अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मध्यावधि चुनाव में लगे राजनीतिक झटके ने दुनिया भर के बाजारों की तस्वीर बदल दी है. इसका बड़ा फायदा भारतीय शेयर बाजार को मिल रहा है. अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की बड़ी जीत के बाद डाउ जोंस 3 फीसदी उछल गया. इसका सीधा असर भारत में दिखा. सेंसेक्स 1,600 से ज्यादा अंक यानी 2 फीसदी उछलकर 78,900 के पार निकल गया, जबकि निफ्टी ने 24,400 का स्तर पार कर लिया. इस चुनावी नतीजे से ट्रंप के मनमाने फैसले लेने की ताकत सीमित हो जाएगी. साथ ही ईरान विवाद सुलझने की उम्मीद बढ़ी है, जिससे कच्चे तेल के दाम और डॉलर दोनों नीचे आए हैं. भारत के लिए विदेशी निवेश से लेकर महंगाई और आरबीआई की नीतियों तक, इसके 5 बड़े मायने हैं.

1. सस्ते कच्चे तेल से घटेगा भारत का सबसे बड़ा बोझ
भारत के लिए सबसे अच्छी खबर कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट है. अमेरिकाईरान विवाद सुलझने की उम्मीद से ब्रेंट क्रूड करीब 10 फीसदी टूटकर 94 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया है. इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ. वी के विजयकुमार का मानना है कि अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल माहौल बनने से बाजार में तेजी का ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा.
सस्ता क्रूड, शांति की उम्मीद, मजबूत आर्थिक विकास और कंपनियों के सुधरते मुनाफे ने भारत के लिए माहौल बहुत बेहतर कर दिया है. एमके रिसर्च के अनुसार, इस वित्त वर्ष में अब तक भारत का तेल आयात बिल करीब 24 फीसदी बढ़ चुका है. ऐसे में तेल सस्ता होने से महंगाई, चालू खाते के घाटे और कंपनियों के मार्जिन पर दबाव कम होगा. नोमुरा का कहना है कि चुनाव के बाद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का समीकरण बदल सकता है. ईरान समझौते के लिए ज्यादा लचीला रुख अपना सकता है, जिससे तेल की कीमतों में शामिल युद्ध का जोखिम और कम होगा.
2. कमजोर डॉलर से लौटेंगे विदेशी निवेशक
विजयकुमार ने बताया कि विदेशी निवेशकों ने पिछले चार कारोबारी सत्रों में कैश मार्केट में 20,834 करोड़ रुपये की खरीदारी की है. उनकी खरीदारी की रफ्तार लगातार बढ़ रही है. सस्ता कच्चा तेल, कमजोर डॉलर और भूराजनीतिक तनाव कम होने से उभरते बाजारों का आकर्षण बढ़ा है. लंबे समय तक बिकवाली करने के बाद अब विदेशी निवेशकों को भारतीय लार्जकैप शेयरों में दोबारा पैसा लगाने का मौका मिल रहा है.
विजयकुमार के मुताबिक, लार्जकैप शेयरों में अभी और शॉर्टकवरिंग देखने को मिलेगी. बैंकिंग व फाइनेंशियल शेयरों की अगुवाई में इनमें और तेजी आ सकती है. चुनावी नतीजों के बाद डॉलर इंडेक्स 0.6 फीसदी गिर गया. निवेशकों को लग रहा है कि अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंफ्रास्ट्रक्चर पर सख्ती बढ़ सकती है, जिससे अमेरिकी ग्रोथ धीमी पड़ेगी. कमजोर डॉलर उभरते बाजारों की करेंसी के लिए हमेशा राहत लाता है.
3. ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति पर लग सकती है लगाम
कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से ट्रंप की टैरिफ नीतियों की कड़ी जांच होगी. उनके लिए नए कानून पास कराना अब आसान नहीं होगा. राष्ट्रपति के पास व्यापार से जुड़े बड़े अधिकार रहते हैं, फिर भी अचानक टैरिफ बढ़ाने का खतरा अब कम हो गया है. एमके रिसर्च को उम्मीद है कि 2028 से पहले ट्रंप पर महंगाई कम करने के साथ व्यापारिक समझौते करने का दबाव बढ़ेगा. भविष्य में किसी भी टैरिफ एक्शन को लंबी जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है, जिससे अचानक लगने वाले झटकों की आशंका कम हो जाएगी.
