India

​पावरफुल PM की तानाशाही, डर और अकेलेपन की कहानी…लेखिका नीरजा चौधरी की जुबानी

Indira Gandhi Death Anniversary: इंदिरा गांधी की कहानी सिर्फ सत्ता की कहानी नहीं है. यह साहस की भी कहानी है, डर की भी और अकेलेपन की भी. इतिहास की तारीखों में उन्हें पढ़ना आसान है, पर एक इंसान के तौर पर समझना मुश्किल. TV9 के विशेष पॉडकास्ट प्रोग्राम में आशीष पांडे के साथ वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका नीरजा चौधरी ने कई दिलचस्प बातें साझा कीं. बतौर पत्रकार उन्होंने इंदिरा गांधी के दौर को करीब से कवर किया है और राजनीति पर लिखी अपनी किताब में उनके कई अनछुए किस्से दर्ज किए हैं. 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के मौके पर पढ़ें दिलचस्प किस्से.

​पावरफुल PM की तानाशाही, डर और अकेलेपन की कहानी…लेखिका नीरजा चौधरी की जुबानी

नीरजा चौधरी कहती हैं कि अब तक के प्रधानमंत्रियों में उन्हें सबसे दिलचस्प इंदिरा गांधी लगीं. इसकी एक वजह यह थी कि वे महिला थीं, लेकिन सिर्फ इतनी ही नहीं. उनकी शख्सियत में बड़े सकारात्मक पहलू भी थे और बड़े नकारात्मक भी. नीरजा के मुताबिक उनमें सत्ता के लिए सत्ता को समझने की गहरी क्षमता थी. उनके पिता के जमाने में राजनीति की जो लक्ष्मण रेखाएं तय थीं, वे इंदिरा के दौर में बदल गईं. क्या सही है और क्या गलत, इसका नैतिक पैमाना भी बदल गया. इसके साथ साहस भी था.

उदाहरण से समझें

नीरजा बांग्लादेश का उदाहरण देती हैं, जहां सही वक्त पर लिए गए फैसलों ने पूरे भूगोल और भूराजनीति को बदल दिया. उनके हिसाब से इंदिरा के प्रधानमंत्रित्व के सबसे बड़े योगदान ये रहे बांग्लादेश का गठन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति, “गरीबी हटाओ” की तरफ देश का ध्यान ले जाना, पार्टी पर अपना नियंत्रण कायम करना.

यह वही नेता थीं जिन्हें शुरू में “गूंगी गुड़िया” कहा गया था. मोरारजी देसाई ने उन्हें “छोकरी” कहा था और किसी को यकीन नहीं था कि वे इतनी जल्दी पूरी पार्टी पर काबू पा लेंगी.

इंदिरा और फिरोज गांधी.

तीन चेहरे, एक शख्सियत

इंदिरा के तीन रूप अक्सर गिनाए जाते हैं नेहरू की बेटी, ताकतवर प्रधानमंत्री और चुनाव हारने के बाद अकेलेपन और डर से जूझती इंदिरा. ये तीनों एक ही शख्सियत के स्वरूप थे. बचपन आनंद भवन में बीता, जो आज़ादी के आंदोलन का केंद्र था. महात्मा गांधी का आनाजाना लगा रहता था और घर में पता नहीं होता था कि कब कौन गिरफ्तार हो जाएगा. नीरजा बताती हैं कि 1929 में जब नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने और संपूर्ण स्वराज का प्रस्ताव तैयार हुआ, तो उन्होंने रात को 1112 साल की इंदिरा को बुलाकर उसे ठहरठहरकर पढ़ने को कहा. इस तरह वे संपूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पढ़ने वाली शायद पहली इंसान बनीं.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा के हवाले से नीरजा पांच लोगों का नाम लेती हैं जिन्होंने इंदिरा को सबसे ज्यादा प्रभावित किया पिता जवाहरलाल नेहरू, पति फिरोज गांधी, प्रधान सचिव पी.एन. हक्सर, जयप्रकाश नारायण और छोटे बेटे संजय गांधी.

