DharamIndiaTrending

​​​माता पार्वती को क्यों मिला ‘अपर्णा’ नाम? भगवान शिव के लिए की गई कठोर तपस्या की कथा का करवा चौथ से क्या है संबंध?

​​​माता पार्वती को क्यों मिला ‘अपर्णा’ नाम? भगवान शिव के लिए की गई कठोर तपस्या की कथा का करवा चौथ से क्या है संबंध?

करवा चौथ पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि उन्हें अखंड सौभाग्य और दांपत्य सुख का प्रतीक माना जाता है। लेकिन माता पार्वती का एक नाम ‘अपर्णा’ भी है, जिसके पीछे त्याग, धैर्य और कठिन तपस्या से जुड़ी पौराणिक कथा प्रचलित है। आखिर उन्हें यह नाम कैसे मिला और उनकी तपस्या का करवा चौथ की परंपरा से क्या संबंध है? आइए जानते हैं।

माता पार्वती को अपर्णा क्यों कहा जाता है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनका संकल्प अटल था और वे भगवान शिव की आराधना में पूरी तरह लीन हो गई थीं। कथा के अनुसार, तपस्या के दौरान उन्होंने धीरे-धीरे सांसारिक सुख-सुविधाओं और भोजन का त्याग करना शुरू कर दिया।

मान्यता है कि शुरुआत में माता पार्वती कंद-मूल और फल खाकर साधना करती थीं। बाद में उन्होंने फल और अन्य आहार छोड़ दिए तथा पेड़ों से अपने आप गिरने वाले सूखे पत्तों पर निर्भर रहने लगीं। जब उन्होंने सूखे पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया, तो उनके इसी कठोर त्याग के कारण उन्हें ‘अपर्णा’ नाम से जाना जाने लगा।

संस्कृत में ‘पर्ण’ का अर्थ पत्ता होता है। इस तरह ‘अपर्णा’ नाम को पत्तों तक का त्याग करने वाली देवी की तपस्या से जोड़कर समझाया जाता है। धार्मिक परंपरा में माता पार्वती का यह स्वरूप दृढ़ संकल्प, धैर्य और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

माता पार्वती की तपस्या और भगवान शिव से विवाह की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती पूर्वजन्म में सती थीं। सती के देह त्याग के बाद उन्होंने पार्वती के रूप में जन्म लिया। इसके बाद भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने कठिन साधना की।

कथा में बताया जाता है कि उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उन्होंने लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में भी अपना संकल्प नहीं छोड़ा। उनकी भक्ति और दृढ़ निश्चय को देखकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और दोनों का विवाह हुआ।

यह कथा हिंदू धार्मिक परंपरा में प्रेम, निष्ठा और आध्यात्मिक संकल्प का प्रतीक मानी जाती है। माता पार्वती को इसी कारण शक्ति, धैर्य और समर्पण के स्वरूप में भी पूजा जाता है।

करवा चौथ के निर्जला व्रत से क्या है अपर्णा की कथा का संबंध?

करवा चौथ पर कई सुहागिन महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के माध्यम से वे अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना करती हैं।

माता पार्वती की तपस्या और करवा चौथ के व्रत के बीच संबंध उनके समर्पण और दांपत्य सुख से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर समझा जाता है। इसी वजह से करवा चौथ की पूजा में माता पार्वती का स्मरण किया जाता है और उनसे सुखी वैवाहिक जीवन तथा सौभाग्य की प्रार्थना की जाती है।

हालांकि, माता पार्वती की अपर्णा नाम वाली कथा और करवा चौथ के निर्जला व्रत को जोड़ने वाली व्याख्या धार्मिक परंपराओं पर आधारित है। इसे करवा चौथ की हर क्षेत्रीय परंपरा में एक समान अनिवार्य नियम नहीं माना जाता।

करवा चौथ पर माता पार्वती की पूजा क्यों की जाती है?

माता पार्वती को भगवान शिव की अर्धांगिनी और शक्ति स्वरूपा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उनका वैवाहिक जीवन प्रेम, विश्वास, समर्पण और संतुलन का प्रतीक है। इसलिए करवा चौथ पर महिलाएं माता पार्वती के साथ भगवान शिव और भगवान गणेश की पूजा भी करती हैं।

पूजा के दौरान करवा चौथ की कथा सुनने, करवा माता का स्मरण करने और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करने की परंपरा है। पूजा-विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में कुछ भिन्न हो सकती है।

करवा चौथ 2026 कब मनाया जा रहा है?

वर्ष 2026 में करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर, गुरुवार को रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार व्रत और पूजा करती हैं। चंद्रमा के दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा भी प्रचलित है। पूजा और चंद्रोदय के सटीक समय के लिए अपने शहर के पंचांग का मिलान करना उचित रहेगा।

सत्य रिपोर्ट डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक कथाओं और प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। पूजा-विधि और परंपराओं में क्षेत्र के अनुसार अंतर हो सकता है।

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply