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​मुगल हरम की सबसे ताकतवर महिला कौन थी, जिसे पिता शाहजहां ने सोने से तौलवाया?

मुगल इतिहास में कई राजकुमारियों का नाम मिलता है. इनमें जहांआरा बेगम का स्थान बहुत खास है. वह केवल बादशाह शाहजहां की बेटी नहीं थीं. वह राजनीति समझती थीं. दरबार पर उनका प्रभाव था. व्यापार में भी उनकी रुचि थी. धार्मिक जीवन में भी वह आगे थीं. जहांआरा बेगम को मुगल हरम की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में गिना जाता है. वह बादशाह शाहजहां और मुमताज महल की बड़ी बेटी थीं. उनका जन्म 1614 में हुआ था. मां मुमताज महल की मृत्यु के समय उनकी उम्र करीब 17 साल थी. मां मुमताज महल की मृत्यु के बाद जहांआरा ने शाही परिवार की जिम्मेदारी संभाली. उन्हें हरम की मुखिया बनाया गया. इस पद को पादशाह बेगम कहा जाता था. यह मुगल दरबार का बहुत बड़ा पद था.

​मुगल हरम की सबसे ताकतवर महिला कौन थी, जिसे पिता शाहजहां ने सोने से तौलवाया?

जहांआरा की पुण्यतिथि के बहाने समझते हैं कि वह हरम की ताकतवर महिला कैसे बनीं, जिसने चांदनी चौक बनवाया, पर्दा प्रथा तोड़ी, आग से जख्मी हुई तो पिता ने सोने से तौल दिया.

मां की मृत्यु के बाद संभाली बड़ी जिम्मेदारी

मुमताज महल बादशाह शाहजहां की सबसे प्रिय पत्नी थीं. उनकी मृत्यु के बाद शाहजहां को गहरा दुख हुआ. शाही परिवार सदमे में था. ऐसे समय में जहांआरा ने परिवार को संभाला. वह पिता के बहुत करीब थीं. शाहजहां भी उन पर भरोसा करते थे. उन्हें दरबार में सम्मान मिलता था. शाही फैसलों में उनकी राय सुनी जाती थी. जहांआरा अपने भाइयों के बीच भी प्रभावशाली थीं. वह दारा शिकोह के पक्ष में थीं. दारा शाहजहां के बड़े बेटे थे.

बादशाह शाहजहां.

दूसरी ओर औरंगजेब सत्ता की दौड़ में आगे बढ़ रहे थे. उत्तराधिकार के संघर्ष में जहांआरा ने दारा का समर्थन किया. इस कारण बाद के दौर में उन्हें कठिन समय का सामना करना पड़ा. औरंगजेब के सत्ता में आने के बाद शाहजहां को आगरा के किले में नजरबंद कर दिया गया. जहांआरा ने पिता का साथ नहीं छोड़ा. वह शाहजहां की मृत्यु तक उनके साथ रहीं.

चांदनी चौक समेत कई बाजार, सराय भी बनवाए

दिल्ली के पुराने शहर का चांदनी चौक आज भी बहुत प्रसिद्ध है. इसके निर्माण और विकास का संबंध जहांआरा बेगम से जोड़ा जाता है. शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की थी. नई राजधानी का नाम शाहजहानाबाद रखा गया. इस शहर के विकास में शाही परिवार के लोगों ने योगदान दिया. जहांआरा ने भी शहर की योजना में भूमिका निभाई. उन्होंने दिल्ली में बाजार और सराय बनवाए. व्यापारियों और यात्रियों के लिए सुविधाएं तैयार करवाईं.

चांदनी चौक.

