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​चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर… भूल जाएंगे एक कचौड़ी, दो समोसा, जानें भारतीय राजनीति के दिलचस्प नारे

एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा. दिल्ली में महिला सुरक्षा को लेकर हाल के प्रदर्शनों में यह नारा लगा और देखतेदेखते सड़क से सोशल मीडिया तक पहुंच गया. नारे का यह अंदाज नया जरूर है, लेकिन नारे का तीखा, व्यंग्यात्मक या बेलगाम होना नया नहीं. आज कचौड़ीसमोसा सुनकर हमें लगता है कि विरोध की भाषा शायद प्रहसन में बदल रही है. लेकिन आजादी के बाद के राजनीतिक आंदोलनों और चुनावों के नारों की तरफ नजर डालें तो कई बार भाषा इससे कहीं ज्यादा तीखी रही है. इसलिए असली सवाल यह नहीं कि नारा गंभीर है या मजेदार. सवाल यह है कि नारे के पीछे विचार और संघर्ष कितना गंभीर है?

​चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर… भूल जाएंगे एक कचौड़ी, दो समोसा, जानें भारतीय राजनीति के दिलचस्प नारे

दिल्ली विश्वविद्यालय सहित दूसरे विश्वविद्यालयों की छात्राओं के प्रदर्शनों में रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं, नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की, फूल नहीं, चिंगारी है, ये भारत की नारी है और ठंडे समोसे गर्म करो, मर्द जात शर्म करो जैसे नारे भी सुनाई दिए. महिला सुरक्षा, सार्वजनिक जगहों पर आजादी से आनेजाने और हिंसा के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे इन प्रदर्शनों में तुकबंदी, व्यंग्य और हास्य की भाषा ने खास ध्यान खींचा. विरोध प्रदर्शनों में नारे हमेशा लगते रहे हैं. वक्त के साथ इनकी भाषा और तेवर बदलते रहें हैं.

आजादी के आंदोलन के नारे तो हर जुबान पर चढ़े. वंदे मातरम् राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष बना. इंकलाब जिंदाबाद क्रांतिकारी आंदोलन की पहचान बना. अंग्रेजों भारत छोड़ो और गांधी का करो या मरो सत्ता को सीधी चुनौती थे. ” तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के उद्घोष के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने लोगों में जोश भरा. इन नारों की सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा में नहीं, उनके पीछे के संकल्प में थी. तब नारे गिरफ्तारी, लाठी, जेल और फांसी का सीधे आमंत्रण थे. न पुलिस अपनी थी और न अदालतें इतनी संवेदनशील कि उन्हें बर्दाश्त करें.

महिला सुरक्षा के नाम पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में गजब की नारेबाजी हो रही है। लड़कियों ने गर्दा उड़ा दिया है।

नारा 1
एक कचौड़ी, दो समोसा
इन मर्दो का क्या भरोसा

नारा 2
एक सुट्टा दो चाय…
मर्द जात हायहाय

नारा 3
हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी
इन मर्दो की सोच है छोटी https://t.co/cqMjVLC1lr

— SKY September 29, 2026

तब नारे चंद लम्हों का रोष नहीं थे

नारे उस दौर में चंद लम्हों का आक्रोश नहीं थे. वे संकल्प थे. उन्हें सच में बदलने के लिए नौजवान कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते थे. इंकलाब जिंदाबाद बुलंद करते कितने ही सिर फटे. लोगों ने छातियों पर गोलियां खाईं . कम उम्र में आजादी के दीवाने फांसी पर चढ़े. करो या मरो नारा किसी पोस्टर का जुमला नहीं था. वह एक ऐसे आंदोलन का आह्वान था जिसमें अंग्रेजी सत्ता के सामने अंतिम संघर्ष का संकल्प था. तब नारों और कर्म के बीच फासला बहुत कम था. शब्द कम थे. जोखिम बहुत बड़े थे. आजादी के पहले विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए लोगों को सड़कों पर लाने की चुनौती थी. उनका डर दूर करना था. उनमें त्याग और कुर्बानी का जज़्बा भरना था. लंबे भाषण नहीं बल्कि चंद शब्दों से कसे नारे उन्हें हिम्मतहौसला दे, संघर्ष पथ पर खींचते थे.

सत्ताविपक्ष: दोनों को नारों की जरूरत

आजादी के बाद के आंदोलन सरकार से लड़ने और अधिकार हासिल करने के साथ सरकार बदलने की कोशिश के हथियार भी थे. जो सत्ता में थे, वे फिर से सरकार बनाने और वोटरों को लुभाने के लिए नारे गढ़ते रहे. गरीबी हटाओ नारे ने, चुनावी राजनीति को, एक छोटे और याद रह जाने वाले संदेश में बदल दिया. जय जवान, जय किसान में युद्ध और खाद्य संकट से जूझते देश की प्राथमिकताएं थीं.

इस दौर में नारे प्रतिद्वंदी से टकराव के नहीं, सरकार की नीतियों, सामाजिक न्याय और आर्थिक सवालों के मुहावरों में बदले. दूसरी तरफ विपक्ष ने सरकार को घेरने और वोटरों के बड़े वर्ग को अपनी ओर खींचने के लिए नारों का सहारा लिया. डॉ. राममनोहर लोहिया अलग तेवर के नेता थे. उनके नारे संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ—ने पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी के नए रास्ते खोल दिए. छठे दशक की राजनीति में इस नारे ने सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल को चुनावी विमर्श के केंद्र में पहुंचाने में भूमिका निभाई.

