करवा चौथ व्रत के 4 दिन बाद अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। हर साल कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत किया जाता है। जिस तरह से करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं करती हैं। उसी तरह से अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र और अच्छी सेहत की कामना की जाती है। इस दिन माताएं बच्चों की अच्छी सेहत और दीर्घायु की कामना करते हुए निर्जला व्रत करती है। तारों को अर्घ्य देने और उनकी पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। लेकिन क्या आप जानती हैं कि इस व्रत में तारों की पूजा के बाद व्रत क्यों खोला जाता है। तो आइए जानते हैं इसका रहस्य

तारों को देखकर ही खोला जाता है अहोई अष्टमी का व्रत
इस धारणा के पीछे का रहस्य यह है कि जैसे आकाश में हमेशा तारे टिमटिमाते रहते हैं, उसी तरह से माताओं की संतान का भविष्य भी उज्जवल बने। इस कामना के साथ अहोई अष्टमी के दिन तारों की पूजा कर उनको अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही तारों से ही संतान की दीर्घायु की कामना की जाती है।
तारों की अहोई माता की संतान माना जाता है। जिस तरह से तारों पर हमेशा माता का आशीर्वाद बना रहता है। उसी तरह से बच्चों पर भी अहोई माता का आशीर्वाद बना रहे। इसकी कामना की जाती है।
तारों को अर्घ्य देने का महत्व
इस दिन तारों को अर्घ्य देते हुए माताएं यह प्रार्थना करती हैं कि उनके कुल में ऐसी संतानें हों, जोकि तारों के तरह हमेशा चमकती रहें और उनका प्रकाश कभी कम न हो।
अहोई अष्टमी पर संतान के जीवन की खुशहाली की प्रार्थना की जाती है। जैसे तारों के बिना आकाश अधूरा है, ठीक उसी तरह से बच्चों के बिना मातापिता का अस्तित्व नहीं होता है। इसलिए रातों को अर्घ्य देते हुए बच्चों की सलामती की प्रार्थना होती है। इस दिन तारों को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है और संतान का जीवन भी भाग्यपूर्ण होता है।
कैसे किया जाता है अहोई अष्टमी व्रत
अहोई अष्टमी पर महिलाएं सुबह से ही निर्जला व्रत करती हैं। इस दिन स्याहु माला धारण करके पूजा की जाती है। अहोई अष्टमी का पूरे दिन व्रत करने के बाद गोधूलि बेला में तारों का दर्शन कर अर्घ्य दिया जाता है और व्रत का पारण किया जाता है। इस दिन पूजा के समय अहोई अष्टमी व्रत कथा का पाठ किया जाता है। वहीं अहोई माता को मीठी चीज का भोग अर्पित किया जाता है।