चांदनी चौक का बाजार भी उनके प्रयासों से विकसित हुआ. इतिहास में इसका पुराना नाम चांदनी चौक ही मिलता है. कहा जाता है कि बाजार के बीच एक जलधारा और तालाब था. चांदनी रात में पानी पर चांद का प्रतिबिंब दिखाई देता था. इसी कारण इसका नाम चांदनी चौक पड़ा. यह इलाका केवल बाजार नहीं था. यह व्यापार और सामाजिक जीवन का बड़ा केंद्र था. यहां दूरदूर से व्यापारी आते थे. तरहतरह की वस्तुएं बिकती थीं. जहांआरा ने दिल्ली को एक जीवंत और व्यवस्थित शहर बनाने में मदद की.

पर्दे के पीछे नहीं, सत्ता के करीब

मुगल महल में पर्दा व्यवस्था कड़ी थी. शाही महिलाओं का सार्वजनिक जीवन सीमित रहता था. फिर भी जहांआरा ने अपनी भूमिका को केवल महल तक सीमित नहीं रखा. वह शाही यात्राओं में शामिल होती थीं. वह धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में जाती थीं. बाजार और निर्माण कार्यों पर भी उनका ध्यान रहता था. यह कहना अधिक सही होगा कि उन्होंने पर्दे की सीमाओं को काफी हद तक चुनौती दी. उन्होंने सत्ता और प्रशासन से जुड़े कामों में सक्रिय भूमिका निभाई. वह खुलकर राजनीतिक सलाह देती थीं. उनका प्रभाव इतना था कि विदेशी यात्री भी उनका उल्लेख करते हैं. दरबार में उनके पास बड़ी संपत्ति थी. वह अपने नाम से व्यापार कराती थीं. उनके पास जहाज भी थे. इन जहाजों से समुद्री व्यापार किया जाता था. यह बात उस समय की शाही महिलाओं की आर्थिक शक्ति को दिखाती है. जहांआरा अपनी संपत्ति का इस्तेमाल दान और निर्माण कार्यों में भी करती थीं.

जहांआरा बेगम का निधन 16 सितंबर, 1681 में हुआ.

सूफी विचारों से प्रभावित थीं जहांआरा

जहांआरा बेगम का झुकाव सूफी विचारधारा की ओर था. वह सूफी संतों से प्रभावित थीं. उन्हें चिश्ती परंपरा में विशेष आस्था थी. उन्होंने सूफी संत मुईनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया के जीवन पर लेख भी लिखे. उनकी रचनाओं में आध्यात्मिकता दिखाई देती है. वह प्रेम, सेवा और आत्मिक शांति को महत्व देती थीं. उनकी दो प्रसिद्ध रचनाओं का उल्लेख इतिहास में मिलता है. एक रचना मुईनुद्दीन चिश्ती के जीवन से जुड़ी थी. दूसरी रचना दिल्ली के सूफी संत निजामुद्दीन औलिया से संबंधित थी. जहांआरा खुद को केवल राजपरिवार की सदस्य नहीं मानती थीं. वह आध्यात्मिक साधना में भी रुचि रखती थीं. धीरेधीरे उनकी पहचान एक सूफी शहजादी के रूप में बनी.

आग में झुलसना और पिता का अटूट प्रेम

जहांआरा के जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में आग से जुड़ी घटना शामिल है. यह घटना 1644 के आसपास बताई जाती है. उस समय वह शाही महल में थीं. कहा जाता है कि उनके कपड़ों में आग लग गई. उनके कपड़े लंबे और भारी थे. आग तेजी से फैल गई. वह बुरी तरह घायल हो गईं. इस खबर से शाहजहां बहुत परेशान हो गए. उन्होंने अपनी बेटी के इलाज के लिए देशविदेश से चिकित्सकों को बुलाया. उस समय इलाज आसान नहीं था. जहांआरा को लंबे समय तक पीड़ा सहनी पड़ी.

इतिहास से जुड़ी कई लोकप्रिय कथाओं में कहा जाता है कि शाहजहां ने उन्हें सोने से तौल दिया था. यह घटना उनके प्रति बादशाह के गहरे प्रेम का प्रतीक मानी जाती है. हालांकि, इस बात के सभी विवरण एक जैसे नहीं मिलते. कुछ बातें दरबारी कथाओं और लोकप्रचलित इतिहास का हिस्सा हैं. फिर भी यह स्पष्ट है कि शाहजहां अपनी बेटी से बहुत प्रेम करते थे. उनकी बीमारी के समय पूरा शाही दरबार चिंतित था. इलाज के बाद जहांआरा धीरेधीरे स्वस्थ हुईं. इस घटना के बाद उनके जीवन में धार्मिक रुचि और बढ़ गई. उन्होंने आध्यात्मिक कार्यों में अधिक ध्यान लगाया.

दारा शिकोह.

उत्तराधिकार के युद्ध में दिया बड़े भाई दारा का साथ

शाहजहां के चार प्रमुख बेटों में दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श शामिल थे. शाहजहां की बीमारी के बाद उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ. जहांआरा दारा शिकोह की समर्थक थीं. दारा उदार धार्मिक विचारों के लिए जाने जाते थे. वह हिंदू और मुस्लिम आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद में विश्वास रखते थे. औरंगजेब ने दारा को हराकर सत्ता पर कब्जा कर लिया. इसके बाद शाहजहां को आगरा के किले में नजरबंद कर दिया गया. जहांआरा ने उस कठिन समय में अपने पिता के साथ रहने का फैसला किया. उन्होंने महल की सुविधाएं छोड़ दीं. वह पिता की सेवा में रहीं. शाहजहां ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष अपनी बेटी के साथ बिताए. यह पिता और बेटी के रिश्ते की गहराई दिखाता है.

मुगल बादशाह औरंगजेब.

वैचारिक मतभेद के बावजूद औरंगजेब ने दिया पूरा सम्मान

औरंगजेब और जहांआरा के राजनीतिक विचार अलग थे. फिर भी औरंगजेब ने अपनी बहन का सम्मान बनाए रखा. बाद में जहांआरा को फिर से पादशाह बेगम का पद मिला. वह दरबार में प्रभावशाली बनी रहीं. उन्होंने कई निर्माण कार्य करवाए. दिल्ली में उनकी ओर से बनवाई गई सराय और बाजारों का उल्लेख मिलता है. जहांआरा ने यात्रियों और व्यापारियों के लिए सुविधाएं तैयार कराईं. उन्होंने धार्मिक संस्थानों को दान दिया. गरीबों की सहायता की. उनका जीवन शाही वैभव और आध्यात्मिक सेवा का मिश्रण था.

अंतिम समय और जहांआरा की विरासत

जहांआरा बेगम का निधन 16 सितंबर, 1681 में हुआ. उन्हें दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास दफनाया गया. उनकी इच्छा थी कि उनकी कब्र सादगी से बनाई जाए. उनकी कब्र पर बहुत भव्य मकबरा नहीं बनाया गया. यह उनकी सूफी सोच को दर्शाता है. वह दिखावे से अधिक विनम्रता को महत्व देती थीं. जहांआरा बेगम का जीवन कई रूपों से भरा था. वह शहजादी थीं. वह प्रशासक थीं. वह व्यापारी थीं. वह लेखिका थीं. वह सूफी साधिका थीं. वह अपने पिता की सबसे भरोसेमंद संतान थीं.

उन्होंने शाही हरम की सीमाओं के भीतर रहते हुए भी अपनी अलग पहचान बनाई. चांदनी चौक से लेकर सूफी साहित्य तक, उनका योगदान आज भी याद किया जाता है. उनकी कहानी यह बताती है कि मुगल काल की महिलाएं केवल पर्दे के पीछे रहने वाली पात्र नहीं थीं. कई महिलाएं सत्ता, अर्थव्यवस्था, धर्म और निर्माण कार्यों में सक्रिय थीं. जहांआरा बेगम उन्हीं ताकतवर महिलाओं में से एक थीं.

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