जयप्रकाश नारायण.

गूंजे धरती और आकाश, देश का नेता जयप्रकाश

जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के नारों ने सत्ता विरोध के साथ व्यवस्था परिवर्तन का भरोसा जगाने की कोशिश की . अंधकार में एक प्रकाश—जयप्रकाश, जयप्रकाश और गूंजे धरती और आकाश—देश का नेता जयप्रकाश जैसे नारों में तुक थी, लय थी, व्यक्तित्व का महिमामंडन भी था. लेकिन उनके पीछे व्यवस्था परिवर्तन की बेचैनी थी. संपूर्ण क्रांति इसी बेचैनी का सबसे बड़ा सूत्र बना. दूसरे आंदोलनों में भी नारे की भाषा सीधे मांग पर आती थी—जीने लायक वेतन दो, वरना गद्दी छोड़ दो.

श्रमिक आंदोलनों में ऐसे नारों की भरमार रही. राजनीतिक बंदियों और गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के समर्थन में जेल के ताले टूटेंगे, साथी हमारे छूटेंगे जैसे नारे गूंजते रहे. यानी नारे में तुक और उत्तेजना पहले भी थी. हर पुराना नारा गंभीर, मर्यादित और दार्शनिक नहीं था. जनांदोलन की भाषा हमेशा साहित्य की भाषा नहीं होती.

जब नारे टकराव की वजह बने

उत्तर प्रदेश की राजनीति ने नारे की भाषा को टकराव की दिशा दी. जातीय और सामाजिक अलगाव बढ़ाया. तिलक, तराजू और तलवार, इनको जूते मारो चार जैसे नारे ने सामाजिक संघर्ष को बेहद आक्रामक भाषा दी. इसी दौर में मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम ने 1993 के सपाबसपा गठबंधन की राजनीतिक सफलता को नारे में बदल दिया. बाद में चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर जैसे नारों ने भी चुनावी संघर्ष की भाषा को और उत्तेजना दी.

बहुजन समाज पार्टी का झंडा.

इन नारों की भाषा और तेवर बतातें हैं कि शब्द भाव के बेलगाम होने का सिलसिला दशकों पहले शुरू हो गया था. सत्ता की लड़ाई जब जाति, धर्म, वर्ग के ध्रुवीकरण की राह पकड़ती है , तब नारे भी भी मर्यादा का अतिक्रमण करते हैं. बसपा के नारों की यात्रा विशेष रूप से दिलचस्प है. एक दौर में सवर्णो से सीधा टकराव तो दूसरी तरफ , हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्माविष्णुमहेश है, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय और ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा जैसी भाषा. यानी राजनीतिक जरूरतों के साथ नारों की भाषा और अंदाज भी बदलते गए.

नारे समय का आईना

नारे अपने समय की राजनीति का आईना होते हैं. समाज में जब संघर्ष तीखा होगा तो नारे और तीखे होंगे. जब गठबंधन की जरूरत होगी तब नारा जोड़ने वाली भाषा खोजेगा. और जब राजनीति ध्रुवीकरण पर चलेगी तो नारा समाज को बांटेगा. सूचना क्रांति, टेलीविजन और उसके बाद सोशल मीडिया. नारों की दुनिया में सबसे बड़ा बदलाव इसी दौर में आया. पहले नारा भीड़ को सुनाने के लिए था. अब वह कैमरे के लिए भी है. पहले नारे की सफलता इस बात से मापी जाती थी कि कितने लोग उसे दोहरा रहे हैं.

अब यह भी देखा जाता है कि कितने लोगों ने उसे देखा, कितनों ने शेयर किया और कितनी रीलों में वह फिर सुनाई दिया. यहीं एक कचौड़ी, दो समोसा… जैसे नारे अपनी पूरी अर्थवत्ता के साथ सामने आते हैं. उनमें तुक है, हास्य है, स्थानीय स्वाद है और कुछ ही सेकंड में याद हो जाने की क्षमता है. हाल के दिल्ली प्रदर्शनों में ऐसे कई नारे सोशल मीडिया पर तेजी से फैले और विरोध की अपनी अलग डिजिटल भाषा बन गए. क्या इसका अर्थ यह है कि नारे की भाषा से मुद्दा हल्का हो गया? जरूरी नहीं. रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं जैसे नारे साफ बताते हैं कि हास्यपूर्ण तुकबंदी के पीछे वास्तविक भय और गुस्सा मौजूद है.

सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाने और सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की आवाजाही सीमित न करने की मांग इन प्रदर्शनों का गंभीर हिस्सा है. इसलिए केवल नारे की चंचल भाषा देख पूरी पीढ़ी को गैरजिम्मेदार बताना मुनासिब नहीं होगा. पर वक्त के साथ बदलाव आया है. पहले नारे आंदोलन को धार देते थे. अब कई मौकों पर आंदोलन पीछे और नारे खबर बन जाते हैं. नारे कभी इतिहास में दर्ज हो जाते थे. आज जिस तेजी से वायरल होते हैं, उतनी ही तेजी से भुला भी दिए जाते हैं.

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