20 मिडकैप म्यूचुअल फंड. 20 मल्टीबैगर. पिछले दशक में, पूरे 10 साल का ट्रैक रिकॉर्ड रखने वाले फंड्स में सबसे खराब परफॉर्मेंस वाली स्कीम ने भी लगभग 238 फीसदी का एब्सोल्यूट रिटर्न दिया है, जबकि सबसे अच्छी स्कीम में 426 फीसदी की बढ़त देखने को मिली है. इस कैटेगरी का औसत 324 फीसदी है, जिससे निवेश किया गया हर 1 लाख रुपया औसतन 4 लाख रुपए से ज़्यादा हो गया है और मिडकैप्स इक्विटी मार्केट में वेल्थ बनाने वाले सबसे भरोसेमंद सेक्टर में से एक बन गए हैं.

426% रिटर्न के साथ ‘इनवेस्को इंडिया मिडकैप फंड’ सबसे ऊपर है, इसके बाद ‘एडेलवाइस मिडकैप फंड’ और ‘निप्पॉन इंडिया ग्रोथ मिडकैप फंड’ का नंबर आता है. 20 में से नौ स्कीम ने 350% से ज्यादा रिटर्न दिया है, जबकि 11 ने 300 फीसदी से ज्यादा रिटर्न दिया है. दूसरी ओर, 10 साल के ग्रुप में सबसे खराब परफॉर्मेंस वाला ‘आदित्य बिड़ला सन लाइफ मिडकैप फंड’ भी 238 फीसदी ऊपर है.
‘एसबीआई मिडकैप फंड’ ने 247 फीसदी, ‘यूटीआई मिड कैप फंड’ ने 250 फीसदी और ‘डीएसपी मिडकैप फंड’ ने 255 फीसदी रिटर्न दिया. 10 साल में 238 फीसदी का एब्सोल्यूट रिटर्न सालाना लगभग 13 फीसदी के बराबर है, जबकि 426 फीसदी का रिटर्न लगभग 18 फीसदी के बराबर है. 324 फीसदी का कैटेगरी औसत सालाना लगभग 15.5 फीसदी के बराबर है. सालाना आधार पर यह अंतर बहुत बड़ा नहीं लग सकता है, लेकिन एक दशक में यह फाइनल वेल्थ में काफी बड़ा अंतर पैदा करता है: सबसे खराब स्कीम में 1 लाख रुपए बढ़कर लगभग 3.38 लाख रुपये हो गए होंगे और सबसे अच्छी स्कीम में 5.26 लाख रुपए.
यह अंतर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि ऐसी कौन सी बात है जिसने इस कैटेगरी को इतना दमदार बना दिया कि इसमें सबसे खराब परफॉर्मेंस वाली स्कीम ने भी निवेशकों के पैसे को तीन गुना से ज्यादा कर दिया? फाइंडोक ग्रुप के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर हेमंत सूद ईटी की रिपोर्ट में मिडकैप कैटेगरी की इस परफॉर्मेंस का श्रेय तीन मुख्य वजहों को देते हैं: अर्निंग्स में ग्रोथ, वैल्यूएशन रीरेटिंग और निवेशकों का लगातार निवेश.
बीते 10 साल में 20 मिडकैप फंड्स बने मल्टीबैगर
| मिडकैप फंड | 10 साल का रिटर्न | एक लाख निवेश कितना हुआ |
| इनवेस्को इंडिया मिडकैप फंड | 426% | 5.26 लाख |
| एडलवाइस मिड कैप फंड | 409% | 5.09 लाख |
| निप्पॉन इंडिया ग्रोथ मिड कैप फंड | 403% | 5.03 लाख |
| क्वांट मिड कैप फंड | 375% | 4.75 लाख |
| एचएसबीसी मिडकैप फंड | 373% | 4.73 लाख |
| कोटक मिड कैप फंड | 369% | 4.69 लाख |
| एचडीएफसी मिड कैप फंड | 369% | 4.69 लाख |
| एक्सिस मिडकैप फंड | 357% | 4.57 लाख |
| आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल मिड कैप फंड | 350% | 4.50 लाख |
| मोतीलाल ओसवाल मिडकैप फंड | 350% | 4.50 लाख |
| टाटा मिड कैप फंड | 321% | 4.21 लाख |
| पीजीआईएम इंडिया मिडकैप फंड | 296% | 3.96 लाख |
| बड़ौदा बीएनपी पारिबा मिड कैप फंड | 295% | 3.95 लाख |
| टॉरस मिड कैप फंड | 271% | 3.71 लाख |
| सुंदरम मिड कैप फंड | 270% | 3.70 लाख |
| फ्रैंकलिन इंडिया मिड कैप फंड | 259% | 3.59 लाख |
| डीएसपी मिडकैप फंड | 255% | 3.55 लाख |
| यूटीआई मिड कैप फंड | 250% | 3.50 लाख |
| एसबीआई मिडकैप फंड | 247% | 3.47 लाख |
| आदित्य बिड़ला सन लाइफ मिडकैप फंड | 238% | 3.38 लाख |
क्यों और कैसे मिला फायदा
मिडकैप्स भारत की कॉर्पोरेट लाइफसाइकिल के एक बहुत ही फायदेमंद हिस्से में आते हैं. इस सेगमेंट की कई कंपनियां पहले ही ऐसे लेवल पर पहुंच चुकी हैं जहां उनका बिजनेस छोटी कंपनियों की तुलना में ज्यादा मजबूत है, साथ ही उनके पास बड़ी और स्थापित कंपनियों की तुलना में ग्रोथ की काफी ज्यादा गुंजाइश भी है. सूद ने कहा कि पिछले दशक में इस सेगमेंट को इकोनॉमी के फॉर्मलाइजेशन, कैपेक्स और मैन्युफैक्चरिंग साइकल, प्रोडक्शनलिंक्ड इंसेंटिव वाले सेक्टर और कैपेसिटी यूटिलाइजेशन बेहतर होने से ऑपरेटिंग लेवरेज का फायदा मिला. लेकिन कमाई सिर्फ एक पहलू था. बढ़ती वैल्यूएशन ने भी रिटर्न को बढ़ाया, यानी इन्वेस्टर्स मिडकैप कंपनियों की हर एक रुपए की कमाई के लिए ज्यादा पैसे देने लगे.
