवाओं, शारीरिक गतिविधि और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार निर्धारित होना चाहिए।
आयुर्वेद भोजन को केवल पेट भरने का माध्यम नहीं मानता, बल्कि उसे स्वास्थ्य और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। इसलिए भोजन में क्या खाया जाए, कितना खाया जाए, कब खाया जाए और किस क्रम में खाया जाए, इन सभी बातों पर ध्यान देना जरूरी है।
भोजन के आरंभ में मधुर, मध्य में अम्ललवण और अंत की ओर कटु, तिक्त व कषाय रस लेने का पारंपरिक वर्णन इसी व्यापक आहारदृष्टि का हिस्सा है। इसका उद्देश्य मिठाई का अधिक सेवन करना नहीं, बल्कि भोजन के क्रम और मात्रा के महत्व को समझना है।
भोजन वही हो सकता है, लेकिन उसे खाने का तरीका और क्रम अलग हो, तो अनुभव भी अलग हो सकता है। यही आयुर्वेद की आहार संबंधी समग्र सोच का सार है।
केवल क्रम नहीं, मात्रा भी जरूरी
आयुर्वेद में भोजन की मात्रा को भी विशेष महत्व दिया गया है। यदि कोई व्यक्ति भोजन का क्रम तो सही रखता है, लेकिन आवश्यकता से अधिक खाता है, तो केवल क्रम से भोजन संतुलित नहीं हो जाता। भोजन उतना ही होना चाहिए, जितना व्यक्ति की पाचनशक्ति और आवश्यकता के अनुरूप हो। भूख न होने पर केवल स्वाद या आदत के कारण खाना और लंबे समय तक भूखे रहने के बाद एक साथ बहुत अधिक खानादोनों ही आदतें भोजन को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए भोजन करते समय भूख, संतुष्टि और पाचनक्षमता पर ध्यान देना आवश्यक है।
बदलती जीवनशैली में प्रासंगिक है आयुर्वेद
आज व्यस्त दिनचर्या के कारण भोजन करने का तरीका भी बदल गया है। कई लोग मोबाइल देखते हुए, काम करते हुए या जल्दबाजी में भोजन करते हैं। कई बार भोजन का समय भी निश्चित नहीं रहता। ऐसे में आयुर्वेद का आहारविचार हमें भोजन के प्रति जागरूक रहने का संदेश देता है। शांत वातावरण में, पर्याप्त समय लेकर, भोजन को अच्छी तरह चबाकर और अपनी भूख के अनुसार खाना अधिक उपयोगी आदत हो सकती है। आयुर्वेद का मूल संदेश यह है कि भोजन को केवल स्वाद की दृष्टि से नहीं, बल्कि शरीर की आवश्यकता और पाचनक्षमता को ध्यान में रखकर ग्रहण किया जाए।
रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय, बरेली द्वारा आयुर्वेद के सिद्धांतों को जनसामान्य तक पहुंचाने के साथसाथ स्वस्थ जीवनशैली और संतुलित आहार के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है। संस्थान के चिकित्सकों द्वारा परामर्श के दौरान व्यक्ति की प्रकृति, पाचनशक्ति और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार आहारविहार संबंधी उचित सलाह दी जाती है। संस्थान का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि स्वस्थ रहने के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं, बल्कि सही आहार और दिनचर्या भी महत्वपूर्ण है। विशेष स्वास्थ्य स्थितियों में चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार व्यक्तिगत आहार योजना अपनाने के लिए भी लोगों को प्रेरित किया जाता है।
रोहिलखंड आयुर्वेदिक कॉलेज एवं चिकित्सालय सेक्टर 7, डोहरा रोड, बरेली 8077808309
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