रूखापन और जनता से जुड़ाव

इंदिरा के स्वभाव में एक खास दूरी थी. मिलने वाले बताते थे कि वे सामने रखे कागज़ पर कुछ लिखती रहती थीं और कई बार नजर उठाकर देखती भी नहीं थीं. इसी चुप्पी से सामने वाले का आकलन कर लेती थीं. वे कहती थीं कि कोई मिलने आता है तो उन्हें पहले ही आभास हो जाता है कि वह क्या मांगने वाला है.

नीरजा अपना एक किस्सा भी सुनाती हैं. 89 साल की उम्र में स्कूल की तरफ से तीन मूर्ति भवन गईं, तो दूर बगीचे में इंदिरा को देखा और ऑटोग्राफ बुक लेकर दौड़ पड़ीं. इंदिरा कुछ सेकंड चुप रहीं, फिर बोलीं कि बुक कमरे में टेबल पर रख दो, वे साइन कर देंगी. नीरजा को डर था कि बुक वापस नहीं मिलेगी, इसलिए “थैंक यू” कहकर भाग आईं. लेकिन यही नेता आम लोगों से गहराई से जुड़ी थीं.

नीरजा याद करती हैं कि 31 अक्टूबर 1984 को वे दिल्ली में अपने दफ्तर से निकलीं तो बाहर बैठा एक मोची बिलखबिलखकर रो रहा था. वह कह रहा था, “हमारी मां चली गई.” आम लोगों के लिए इंदिरा की यही पहचान थी.

नीरजा इस दूरी को सर्वाइवल की एक तकनीक भी मानती हैं. उनके मुताबिक पुरुषों की दुनिया में टिके रहने के लिए ज्यादातर सफल महिला नेताओं ने यह कठोर रवैया अपनाया. इंदिरा खुद को सिर्फ “महिला नेता” कहलाना भी पसंद नहीं करती थीं. वे चाहती थीं कि लोग उन्हें एक नेता के रूप में देखें. इसीलिए उन्हें कैबिनेट का “इकलौता मर्द” कहा जाता था.

इंदिरा गांधी को आयरन लेडी भी कहा जाता था.

1977: जब सब कुछ बदल गया

इमरजेंसी की पृष्ठभूमि 1971 की जीत के बाद ही बनने लगी थी. बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा अपने शिखर पर थीं. अमेरिका ने सातवां बेड़ा भेजकर दबाव बनाया, पर उन्होंने झुकने से इनकार किया और भारतसोवियत संधि पर दस्तखत कर दिए. लेकिन दो साल के भीतर तेल संकट आया, गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन और फिर बिहार आंदोलन खड़ा हुआ. जयप्रकाश नारायण ने “संपूर्ण क्रांति” का ऐलान किया और इंदिरा के इस्तीफे की मांग की.

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया. राजनारायण की याचिका पर अदालत ने इंदिरा के चुनाव को अवैध ठहराया. नीरजा बताती हैं कि इसके बाद 13 दिन तक इंदिरा ने इस्तीफे पर भी विचार किया और यह भी सोचा कि जगजीवन राम कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन संजय गांधी और सिद्धार्थ शंकर रे जैसे सलाहकारों ने इमरजेंसी की सलाह दी. 25 जून की रात इमरजेंसी लगी. उसी शाम रामलीला मैदान में जेपी ने दिनकर की पंक्ति पढ़ी थी, “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.” उसी रात विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए गए. जेपी को गिरफ्तार करने जब पुलिस पहुंची तो उन्होंने कहा, “विनाश काले विपरीत बुद्धि.”