इन सबसे भी होता है फायदा
बजाज कैपिटल में रिसर्च हेड सौविक बिस्वास भी इसी तरह के स्ट्रक्चरल फायदे को देखते हैं. मिडकैप कंपनियां पहले ही काफी बड़ी हो चुकी हैं और लगातार बढ़ भी रही हैं, जिससे इस सेगमेंट को मजबूत अर्निंग्स मोमेंटम बनाने में मदद मिलती है. स्मॉलकैप कैटेगरी से तेजी से बढ़ने वाली कंपनियों के समयसमय पर इसमें शामिल होने से नए मौके भी लगातार मिलते रहते हैं.
यह कॉम्बिनेशन ग्रोथ और क्वालिटी से लेकर मोमेंटम, वैल्यू और कॉन्ट्रा स्ट्रैटेजी जैसे कई तरीकों को अपनाने वाले इन्वेस्टर्स को आकर्षित करता है, जिससे लिक्विडिटी और इन्वेस्टर्स की दिलचस्पी बनी रहती है. बिस्वास ने कहा कि इस सेगमेंट में बहुत ज़्यादा रिटर्न की संभावना बनी हुई है, जिसकी मुख्य वजह अर्निंग्स में ग्रोथ और उसके साथ आने वाली लिक्विडिटी और इन्वेस्टर्स की दिलचस्पी है.
ZFunds के कोफ़ाउंडर और CEO मनीष कोठारी का ईटी की रिपोर्ट में कहना है कि मिडकैप्स असल में इन्वेस्टर्स को “दोनों दुनिया का सबसे अच्छा” अनुभव देते हैं जिसमें बड़ी कंपनियों जैसी ऑपरेटिंग मजबूती और छोटी कंपनियों जैसी तेजी से बढ़ने की क्षमता शामिल हे. यह सेगमेंट कमाई में बढ़ोतरी और वैल्यूएशन रीरेटिंग, दोनों के जरिए बढ़ रहा है, जबकि मिडकैप कैटेगरी में नईनई कंपनियां आने से निवेश के और मौके बन रहे हैं.
क्या ऐसी कामयाबी दोहरा पाएगा ये फंड?
लेकिन यही कामयाबी अगले दशक के लिए सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा कर रही है: क्या मिडकैप इसे दोहरा पाएंगे? जानकारों का जवाब, पिछले समय के रिटर्न डेटा से जो दिखता है, उससे कहीं ज्यादा बारीकियों वाला है. सूद सलाह देते हैं कि पिछले दशक के 15.5 फीसदी सालाना कैटेगरी रिटर्न को ही भविष्य का पैमाना न माना जाए. चूंकि वैल्यूएशन पहले से ही हाई हैं, इसलिए रीरेटिंग वाला हिस्सा, जिसने पहले के रिटर्न को बढ़ाया था, उसे दोहराना मुश्किल हो सकता है.
जैसेजैसे एसेट्स अंडर मैनेजमेंट बढ़ते हैं, बड़े मिडकैप फंड्स के लिए कीमतों पर असर डाले बिना पोजीशन में एंट्री और एग्जिट करना भी मुश्किल होता जाता है. उनका मानना है कि भविष्य में रिटर्न असल कमाई में बढ़ोतरी के आसपास ही रहेंगे, और सबसे अच्छी और सबसे खराब स्कीम के बीच का अंतर और बढ़ेगा.
फाइनेंशियल प्लानिंग के लिए, वे ऐतिहासिक दर को ही आगे बढ़ाने के बजाय 10 फीसदी12 फीसदी सालाना रिटर्न का अनुमान लगाना ज्यादा समझदारी भरा मानते हैं. बिस्वास भी वैल्यूएशन और उतारचढ़ाव को दो मुख्य जोखिम मानते हैं. मिडकैप आम तौर पर हाई वैल्यूएशन पर ट्रेड करते हैं, जिससे वैल्यूएशन रिस्क इस सेगमेंट की एक खास बात बन जाती है, साथ ही निवेशकों को ज़्यादा उतारचढ़ाव के लिए भी तैयार रहना चाहिए.