ब्रोकरेज के मुताबिक, भारत के लिए ट्रेड डील करने की तत्काल मजबूरी अब टल गई है. हालांकि, फार्मास्यूटिकल्स व इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर विशेष टैरिफ का खतरा अभी बना हुआ है. रूस या ईरान के साथ अमेरिकी रिश्तों में खटास आने का जोखिम भी बरकरार है. जानकारों का मानना है कि ये नतीजे अमेरिकी व्यापार नीति के तीखेपन को कम करेंगे, लेकिन नीतिगत अनिश्चितता पूरी तरह खत्म नहीं होगी.
4. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड गिरने से आरबीआई को मिलेगी राहत
चुनावी नतीजों से वॉशिंगटन में राजनीतिक गतिरोध बढ़ने की आशंका है. इससे घाटा बढ़ाने वाले नए कानून या टैक्स कटौती की संभावना कम हो गई है, जिसके लिए अधिक ट्रेजरी बॉन्ड जारी करने पड़ते. नतीजों के बाद अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में गिरावट आई है. एआई निवेश में संभावित सुस्ती से अमेरिकी ग्रोथ और महंगाई दोनों नरम पड़ सकते हैं. इससे फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना कम होगी. ये स्थिति भारत के लिए फायदेमंद है क्योंकि इससे घरेलू बॉन्ड यील्ड और रुपये पर दबाव घटेगा.
भारतीय रिजर्व बैंक को भी रुपये को बचाने के बजाय घरेलू विकास दर और महंगाई पर ध्यान देने की ज्यादा छूट मिलेगी. हालांकि, ये राहत सीमित हो सकती है. अमेरिका में महंगाई अड़ी रही तो ब्याज दरें ऊंची बनी रह सकती हैं. साथ ही भारत की चालू खाते की फंडिंग की जरूरतें रुपये में बहुत बड़ी मजबूती को रोक सकती हैं.
5. एआई निवेश पर सख्ती से बदलेगी ग्लोबल मार्केट की चाल
डेमोक्रेट्स की जीत से अमेरिका में डेटासेंटर निवेश पर निगरानी बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. खासतौर पर टेक्सास, जॉर्जिया और ओहायो में सख्ती बढ़ सकती है. अमेरिका के कुल मौजूदा और प्रस्तावित डेटा सेंटर क्षमता का करीब 33 फीसदी हिस्सा इन्हीं तीन राज्यों में है. बिजलीपानी की खपत, स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर और टैक्स छूट को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. इससे कुछ प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है या नियमों का पालन करने की लागत बढ़ सकती है. फिर भी, इस चुनाव का मतलब एआई निवेश के दौर का अंत नहीं है.
एमके का मानना है कि ये नतीजे बुनियादी खर्च पर नहीं, बल्कि सिर्फ बाजार के सेंटीमेंट पर एक झटका हैं. बड़ा बेस होने की वजह से 2027 में एआई खर्च की रफ्तार थोड़ी धीमी हो सकती है, लेकिन इसकी विकास की कहानी मजबूत बनी हुई है. भारतीय बाजारों के लिए इसके मिलेजुले मायने हैं. अमेरिकी एआई निवेश में भारी गिरावट से टेक्नोलॉजी सेक्टर के सेंटीमेंट और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को नुकसान हो सकता है. लेकिन हल्की सुस्ती से अमेरिकी महंगाई और ब्याज दरें कम होंगी. निवेशक महंगे अमेरिकी टेक शेयरों से पैसा निकालकर भारतीय आईटी सेक्टर का रुख कर सकते हैं.
जश्न के मूड में है बाजार
बाजार अभी जश्न के मूड में है, लेकिन मध्यावधि चुनाव के नतीजे ट्रंप की मौजूदा नीतियों को अपने आप नहीं बदल सकते. उनकी वीटो पावर और कार्यकारी अधिकार अभी भी काफी मजबूत हैं. अमेरिका में लंबे राजनीतिक टकराव की चिंताएं उभरेंगी. ट्रंप अपने स्वभाव के मुताबिक कमजोर राष्ट्रपति बनने के बजाय ‘मिस्टर वीटो’ बनना पसंद करेंगे. इसके चलते घरेलू संस्थागत निवेशक भी इस तेजी में मुनाफावसूली कर सकते हैं, जिससे बाजार की रफ्तार थोड़ी थम सकती है. फिर भी सस्ता क्रूड, विदेशी निवेशकों की खरीदारी, कमजोर डॉलर और शांति की उम्मीदों ने फिलहाल भारतीय बाजार को आगे बढ़ने की नई ताकत दे दी है.