इमरजेंसी करीब 21 महीने चली. 1977 में चुनाव की घोषणा सबसे बड़ा सवाल है, क्योंकि उसकी कोई ज़रूरत नहीं दिखती थी. नीरजा चौधरी के मुताबिक कई वजहें थीं

  • इंदिरा के भीतर बैठी नेहरू की लोकतांत्रिक बेटी
  • संजय गांधी के बढ़ते प्रभाव और उनके फैसलों से बढ़ती बेचैनी
  • विनोबा भावे और सीपीआई जैसे साथियों का चुनाव कराने का दबाव
  • खुफिया रिपोर्टें, जिनमें इंदिरा को भारी जीत का अनुमान दिया गया था

नीरजा मानती हैं कि केंद्रीय वजह यह थी कि चुनाव जीतकर संजय गांधी के नेतृत्व को वैधता दिलाई जाए. उनके मुताबिक इंदिरा यह मानकर चल रही थीं कि वे जीतेंगी. नतीजे चौंकाने वाले रहे. उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया. इंदिरा और संजय दोनों अपनी सीटें हार गए. रायबरेली में नामांकन के दिन ही इंदिरा को लगा था कि भीड़ में वह पुराना उत्साह नहीं है.

हार के बाद, डर और अकेलापन

नीरजा बताती हैं कि जिनसे लोग डरते थे, वही इंदिरा अब अकेली पड़ चुकी थीं. न सरकारी गाड़ी, न स्टाफ, न टेलीफोन ऑपरेटर, न कोई फाइल. नीरजा के मुताबिक कपिल मोहन और अनिल बाली जैसे करीबी लोग उनसे मिलने गए तो उन्होंने हिमालय जाकर कुटिया बनाने की बात कही. वे इतनी चौकन्नी थीं कि उन्हें घर के पिछले बगीचे में मिलीं, क्योंकि उन्हें लगता था कि जनता पार्टी की सरकार निगरानी करवा रही है.

सबसे बड़ा डर संजय गांधी की सुरक्षा का था. नीरजा के मुताबिक इंदिरा ने परिवार की सुरक्षा के लिए बहूबेटों को अलगअलग जगह भेजा और राजीव को यह पता लगाने भेजा कि क्या देश छोड़ने के लिए प्राइवेट प्लेन किराये पर मिल सकता है. यह खबर खुफिया ब्यूरो से मोरारजी देसाई तक पहुंची. मोरारजी और जेपी ने इंदिरा से मिलकर आश्वासन दिया कि संजय को शारीरिक नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. नीरजा यह भी बताती हैं कि कमलनाथ का मानना था कि अगर जनता पार्टी संजय के खिलाफ कार्रवाई न करती, तो शायद इंदिरा की राजनीति वहीं खत्म हो जाती.

वापसी की रणनीति

सरकार ने इमरजेंसी की ज़्यादतियों की जांच के लिए कई आयोग बनाए, जिनमें शाह आयोग सबसे बड़ा था. इंदिरा ने उसका बहिष्कार किया और जब गईं तो कहा कि फैसले कैबिनेट के थे. जब संजय के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई, तब इंदिरा ने लड़ने का फैसला किया.

3 अक्टूबर 1977 को CBI उन्हें गिरफ्तार करने उनके घर पहुंची. नीरजा के मुताबिक आर.के. धवन ने मीडिया को पहले ही खबर कर दी थी और इंदिरा ने कई घंटे अफसरों को रोके रखा. बाहर भीड़ और मीडिया जुटने के बाद ही उन्होंने कहा, “चलो.” उन्होंने हथकड़ी लगाने तक की बात कही. अगले दिन अदालत ने मामले को कमजोर पाकर उन्हें तुरंत रिहा कर दिया. यही दिन उनकी वापसी की शुरुआत था.

इसके बाद उनकी रणनीति के कई हिस्से थे. उन्होंने बिहार के बेलछी जाकर पीड़ितों से मुलाकात की. इंदिरा ने जनता पार्टी के भीतर मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच की खींचतान का फायदा उठाया. उन्होंने अपनी छवि का हिंदूकरण भी किया और धार्मिक यात्राएं बढ़ाईं.

इंदिरा की वापसी

नीरजा इसी दौर में जगजीवन राम से जुड़े एक विवादित प्रकरण का भी जिक्र करती हैं, जिसमें उनके बेटे की कथित आपत्तिजनक तस्वीरें छपी थीं. उनके मुताबिक इस प्रकरण का राजनीतिक फायदा इंदिरा को मिला, लेकिन इसमें इंदिरा का हाथ था या वे सिर्फ लाभार्थी थीं, यह इतिहास का सवाल बना हुआ है.

फिर चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. नीरजा बताती हैं कि इंदिरा के घर की तरफ मुड़ने की उम्मीद में सतपाल मलिक गुलदस्ता लेकर बरामदे में खड़े रहे, लेकिन चरण सिंह की गाड़ी सामने से गुजर गई. कुछ ही हफ्तों में सरकार गिर गई. 1980 में इंदिरा ने 353 सीटों के साथ वापसी की.

संजय की मौत और अध्यात्म

वापसी के कुछ महीनों बाद 23 जून 1980 को संजय गांधी का विमान हादसे में निधन हो गया. यह इंदिरा के लिए गहरा सदमा था. नीरजा के मुताबिक संजय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन इंदिरा नहीं चाहती थीं कि इमरजेंसी की यादें ताज़ा हों. हादसे से दो हफ्ते पहले वी.पी. सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

नीरजा एक भावुक किस्सा सुनाती हैं. इंदिरा 22 जून को हिमाचल के चामुंडा देवी मंदिर जाने वाली थीं और तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, लेकिन आखिरी वक्त पर कार्यक्रम रद्द कर दिया. अगले दिन संजय का हादसा हो गया. संजय के पार्थिव शरीर के पास बैठी इंदिरा ने पूछा था कि क्या यह इसलिए हुआ कि वे चामुंडा नहीं गईं. पांच महीने बाद दिसंबर में वे चामुंडा गईं और इतना रोईं कि पुजारी ने कहा कि अब उन्हें करोड़ों बेटेबेटियों की देखभाल करनी है. उसी शाम उन्होंने राजीव गांधी को मंच पर पेश किया.

1984 का वो आखिरी दौर

नीरजा के मुताबिक 1984 की इंदिरा 1980 की इंदिरा नहीं थीं. संजय को खो देने के बाद पंजाब की स्थिति, आंध्र में राजनीतिक झटके और गिरते जनाधार से वे जूझ रही थीं. स्वर्ण मंदिर में सेना की कार्रवाई के बाद उन्होंने महीने भर घर में महामृत्युंजय का पाठ करवाया, क्योंकि उन्हें अंजाम का अंदाज़ा था. अक्टूबर 1984 में उन्हीं के सुरक्षा गार्डों ने उनकी हत्या कर दी.

अगर इंदिरा होतीं तो?

इस सवाल पर नीरजा कहती हैं कि जवाब देना बहुत मुश्किल है, लेकिन सोचना दिलचस्प है. उनके मुताबिक इंदिरा राजनीतिक रूप से अनुभवी थीं और समाज में हो रहे बदलावों को भांपती थीं. शाहबानो, बोफोर्स, मंडल और बाबरी जैसे मामलों में शायद वे अलग तरीके से निपटतीं. साथ ही उन्होंने कुछ लोगों से यह भी कहा था कि 1984 के चुनाव में शायद बहुमत न मिले. नीरजा मानती हैं कि भारत गठबंधन की राजनीति की तरफ बढ़ रहा था.

आज की पीढ़ी में इंदिरा से सबसे ज्यादा मेल वे प्रियंका गांधी में देखती हैं, चेहरे की वजह से नहीं, बल्कि राजनीति के अंदाज़ की वजह से. उनके मुताबिक संसद में भाषा का संयम, हंसकर बात करना, तीखा हमला लेकिन संयम और हास्य के साथ, और एक लचीलापन जो राजनीति में जरूरी है.

इंदिरा गांधी को किस रूप में याद रखा जाए, इस सवाल पर नीरजा चौधरी कहती हैं, “एक बहादुर महिला, जिसने कर दिखाया.” उनके मुताबिक नेगेटिव भी था, पॉजिटिव भी, लेकिन अंत में उन्होंने यह दिखाया कि एक महिला भी यह कर सकती है और भारतीय महिलाओं के लिए उन्होंने एक नींव रखी.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply